एपस्टीन जांच कंप्रोमाइज्ड : मैक्सवेल की खामोशी और लोकतांत्रिक भरोसे का संकट!
एपस्टीन जांच कंप्रोमाइज्ड: मैक्सवेल की खामोशी और लोकतांत्रिक भरोसे का संकट!
ले o- अरुण कुणाल
एपस्टीन की पूर्व प्रेमिका और सबसे करीबी सहयोगी रहीं घिसलेन मैक्सवेल ने अमेरिकी कांग्रेस (हाउस ओवरसाइट कमेटी) के सामने गवाही देने से इनकार कर दिया। करीब साढ़े तीन मिनट का जो वीडियो सार्वजनिक किया गया, उसने अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में निराशा पैदा की। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों दलों के सांसदों ने इसे जांच में रुकावट बताया। मैक्सवेल जैसी मुख्य आरोपी से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह एपस्टीन नेटवर्क के उन अंधे कोनों पर रोशनी डालेंगी, जिन तक अब तक कानून नहीं पहुंच पाया है।
मैक्सवेल ने अपने पांचवें संशोधन (Fifth Amendment) के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कहा कि वह ऐसे किसी भी सवाल का जवाब नहीं देंगी, जिससे उन्हें खुद को अपराधी ठहराने का खतरा हो। समिति टेक्सास की संघीय जेल से वीडियो कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए उनकी गवाही लेना चाहती थी, लेकिन हर सवाल पर उन्हें एक ही जवाब मिला-खामोशी!
मैक्सवेल के इस रुख़ को केवल कानूनी बचाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा। दरअसल, इसके तुरंत बाद उनके वकील की ओर से दिया गया बयान मामले को और पेचीदा बना देता है। मैक्सवेल के वकील ने दावा किया कि उनकी मुवक्किल “पूरी तरह और ईमानदारी से गवाही देने को तैयार हैं”, लेकिन इसके लिए एक शर्त है कि उन्हें राष्ट्रपति की माफ़ी (Presidential Pardon) दी जाए।
मैक्सवेल के वकील के अनुसार, यदि माफ़ी मिलती है तो मैक्सवेल एपस्टीन से जुड़े कई हाई-प्रोफाइल नामों के बारे में बयान देने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ऐसे बयानों में डोनाल्ड ट्रंप और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को किसी भी तरह के गलत काम से बरी करने वाली बातें शामिल हो सकती हैं।
यह बयान अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है। पहला, क्या सच्चाई अब न्याय के बजाय सौदेबाज़ी का विषय बन चुकी है? दूसरा, क्या राष्ट्रपति की माफ़ी के बदले “चुनिंदा सच” सामने लाने की कोशिश हो रही है? और तीसरा, क्या यह पूरा मामला सत्ता, कानून और नैतिकता के बीच खड़े टकराव का उदाहरण बनता जा रहा है?
