एपस्टीन की क्राइम पार्टनर मैक्सवेल की अमेरिकी संसद में गवाही: अमेरिका से भारत तक फिंगर क्रॉस!



एपस्टीन की क्राइम पार्टनर मैक्सवेल की अमेरिकी संसद में गवाही: अमेरिका से भारत तक फिंगर क्रॉस! 

                           लेखक: अरुण कुणाल


जेफरी एपस्टीन की पूर्व सहयोगी और कुख्यात यौन तस्करी नेटवर्क की मुख्य किरदार गिलेन मैक्सवेल 9 फरवरी को अमेरिकी संसद के सामने गवाही देने वाली हैं। यह गवाही ऐसे समय में हो रही है जब  एपस्टीन से जुड़े फाइलों और दस्तावेज़ों का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक किया जा रहा है। सत्ता के गलियारों में हलचल तेज़ है, क्योंकि यह सिर्फ़ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि वैश्विक सत्ता-संरचना, प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत और वर्षों से दबाए गए सच का सवाल बन चुका है।

यह गवाही बंद कमरे में, वर्चुअल माध्यम से होगी। हाउस ओवरसाइट कमेटी ने इसके लिए औपचारिक समन जारी किया है। अमेरिकी संसद यह जांच कर रही है कि संघीय जांच एजेंसियों ने एपस्टीन मामले को कैसे हैंडल किया, किन स्तरों पर लापरवाही हुई, और क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति को जानबूझकर बचाया गया।

मैक्सवेल के वकीलों ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वह गवाही के दौरान अमेरिकी संविधान के Fifth Amendment का सहारा ले सकती हैं। इसका सीधा अर्थ है, वह ऐसे किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर सकती हैं जिससे उन्हें खुद को दोषी ठहराने का खतरा हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके बावजूद कुछ ऐसे राज सामने आ सकते हैं जो अब तक सत्ता की परतों में छिपे रहे हैं?

जेफरी एपस्टीन की रहस्यमयी मौत के करीब एक साल बाद, जुलाई 2020 में गिलेन मैक्सवेल को अमेरिकी जांच एजेंसियों ने गिरफ्तार किया था। लंबी सुनवाई, दर्जनों गवाहियां और पीड़ितों के बयान बाद दिसंबर 2021 में अदालत ने मैक्सवेल को नाबालिगों की यौन तस्करी और उससे जुड़े पांच गंभीर मामलों में दोषी करार दिया। अदालत ने साफ कहा कि मैक्सवेल केवल एक सहयोगी नहीं थी, बल्कि पूरे यौन शोषण नेटवर्क की रीढ़ थी।

मुकदमे के दौरान यह तथ्य सामने आया कि मैक्सवेल नाबालिग लड़कियों की पहचान करती थी, उन्हें लालच देती थी, ग्रूमिंग करती थी और फिर एपस्टीन तथा उसके रसूखदार मेहमानों तक पहुंचाती थी। एपस्टीन कांड के पीड़ितों के मुताबिक, अगर मैक्सवेल की भूमिका न होती, तो एपस्टीन का यह अपराध तंत्र इतने वर्षों तक इतने संगठित और सुरक्षित तरीके से नहीं चल पाता। अदालत की यह टिप्पणी अपने आप में कई बड़े सवाल खड़े करती है।

एपस्टीन की दुनिया में गिलेन मैक्सवेल सबसे प्रभावशाली चेहरा थीं। कभी उसकी प्रेमिका रहीं मैक्सवेल को एपस्टीन का सबसे भरोसेमंद साथी माना जाता था। आज वह 20 साल की सजा काट रही हैं, लेकिन यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या उसके अपराधों की गंभीरता को देखते हुए यह सजा पर्याप्त है?

इस पूरे प्रकरण में एक तीसरा नाम 'वर्जीनिया गिउफ्रे' बेहद अहम है। गिउफ्रे वह महिला है, जिन्होंने जेफरी एपस्टीन और गिलेन मैक्सवेल पर नाबालिग अवस्था में यौन शोषण और तस्करी के गंभीर आरोप लगाए थे। गिउफ्रे ने स्वीकार किया था कि वह कभी डोनाल्ड ट्रम्प के मार-ए-लागो क्लब में काम करती थीं और वहीं उनकी मुलाकात मैक्सवेल से हुई थी।

अप्रैल 2025 में ऑस्ट्रेलिया में 41 वर्ष की आयु में वर्जीनिया गिउफ्रे का निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद आई किताब “नॉबडीज़ गर्ल” एपस्टीन के सेक्स-सिंडिकेट की भयावह सच्चाई को और गहराई से उजागर करती है। किताब में दर्ज कथाएं सिर्फ़ व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि सत्ता के संरक्षण में पलते अपराधों का दस्तावेज़ हैं। गिउफ्रे ने लिखा है कि कैसे उन्हें बार-बार शक्तिशाली पुरुषों के पास भेजा गया, कैसे शारीरिक और मानसिक शोषण को एक “सिस्टम” की तरह चलाया गया।

अमेरिकी महिला वर्जीनिया गिउफ्रे ने अपनी आत्मकथा 'नोबडीज़ गर्ल: ए मेमोइर ऑफ़ सर्वाइविंग एब्यूज़ एंड फाइटिंग फॉर जस्टिस' में एक ऐसा दावा किया है जिसने वैश्विक सत्ता प्रतिष्ठानों को झकझोर कर रख दिया है। गिउफ्रे का कहना है कि जेफरी एपस्टीन के निजी द्वीप पर उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के पास भेजा गया, जिसे उन्होंने पुस्तक में “एक प्रसिद्ध प्रधानमंत्री” के रूप में संदर्भित किया है। यह सत्ता, सेक्स और साज़िश का ऐसा काला अध्याय है, जिसके तार कई देशों तक फैले हुए प्रतीत होते हैं।

