वॉर रुकवाने वाला 'एप्सटीन फाइल्स' पर बेबस : ताक़त, चुप्पी और भारतीय सत्ता का असहज सच!
वॉर रुकवाने वाला 'एप्सटीन फाइल्स' पर बेबस : ताक़त, चुप्पी और भारतीय सत्ता का असहज सच!
लेखक: अरुण कुणाल
एप्सटीन कांड के तहत सार्वजनिक हुए कुछ अमेरिकी न्यायिक दस्तावेज़ों और मीडिया रिपोर्ट्स में भारत से जुड़े नामों के उल्लेख ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। इन दस्तावेज़ों में केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी के अलावा पहली बार पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नामों का संदर्भ सामने आने का दावा किया गया है। सवाल यह नहीं है कि ये नाम किस भूमिका में थे, बल्कि यह है कि एक सजायाफ्ता यौन अपराधी के संपर्कों में भारत का शीर्ष नेतृत्व यदि वास्तव में चर्चा का विषय बन रहा था, तो यह अपने-आप में गंभीर चिंता का कारण है।
अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट द्वारा जेफरी एप्सटीन से जुड़ी करीब 30 लाख से ज़्यादा फाइलों का सार्वजनिक होना सिर्फ़ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, यह वैश्विक सत्ता-तंत्र की मानसिकता का एक्स-रे है। इन दस्तावेज़ों में दर्ज हर ईमेल, हर टिप्पणी यह बताती है कि दुनिया के ताक़तवर लोग एक-दूसरे से कैसे बात करते हैं और किन देशों को किस नज़र से देखते हैं। यह सत्ता के उस इकोसिस्टम की झलक है, जहाँ जवाबदेही नहीं, बल्कि पहुंच सबसे बड़ा करेंसी होती है।
गौरतलब है कि 19 दिसंबर, 2025 को एप्सटीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट के तहत अमेरिकी न्याय विभाग ने जेफरी एपस्टीन और उसके सहयोगियों से जुड़े अपराधों पर पर्दा हटाते हुए लाखों दस्तावेज़ सार्वजनिक किए। इन दस्तावेज़ों को सामूहिक रूप से “एप्सटीन फाइल्स” कहा जा रहा है, जो एप्सटीन द्वारा किए गए यौन तस्करी से जुड़े दो आपराधिक मामलों की जांच से संबंधित रिकॉर्ड्स का एक विशाल संग्रह है।
यह कोई साधारण आर्काइव नहीं है। यह उन ईमेल्स, मेमो, गवाहियों और संवादों का पुलिंदा है, जो वर्षों तक बंद कमरों में दबे रहे। इन फाइलों में सिर्फ़ यौन अपराध के विवरण नहीं हैं, बल्कि यह भी दर्ज है कि एप्सटीन किन लोगों से संपर्क में था, किससे ईमेल पर बातचीत कर रहा था और किन विषयों पर चर्चा हो रही थी। यहीं से यह मामला अमेरिका की सीमाओं को पार करता है और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के दरवाज़े पर दस्तक देता है।
भारत के संदर्भ में यह असहजता और भी गहरी हो जाती है। एप्सटीन से जुड़े सवाल ऐसे समय सामने आ रहे हैं, जब ट्रम्प–मोदी ट्रेड डील को एक ऐतिहासिक उपलब्धि की तरह पेश किया जा रहा है। बड़े समझौते अक्सर बड़े सवालों को ढकने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। राष्ट्रहित की चादर इतनी मोटी कर दी जाती है कि उसके नीचे सच सांस ही न ले सके। सत्ता जानती है कि अगर ध्यान ट्रेड डील, कूटनीति और वैश्विक मंच पर टिका रहेगा, तो एप्सटीन फाइल्स जैसे मुद्दे अनावश्यक शोर कहकर किनारे किए जा सकते हैं।
ये सारे खुलासे उस वक़्त सामने आ रहा है जब संसद का बजट सत्र चल रहा है, जब सरकार को जवाब देना चाहिए, बहस होनी चाहिए और सवालों का सामना करना चाहिए। लेकिन भारत की संसदीय राजनीति का अनुभव बताता है कि सवालों के जवाब देने से ज़्यादा ऊर्जा हंगामा खड़ा करने में खर्च होती है। जाहिर है, एप्सटीन कांड पर सवाल उठेंगे। विपक्ष हंगामा करेगा। सत्ता पक्ष पलटवार करेगा। न्यूज़ चैनलों पर बहसें होंगी। लेकिन इन बहसों का मक़सद जवाबदेही तय करना नहीं होगा, बल्कि शोर पैदा करना होगा, ताकि सच उस शोर में दब जाए।
आज जब एप्सटीन फाइल्स के कुछ हिस्से सार्वजनिक हुए हैं, तो सवाल अमेरिका तक सीमित नहीं रह गए। भारत भी कटघरे में खड़ा दिखाई देता है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही दिनों बाद, जेफरी एप्सटीन का एक ईमेल सामने आने का दावा किया गया है, जिसमें वह अमेरिकी अरबपति टॉम प्रिट्जकर से पूछता है- “क्या हमें जेटली और मोदी के साथ मिलकर भारत का भविष्य तय करना चाहिए?”
