ट्रम्प की ट्रेड डील और अकबर–बीरबल का बैंगन: एकदम से वक्त बदल दिए, जज्बात बदल दिए, बैंगन का ताज बदल दिए!


      अथ श्री ट्रम्प डील कथा

भारत -अमेरिका ट्रेड डील और अकबर–बीरबल का बैंगन: एकदम से वक्त बदल दिए, जज्बात बदल दिए, बैंगन का ताज बदल दिए....! 

                    (व्यंग्य)

                          लेखक- अरुण कुणाल

डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत–अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा के बाद जिस तरह के सवाल, शंकाएँ और विरोधाभास सामने आए हैं, वे भारतीय राजनीति और कूटनीति की उस पुरानी परंपरा की याद दिलाते हैं जहाँ घोषणा पहले होती है और शर्तें बाद में समझ आती हैं। इस पूरे घटनाक्रम पर अकबर–बीरबल का वह मशहूर किस्सा सटीक बैठता है, जिसमें बैंगन पहले “सब्जियों का राजा” बनता है और कुछ ही दिनों में “बेकार और बेस्वाद” घोषित कर दिया जाता है।

किस्से में अकबर की इच्छा मात्र से बैंगन महान हो जाता है। बीरबल उसके सिर पर ताज देखता है, उसमें विटामिन खोज लेता है और उसे स्वास्थ्य का खजाना बता देता है। एक हफ्ते तक वही बैंगन रोज़ परोसा जाता है। अंततः अकबर ऊब जाता है और सवाल करता है- “इसमें स्वाद ही नहीं है।” अब वही बीरबल बैंगन को कोसने लगता है। जब अकबर उसके पलटने पर सवाल उठाता है, तो बीरबल का जवाब सत्ता और सच के रिश्ते को नंगा कर देता है- “जहांपनाह, मैं नौकरी आपकी करता हूं, बैंगन की नहीं!”

भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर मौजूदा बहस को समझने के लिए इससे बेहतर रूपक शायद ही मिल सके। डील की घोषणा होते ही सत्ता समर्थक तंत्र सक्रिय हो गया। इसे “ऐतिहासिक”, “गेम चेंजर”, “मास्टरस्ट्रोक” और “भारत की वैश्विक जीत” बताया गया। सोशल मीडिया से लेकर टीवी स्टूडियो तक बैंगन में ताज उग आए। कहा गया कि इससे भारतीय निर्यात बढ़ेगा, निवेश आएगा, नौकरियाँ बनेंगी और भारत वैश्विक सप्लाई चेन का अहम हिस्सा बनेगा।

लेकिन जैसे ही डील की बारीक शर्तें सामने आने लगीं, टैरिफ का असंतुलन, कृषि और डेयरी पर संभावित दबाव, बौद्धिक संपदा अधिकारों को लेकर अमेरिकी सख्ती, और “मेक इन इंडिया” पर पड़ने वाला असर, तस्वीर बदलने लगी। सवाल उठने लगे कि अगर अमेरिका अपने उत्पादों पर भारत से ज़्यादा रियायतें ले रहा है, तो इसे बराबरी की डील कैसे कहा जाए? अगर भारतीय किसानों और छोटे उद्योगों पर इसका बोझ पड़ता है, तो इसे राष्ट्रीय हित की जीत कैसे माना जाए?

जो लोग कल तक डील की तारीफों के पुल बांध रहे थे, वही अब सफाई देने लगे कि “हर डील में कुछ समझौते होते हैं”, “लंबी अवधि में फायदा दिखेगा” और “कूटनीति भावनाओं से नहीं, व्यावहारिकता से चलती है।” यानी बैंगन अब भी परोसा जा रहा है, बस उसका नाम बदल दिया गया है।

असल समस्या डील से ज़्यादा उस राजनीतिक संस्कृति की है, जिसमें सवाल पूछना देशद्रोह और आलोचना करना नकारात्मकता मान लिया जाता है। अकबर–बीरबल के किस्से में अकबर कम से कम सवाल तो करता है। आज की राजनीति में कई बार अकबर को भी यह समझा दिया जाता है कि बैंगन में स्वाद न लगना उसकी ज़ुबान की गलती है, सब्ज़ी की नहीं।

ट्रम्प के मामले में यह विरोधाभास और तीखा है। अमेरिका पहले “अमेरिका फर्स्ट” की नीति अपनाता है, अपने किसानों और उद्योगों को बचाने के लिए ऊँचे टैरिफ लगाता है, और फिर भारत से खुले बाज़ार की उम्मीद करता है। सवाल यह है कि क्या भारत इस डील में बराबरी का साझेदार है, या फिर वही बीरबल है, जिसे दरबार में खड़े रहकर मालिक की पसंद के मुताबिक तारीफ या तंज करना होता है?

यह भी याद रखना ज़रूरी है कि अंतरराष्ट्रीय ट्रेड डील कोई भाषण या ट्वीट नहीं होती। इसके नतीजे तुरंत नहीं, बल्कि धीरे-धीरे ज़मीन पर दिखते हैं- किसानों की आमदनी में, एमएसएमई की हालत में, रोज़गार के आंकड़ों में और आयात–निर्यात के संतुलन में। अगर इन स्तरों पर नुकसान होता है, तो इतिहास तारीफों को नहीं, फैसलों के असर को याद रखता है।

अकबर–बीरबल की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि सत्ता के आसपास रहने वाले लोग अक्सर सच नहीं, सुविधा का चयन करते हैं। आज बैंगन की तारीफ है, कल उसकी बुराई। लेकिन जनता वह अकबर है, जिसे रोज़ वही सब्ज़ी खानी पड़ती है। आखिरकार उसका मन भरता है और वह पूछता है-“इसमें स्वाद कहाँ है?”

भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर असली बहस अब शुरू होनी चाहिए। भावनात्मक नारों और राजनीतिक तालियों से आगे बढ़कर यह देखा जाना चाहिए कि इस डील से किसे फायदा और किसे नुकसान होगा। क्या यह किसानों, छोटे उद्योगों और आम उपभोक्ताओं के हित में है, या केवल कॉर्पोरेट और भू-राजनीतिक समीकरणों की पूर्ति करती है?

2026 की ट्रेड डील से पहले अमेरिका से आयातित कई उत्पादों पर भारत काफी ऊँचे टैरिफ लगाता था! कुछ कैटेगरी में ये 30%, और ऑटोमोबाइल, डेयरी, शराब, कृषि जैसे संवेदनशील सेक्टरों में 60–100% तक भी जाते थे। नई डील के तहत भारत ने इनमें से कई टैरिफ को काफी कम करने या शून्य करने पर सहमति दी है। 

अब अगर इन टैरिफ को शून्य किया जा रहा है, तो इसका सीधा अर्थ है कि अमेरिकी उत्पाद भारतीय बाज़ार में बिना सुरक्षा कवच के उतरेंगे। अमेरिका, जहाँ किसान और उद्योग पहले से भारी सब्सिडी पाते हैं और भारत, जहाँ किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए भी संघर्ष करता है, इस मुकाबले को बराबरी कहना खुद से झूठ बोलने जैसा है।

जो लोग 18% वाली ट्रेड डील को लेकर जश्न मना रहे हैं, उन्हें यह बुनियादी तथ्य ज़रूर याद रखना चाहिए कि अमेरिका ने भारत पर कभी इतना ऊँचा औसत टैरिफ लगाया ही नहीं था। हकीकत यह है कि अभी तक अमेरिका भारत से आने वाले ज़्यादातर उत्पादों पर औसतन 3% से भी कम टैरिफ लगाता रहा है, 2014 से पहले तो यह टैरिफ 2% से भी कम था। 

राहुल गांधी और विपक्ष इस डील के पीछे अडानी केस और एपस्टीन फाइल्स को मुख्य कारण बता रहे हैं। अगर एपस्टीन फाइल्स की आंच नरेंद्र मोदी तक नहीं पहुंचती, तो “मेक इन इंडिया” का शेर ट्रम्प के आगे ढेर न होता! ऐसे में सवाल यह नहीं है कि एपस्टीन फाइल्स का सीधा रिश्ता है या नहीं, असल सवाल यह है कि क्या यह ट्रेड डील आत्मविश्वास से की गई बराबरी की बातचीत थी, या फिर अंतरराष्ट्रीय दबावों, छवि-प्रबंधन और संभावित असहजताओं से उपजा डैमेज कंट्रोल?

विपक्ष के नेता राहुल गांधी की तरह अगर सवाल पूछने वालों को चुप करा दिया गया, तो बीरबल रूपी दरबारी तो हर दौर में मिल जाएगा, लेकिन अकबर रूपी जागरूक विपक्ष अगर सवाल करना छोड़ दे, तो ट्रेड डील के नाम पर बैंगन रोज़ परोसा जाएगा, चाहे उसमें स्वाद हो या न हो। कल तक बीरबल के बैंगन की तरह दरबारी मीडिया 50% टैरिफ के फायदे बता रही थी, अब वही मीडिया 18% टैरिफ के फायदे बता रही है!

अमेरिका की "पारस्परिक टैरिफ" नीति के तहत चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देश अमेरिका से आयातित वस्तुओं पर बराबरी का टैरिफ लगा रहे हैं जो 11% से 34% तक है! जबकि नए डील के तहत भारत 18% टैरिफ के जवाब में अमेरिका पर जीरो टैरिफ लगाएगा! इस बावत भारत से कोई आवाज नहीं आ रही है पर अमेरिका खुल कर बोल रहा है! 

जब मेक इन इंडिया का नारा देश में गूंजता है और अमेरिका से बयान आता है- "मेड इन यूएसए : टैक्स फ्री" तो इसे कूटनीति कहें या आर्थिक आत्मसमर्पण? अगर कोई देश “18% बनाम 0%” पर राज़ी हो जाए उसे डील करना नहीं, डील झेलता कहते है! क्योंकि जब शेर दहाड़ने के बजाय समझौते के लिए मिमियाने लगे तो दुनिया उसे बाज़ार समझती है, बराबरी का साझेदार नहीं।

अंत में, इस व्यंग्य में अकबर–बीरबल का किस्सा महज़ एक कहानी नहीं, बल्कि चेतावनी है। सत्ता के लिए कही गई तारीफें क्षणिक होती हैं, लेकिन गलत फैसलों का स्वाद लंबे समय तक ज़ुबान पर बना रहता है। ट्रेड डील हो या कुछ और डील, अगर वह सच में देशहित में है, तो उसे बैंगन के सिर पर ताज साबित करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी! अगर ऐसा करना पड़ रहा है, तो एक जीवित लोकतंत्र के लिए सवाल पूछना और भी ज़रूरी हो जाता है।


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