किताब में उस व्यक्ति का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया है, लेकिन गिउफ्रे स्पष्ट करती हैं कि वह व्यक्ति किसी संप्रभु देश का प्रधानमंत्री था और अत्यधिक शक्तिशाली तथा प्रभावशाली था। उनके अनुसार, उस व्यक्ति ने उनके साथ बेहद हिंसक और अमानवीय तरीके से बलात्कार किया। गिउफ्रे का दावा है कि जब वह दर्द और डर के कारण रुकने के लिए विनती कर रही थीं, तब वह व्यक्ति उनकी यातना को देखकर खुश होता था।

गिउफ्रे लिखती हैं कि यह केवल यौन शोषण नहीं था, बल्कि सत्ता के नशे में डूबे व्यक्ति द्वारा किया गया सैडिस्टिक अत्याचार था, जिसमें पीड़िता की असहायता ही अपराधी के लिए मनोरंजन बन गई। पुस्तक के अनुसार, यह घटना एपस्टीन के उस सुनियोजित नेटवर्क का हिस्सा थी, जहाँ नाबालिग और युवा महिलाओं को तोहफे की तरह प्रभावशाली पुरुषों के पास भेजा जाता था।

अब जब एपस्टीन फाइल्स के कुछ हिस्से सार्वजनिक हुए हैं, तो सवाल अमेरिका तक सीमित नहीं रह गए। भारत भी चर्चा के केंद्र में आ गया है। दावा किया गया है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही दिनों बाद, जेफरी एपस्टीन ने एक ईमेल में अमेरिकी अरबपति टॉम प्रिट्जकर से “जेटली और मोदी के साथ मिलकर भारत का भविष्य तय करने” की बात की थी।

एपस्टीन फाइल्स में अनिल अंबानी के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी, पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आना कई सवाल खड़े करता है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी के इज़राइल दौरे से जुड़े विवादों को सरकार ने सिरे से खारिज किया है, लेकिन जेफरी एपस्टीन के कथित प्रभाव को लेकर चर्चाएं लगातार सुर्खियों में हैं। विपक्ष के लिए यह मुद्दा राजनीतिक हथियार बन चुका है और वह इसे हाथ से जाने नहीं देना चाहेगा।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि एप्सटीन फाइल्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम सीधे तौर पर नहीं आया है। उपलब्ध दस्तावेज़ों और कथित संचार में नाम केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी के साथ संदर्भित किया गया है। कानून की दृष्टि से यह भी सच है कि किसी ईमेल, संदेश या बातचीत में नाम का उल्लेख मात्र किसी अपराध का प्रमाण नहीं होता। न तो इससे दोष सिद्ध होता है और न ही आपराधिक मंशा स्वतः स्थापित होती है।

लेकिन लोकतंत्र केवल अदालतों और सज़ाओं से नहीं चलता, वह जवाबदेही, पारदर्शिता और सवाल पूछने के अधिकार पर टिका होता है। जब जेफरी एपस्टीन जैसा व्यक्ति, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यौन तस्करी और सत्ता-संरक्षित अपराधों का प्रतीक बन चुका है, भारत के शीर्ष राजनेताओं और प्रभावशाली लोगों के बारे में बातचीत करने या दावा करने का आत्मविश्वास दिखाता है, तो यह स्वाभाविक रूप से असहज करने वाला प्रश्न खड़ा करता है।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और बिल गेट्स की माफ़ी के बाद यह आशंका और गहरी हो गई है कि आने वाले दिनों में माफ़ीनामों की सूची लंबी हो सकती है। क्योंकि 9 फरवरी को जब जेफरी एपस्टीन की क्राइम पार्टनर गिलेन मैक्सवेल अमेरिकी संसद के सामने गवाही देंगी, तो हो सकता है सत्ता के कई चेहरों से नक़ाब उतर जाए।

असल सवाल यह है कि क्या यह गवाही सिर्फ़ एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगी, या फिर सत्ता, सेक्स और साज़िश के इस वैश्विक काले अध्याय पर सच की रोशनी पड़ेगी? फिलहाल, अमेरिका से भारत तक 'फिंगर क्रॉस' करने का वक्त आ गया है। क्योंकि एपस्टीन फाइल्स को लेकर यह आशंका जताई जा रही है कि कभी मोदी सत्ता के क़रीबी माने जाने वाले उद्योगपति अनिल अंबानी से जुड़े कुछ नए तथ्य सामने आ सकते हैं। 

यदि ऐसा होता है, तो भारत के लोकतांत्रिक हित में यही बेहतर होगा कि ये तथ्य व्यक्तिगत या कारोबारी स्तर तक सीमित हों और उनका सीधा या परोक्ष संबंध मौजूदा राजनीतिक सत्ता से न जुड़ता हो। क्योंकि ऐसे किसी भी खुलासे का असर केवल किसी व्यक्ति की छवि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह देश की राजनीतिक विश्वसनीयता और संस्थागत भरोसे को भी प्रभावित करता है। इसी कारण, अटकलों और संभावनाओं के इस दौर में पारदर्शिता और स्पष्टता भारत के हित में सबसे ज़रूरी है।


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