अगर यह सिर्फ़ एक निजी बातचीत थी, तो भी सवाल खड़ा होता है कि 2008 में यौन अपराध का दोषी ठहराया जा चुका व्यक्ति भारत के प्रधानमंत्री और तत्कालीन वित्त मंत्री को लेकर इस तरह की भाषा कैसे इस्तेमाल कर रहा था? और अगर यह महज़ शेख़ी नहीं थी, तो फिर उसकी पहुँच कहाँ तक थी? यह वही दौर था जब भारत “न्यू इंडिया” के सपने देख रहा था। लेकिन क्या उस सपने की स्क्रिप्ट किसी ऐसे आदमी के हाथों में भी थी, जिसकी पहचान एक अंतरराष्ट्रीय यौन तस्कर के रूप में हो चुकी थी?
एप्सटीन फाइल्स में पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली का ज़िक्र एक बार और नरेंद्र मोदी का 30 से भी ज्यादा बार आने का दावा किया जा रहा है। हलांकि इससे किसी अपराध का सीधा आरोप तय नहीं होता है, लेकिन लोकतंत्र में सिर्फ़ “नाम आना” भी जवाबदेही की मांग करता है। सवाल यह है कि एप्सटीन जैसे व्यक्ति को भारत की शीर्ष राजनीति पर टिप्पणी करने का आत्मविश्वास कहाँ से मिला?
इस कहानी में हरदीप पुरी का नाम और भी असहज करता है। दावा है कि अक्टूबर 2014 में एप्सटीन ने उन्हें एक ईमेल लिखा, जिसमें अपनी असिस्टेंट के लिए भारत आने का वीज़ा जल्द दिलवाने की मदद मांगी गई। एक पूर्व राजनयिक, जो उस समय सत्ता के बेहद क़रीब था, उससे एक सजायाफ्ता यौन अपराधी सीधे संपर्क क्यों कर रहा था? यह कोई सामान्य कूटनीतिक मेल नहीं था। यह उस विशेषाधिकार का उदाहरण है, जो ताक़तवर लोगों के लिए नियमों को लचीला बना देता है। सवाल यह है कि क्या हरदीप पुरी एप्सटीन को सिर्फ़ एक “प्रभावशाली संपर्क” मान रहे थे? या फिर उसके काले कारनामों की जानकारी के बावजूद उसकी मदद की थी?
