विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का 'संस्कारी बजट': एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति?

 


विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का 'संस्कारी बजट': एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ?


                            लेखक : अरुण कुणाल


केंद्रीय बजट ऐसे समय में प्रस्तुत हुआ है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। एक ओर दुनिया में ट्रेड टेंशन बढ़ रहा है, दूसरी ओर अमेरिकी टैरिफ और भू-राजनीतिक तनाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में भारत जैसे उभरते हुए बड़े देश से यह उम्मीद स्वाभाविक थी कि सरकार बजट के जरिए ऐसे ठोस कदम उठाएगी, जिससे वैश्विक दबावों का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर न्यूनतम पड़े और आम नागरिक को कुछ राहत मिले।

आम बजट से मध्यम वर्ग को सबसे अधिक उम्मीदें थीं- आयकर में अतिरिक्त छूट, महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन। इसके उलट बजट का झुकाव उपभोग बढ़ाने के बजाय राजकोषीय अनुशासन और दीर्घकालिक निवेश की ओर अधिक दिखा। इसके साथ ही बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश बढ़ाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। घर खरीदने वालों को सस्ते होम लोन, रियल एस्टेट सेक्टर को टैक्स राहत, निवेशकों को गोल्ड-सिल्वर पर ड्यूटी या टैक्स में कटौती, स्टार्टअप्स और MSME के लिए आसान कर्ज तथा ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूत करने की अपेक्षा भी थी। 

इन कदमों से विकास दर को गति मिलती और आम नागरिक के हाथ में खर्च करने के लिए अधिक पैसा आता। लेकिन इस बजट में सरकार की प्राथमिकता आम लोगों की बजाय राजस्व बढ़ाने पर अधिक केंद्रित दिखाई देती है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंदिरों और तीर्थ स्थलों के लिए 5,000 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज तो दिया है, लेकिन किसानों और युवाओं के लिए कोई पैकेज न देकर उन्हें सीधे आत्मनिर्भर बना दिया हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीति के साये में भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच फ्री ट्रेड डील पर सहमति बनना निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है। इसके समानांतर सरकार ने बजट में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फोकस और बढ़ाया है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पूंजीगत खर्च को बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये करने का ऐलान किया गया है, जो सरकार की विकास-उन्मुख रणनीति को दर्शाता है। उम्मीद की जा रही है कि इससे निर्माण, स्टील, सीमेंट और रोजगार सृजन से जुड़े क्षेत्रों को गति मिलेगी। इस डील को लेकर दुनियाभर की निगाहें टिकी थीं, क्योंकि कई जटिल मुद्दों पर सहमति बनना आसान नहीं था। बजट से ठीक पहले इस समझौते का होना भारत के लिए रणनीतिक रूप से अच्छी खबर है। 

भारत के लगभग 55 लाख करोड़ रुपये के इस बजट में टैक्स स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया गया, जिससे मध्यम वर्ग की निराशा और गहरी हो गई। हालांकि सरकार ने कुछ सीमित राहत के कदम जरूर उठाए हैं! विदेशी टूर पर लगने वाले TCS को 2 प्रतिशत तक सीमित किया गया है और कुछ इंपोर्टेड सामानों पर ड्यूटी घटाकर 10 प्रतिशत कर दी गई है। ये राहतें चुनिंदा वर्गों तक ही सीमित हैं और व्यापक उपभोक्ता मांग को प्रोत्साहित करने में इनका असर सीमित ही माना जा रहा है।

हर बजट की तरह इस बार भी मिडिल क्लास को टैक्स में राहत की उम्मीद थी। पिछले बजट में नई टैक्स व्यवस्था के तहत 12 लाख रुपये तक की आय को टैक्स फ्री करने का ऐतिहासिक फैसला किया गया था, जिससे उम्मीदों का बाजार और गर्म हो गया था। लेकिन इस बार टैक्सपेयर्स को कोई अतिरिक्त राहत नहीं मिली। उलटे GST सुधारों के नाम पर अप्रत्यक्ष रूप से बोझ बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। मध्यम वर्ग, जो पहले ही महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च से जूझ रहा है, उसके लिए यह निराशाजनक है।