भारत के सबसे ताक़तवर उद्योगपतियों में से एक अनिल अंबानी का नाम आना, क्रोनी कैपिटलिज्म पर सवाल खड़े करता है। एप्सटीन फाइल्स में दावा किया गया है कि एप्सटीन उनसे भी संपर्क में था और कुछ मामलों में प्रधानमंत्री के बिहाफ़ पर बातचीत हो रही थी। लगभग एक समय में सत्ता के शीर्ष पर बैठे करीबी लोगों से एक ही पैटर्न पर बात होना, यह संयोग नहीं है।
जहाँ तक प्रधानमंत्री मोदी के इज़राइल दौरे के पीछे जेफ़री एपस्टीन के कथित प्रभाव की चर्चा है, यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि एपस्टीन के संबंध केवल अमेरिका तक सीमित नहीं थे। उसके तार इज़राइल के एक पूर्व प्रधानमंत्री सहित कई प्रभावशाली इज़राइली व्यक्तियों से भी जुड़े बताए जाते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और शोधकर्ताओं के बीच यह आशंका भी लंबे समय से व्यक्त की जाती रही है कि एपस्टीन किसी न किसी रूप में इज़राइली खुफिया एजेंसी मोसाद के ‘हनी ट्रैप’ नेटवर्क का हिस्सा था या उसके प्रभाव में काम कर रहा था।
इसी क्रम में, मनमोहन सिंह सरकार को अस्थिर करने और गिराने की मुहिम के पीछे अमेरिकी खुफिया एजेंसियों सीआईए और मोसाद की भूमिका को लेकर भी समय-समय पर आरोप लगते रहे हैं। यदि इन आरोपों को आज सामने आ रही एपस्टीन फाइल्स के साक्ष्यों के संदर्भ में जोड़ा जाए, तो मनमोहन सरकार के खिलाफ चले व्यापक अभियान में विदेशी ताक़तों की संभावित भूमिका से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता है।
हालाँकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि सीआईए या मोसाद की प्रत्यक्ष भूमिका को लेकर आज तक कोई आधिकारिक या निर्णायक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसके बावजूद, इस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि जेफ़री एपस्टीन की पहुँच वॉशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक सत्ता के सर्वोच्च गलियारों में थी और ऐसी पहुँच अक्सर निजी नहीं, बल्कि रणनीतिक हितों से जुड़ी होती है।
एप्सटीन कांड की परतें यहीं खत्म नहीं होतीं। अब उन दावों और खुलासों की चर्चा भी सामने आ रही है, जिनमें जेफरी एप्सटीन, बिल गेट्स और कुछ देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच कोविड महामारी को लेकर वैक्सीन आधारित मुनाफ़े की संभावित प्लानिंग का ज़िक्र किया जाता है। यदि ये दावे सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ़ एक घोटाला नहीं, बल्कि मानव इतिहास का नैतिक पतन होगा।
कोविड महामारी के दौर में अगर किसी स्तर पर महामारी को “व्यावसायिक अवसर” की तरह देखा गया, तो यह मानवता को शर्मसार करने वाला विचार है। डर इस बात का है कि अगर वैश्विक स्तर पर कुछ ताक़तवर लोग पहले से यह तय कर रहे थे कि वैक्सीन, पेटेंट, सप्लाई चेन और सरकारी नीतियों के ज़रिये कौन कितना कमाएगा, तो फिर महामारी प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक प्रबंधित संकट जैसी लगने लगती है।
एप्सटीन के मरते ही बहुत से राज उसके साथ दफ़न हो गए। लेकिन सत्ता की सबसे बड़ी भूल यही होती है कि वह यह मान लेती है कि मौत से सच भी मर जाता है। फाइलों में बंद वे मुर्दे, जिन्हें सालों पहले दफना दिया गया था, अब सबूत बनकर क़ब्र से बाहर आ रहे हैं। किसी को सज़ा मिले या न मिले, इतिहास बताता है कि जब दस्तावेज़ बोलने लगते हैं, तो झूठ की उम्र कम हो जाती है।
आज असल सवाल यह नहीं है कि एप्सटीन फाइल्स में अगला नाम कौन-सा होगा? सवाल यह है कि क्या भारत में सत्ता से जुड़े लोग कभी इन सवालों का सामना करेंगे? क्या संसद में इस पर बहस होगी? या फिर हमेशा की तरह यह कहकर मामला दफना दिया जाएगा कि भारत की छवि खराब की जा रही है?
ब्रिटेन के पीएम कीर स्टार्मर और बिल गेट्स की माफ़ी के बाद, आने वाले दिनों में माफ़ीनामों की सूची और लंबी होने की आशंका जताई जा रही है। लोकतंत्र में ताक़तवर लोगों की जवाबदेही सबसे बड़ी कसौटी होती है। यदि भारत खुद को एक मज़बूत और नैतिक लोकतंत्र के रूप में स्थापित करना चाहता है, तो ऐसे हर सवाल का सामना उसे तथ्यों और पारदर्शिता के साथ करना होगा, चुप्पी के साथ नहीं। क्योंकि इतिहास गवाह है: फाइलें दबाई जा सकती हैं, लेकिन सवाल कभी मरते नहीं है.....!


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