इसी बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की एक रिपोर्ट ने सरकार के विकास के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। IMF ने भारत को निगरानी के लिए पर्याप्त डेटा न होने के कारण GDP और GVA के मामले में ‘सी ग्रेड’ दिया है। IMF उपलब्ध आंकड़ों को चार श्रेणियों में बांटता है- ए ग्रेड से लेकर गंभीर कमियों वाले डेटा तक। भारत को 'सी ग्रेड' मिलना इस बात का संकेत है कि आंकड़ों में ऐसी कमियां हैं, जो निगरानी प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। यह ग्रेडिंग डेटा की विश्वसनीयता और गुणवत्ता को लेकर चिंताएं बढ़ाती है।

सवाल यह है कि जब GDP के आंकड़े तेज विकास की ओर इशारा कर रहे हैं, तो IMF ने भारत के राष्ट्रीय अकाउंट्स स्टैटिस्टिक्स को सी ग्रेड क्यों दिया? IMF का कहना है कि भारत के नेशनल अकाउंट्स और महंगाई के आंकड़े अनौपचारिक क्षेत्र, रोजगार की वास्तविक स्थिति और लोगों के खर्च करने के पैटर्न जैसे अहम पहलुओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते। भारत जैसी अर्थव्यवस्था में, जहां बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र पर निर्भर है, इन पहलुओं की अनदेखी विकास की वास्तविक तस्वीर को धुंधला कर देती है।

यहां एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है। जापान को पीछे छोड़कर भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। यह उपलब्धि गर्व की बात है और भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूत करती है। लेकिन दूसरी ओर, आत्मनिर्भर भारत के 80 करोड़ लोग आज भी 5 किलो मुफ्त अनाज पर निर्भर हैं। अगर अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है, तो इतनी बड़ी आबादी को मुफ्त राशन की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? यह सवाल विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करता है।

मुफ्त राशन योजना ने महामारी और आर्थिक संकट के समय करोड़ों लोगों को भूख से बचाया, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन जब यह योजना स्थायी स्वरूप ले लेती है, तो यह संकेत देती है कि रोजगार और आय के अवसर पर्याप्त नहीं बढ़ पाए हैं। सरकार को यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या बजट का उद्देश्य केवल आंकड़ों में विकास दिखाना है या लोगों को सम्मानजनक आजीविका देना भी उतना ही जरूरी है।

बजट में राजकोषीय प्रबंधन को लेकर भी सरकार ने सतर्क रुख अपनाया है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटे को जीडीपी का 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो वित्त वर्ष 2025-26 के संशोधित 4.4 प्रतिशत से थोड़ा कम है। यह संकेत देता है कि सरकार विकास और अनुशासन के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रही है।

इसी संदर्भ में 'आर्थिक सर्वे' के निष्कर्ष भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन द्वारा तैयार और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए तीन संभावित परिदृश्यों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है, जो वर्ष 2026 में सामने आ सकते हैं। सर्वे के अनुसार, इन तीनों में से प्रत्येक परिदृश्य भारत के लिए किसी न किसी रूप में जोखिम पैदा करता है। सबसे खराब परिदृश्य में वैश्विक आर्थिक झटका 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से भी अधिक गंभीर हो सकता है। हालांकि सर्वे यह भी स्वीकार करता है कि इस परिदृश्य की संभावना कम है, लेकिन इसके प्रभाव अत्यंत असमान और दूरगामी हो सकते हैं, जिनका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ेगा।

आर्थिक सर्वेक्षण का एक अहम पहलू यह भी है कि सरकार ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की विकास संभावनाओं को लेकर आशावादी रुख अपनाया है। सर्वे के अनुसार, आने वाले वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था 7 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ सकती है। अप्रैल से शुरू होने वाले नए वित्त वर्ष के लिए विकास दर 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान जताया गया है, जो मौजूदा वैश्विक ट्रेड टेंशन और बढ़ती अनिश्चितताओं के बावजूद एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। खास बात यह है कि ये अनुमान बाजार के सामान्य आकलन से भी अधिक हैं।

बजट के तुरंत बाद बाजार की प्रतिक्रिया ने सरकार के दावों पर सवाल खड़े कर दिए। बजट पेश होने के बाद शेयर बाजारों में तेज बिकवाली देखने को मिली। सेंसेक्स लगभग 1,500 अंक तक लुढ़क गया, जबकि निफ्टी करीब 500 अंकों की गिरावट के साथ बंद हुआ। यह गिरावट निवेशकों की सतर्कता, वित्तीय नीतियों को लेकर अनिश्चितता और वैश्विक आर्थिक माहौल में बढ़ते जोखिमों की ओर इशारा करती है।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का नजरिया अपेक्षाकृत सतर्क है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने जनवरी में भारत के लिए अपने ग्रोथ अनुमान को अगले वर्ष के लिए 6.4 प्रतिशत तक संशोधित किया है, जो उसके पिछले अनुमान 6.2 प्रतिशत से थोड़ा अधिक जरूर है, लेकिन सरकार के आर्थिक सर्वे के अनुमानों से कम है। यह अंतर इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत की विकास कहानी को लेकर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आकलनों के बीच भरोसे का फासला अब भी बना हुआ है।

इसी संदर्भ में आर्थिक सर्वेक्षण का एक अहम पहलू यह है कि इसमें भारतीय कॉर्पोरेट जगत को जापान, अमेरिका, जर्मनी और ताइवान जैसे देशों का उदाहरण देते हुए आर्थिक राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया गया है। संकेत साफ है कि वैश्वीकरण के बदलते दौर में केवल सरकार से संरक्षण की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं होगा। निजी क्षेत्र को भी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप निवेश, नवाचार और रोजगार सृजन में बड़ी भूमिका निभानी होगी। लेकिन सवाल यह है कि जब घरेलू मांग कमजोर हो, आय असमानता बढ़ रही हो और बड़ी आबादी मुफ्त राशन पर निर्भर हो, तब कॉर्पोरेट राष्ट्रवाद का यह आह्वान जमीनी हकीकत से कितना मेल खाता है?

पिछले बजट में की गई कई अहम घोषणाओं के लक्ष्य अब तक पूरे नहीं हो पाए हैं और इस बार भी कई ऐसी योजनाएं और वादे सामने आए हैं, जिनके ज़मीन पर उतरने को लेकर संदेह बना हुआ है। नीयत और नैरेटिव के स्तर पर यह बजट ‘संस्कारी’ जरूर कहा जा सकता है, जहां राष्ट्रवाद, आत्मनिर्भरता और अनुशासन की बातें प्रमुख हैं। इस लिहाज से इसे 10 में से 10 नंबर दिए जा सकते हैं। लेकिन ‘कार्यकारी बजट’ के पैमाने पर देखें तो मनमोहन सिंह की पाठशाला से ग्रेस मार्क्स लेकर पास होना भी आसान नहीं दिखता।

वित्त मंत्री ने बजट भाषण में अपने ही आर्थिक सर्वे में उठाए गए सवालों को लगभग पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया। नतीजा यह रहा कि बजट कम और चुनावी भाषण ज़्यादा लगता है। मोदी सरकार द्वारा विभिन्न मंत्रालयों में की गई कटौतियाँ साफ़ संकेत देती हैं कि आने वाली आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के बजाय सरकार शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छिपाने की रणनीति पर काम कर रही है।

अंततः यह बजट भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं और सामाजिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन साधने में पूरी तरह सफल नहीं दिखता। वैश्विक मंच पर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का तमगा तभी सार्थक होगा, जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। 80 करोड़ लोगों के लिए मुफ्त राशन किसी उपलब्धि से ज्यादा एक चेतावनी है कि आर्थिक नीतियों को केवल GDP ग्रोथ नहीं, बल्कि रोजगार, आय और जीवन स्तर के सुधार के पैमाने पर भी परखा जाना चाहिए।

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