यह पूछताछ ऐसे समय में हो रही थी जब सांसद यह पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि प्रभावशाली फाइनेंसर जेफरी एपस्टीन कैसे वर्षों तक नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण करता रहा और उसे किन-किन लोगों का संरक्षण मिला। जांच का दायरा केवल एपस्टीन तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी लोगों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है जो किसी भी रूप में उसके नेटवर्क से जुड़े रहे।
डेमोक्रेटिक प्रतिनिधि रो खन्ना ने साफ कहा कि वह डोनाल्ड ट्रम्प के साथ मैक्सवेल के सामाजिक संबंधों और संभावित राष्ट्रपति माफी को लेकर सवाल करना चाहते थे, लेकिन मैक्सवेल ने सहयोग नहीं किया। रो खन्ना एपस्टीन फाइल्स को सार्वजनिक करने की मुहिम के सबसे मुखर चेहरा बनकर उभरे हैं। अमेरिका में पले-बढ़े रो खन्ना महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय का वंशज है। शायद यही कारण है कि वे सत्ता से ज़्यादा सार्वजनिक जवाबदेही और पारदर्शिता पर ज़ोर देते नज़र आते हैं।
हाउस ओवरसाइट एंड गवर्नमेंट रिफॉर्म कमेटी की यह जांच सिर्फ यह जानने के लिए नहीं है कि एपस्टीन ने क्या अपराध किए, बल्कि यह समझने के लिए भी है कि अमेरिकी जांच एजेंसियों ने वर्षों तक उसे कैसे नजरअंदाज किया। सवाल यह भी है कि क्या किसी स्तर पर प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश हुई, क्या सबूत दबाए गए और क्या फाइलों को जानबूझकर गलत तरीके से हैंडल किया गया।
जेफरी एपस्टीन की 2019 में जेल में हुई रहस्यमयी मौत के बाद से यह मामला केवल यौन तस्करी तक सीमित नहीं रहा। यह धीरे-धीरे एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की तस्वीर पेश करने लगा, जिसमें अरबपति, राजनेता, नौकरशाह और खुफिया एजेंसियों की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। एपस्टीन की पार्टनर मैक्सवेल, जिसे 2021 में नाबालिगों की यौन तस्करी के मामलों में दोषी ठहराया गया था, इस नेटवर्क की “मैनेजर” मानी जाती रही हैं। अदालत भी यह मान चुकी है कि वह केवल सहयोगी नहीं, बल्कि पूरे अपराध तंत्र की रीढ़ थीं। ऐसे में उसका हर बयान या उसकी हर चुप्पी, सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राजनीतिक और संस्थागत मायने रखती है।
एपस्टीन कांड अब केवल अमेरिका का यौन अपराध मामला नहीं रहा। सार्वजनिक हुई फाइल्स और कथित ईमेल्स ने इसे एक अंतरराष्ट्रीय सत्ता-नेटवर्क की कहानी में बदल दिया है। भारत का नाम इसी संदर्भ में चर्चा में आया है। जब एक अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क का संचालक भारत के प्रभावशाली लोगों के बारे में बातचीत करने या दावा करने का आत्मविश्वास दिखाता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। मैक्सवेल की चुप्पी इन सवालों को और गहरा करती है।
भारत के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “कंप्रोमाइज्ड” बताए जाने का बयान महज़ एक राजनीतिक हमला नहीं रह जाता। राहुल गांधी का आरोप है कि नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय दबावों में फैसले ले रहे हैं, भले ही यह एक राजनीतिक दावा हो, लेकिन एपस्टीन फाइल्स, मैक्सवेल की चुप्पी और अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान की असहजता ऐसे आरोपों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना भी मुश्किल बना देती है। यह मामला व्यक्ति विशेष से आगे बढ़कर संस्थागत भरोसे का सवाल बन जाता है।
मैक्सवेल के वकील का यह कहना कि राष्ट्रपति की माफ़ी मिलने पर वह “ईमानदार से गवाही” देने को तैयार हैं, इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बना देता है। अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सच्चाई राजनीतिक मोलभाव का हिस्सा बनती है, तो उसके असर से भारत जैसे लोकतंत्र भी अछूते नहीं रह सकते। भारत की विदेश नीति, रक्षा सौदे और रणनीतिक साझेदारियाँ इसी भरोसे पर टिकी होती हैं कि फैसले संप्रभु हित में लिए जा रहे हैं, न कि किसी दबाव के तहत।
अटकलों के आधार पर किसी को दोषी ठहराना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ़ है। लेकिन सवाल पूछने से डरना भी उतना ही खतरनाक है। भारत में अक्सर “राष्ट्रीय हित” के नाम पर असहज सवालों को खारिज कर दिया जाता है। एपस्टीन कांड बताता है कि अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क और सत्ता संरचनाएं कितनी गहराई से जुड़ी हो सकती हैं।
घिसलेन मैक्सवेल की चुप्पी अपने आप में एक बयान है। यह बताती है कि एपस्टीन कांड अभी समाप्त नहीं हुआ है। सच्चाई मौजूद है, लेकिन वह कानूनी अधिकारों, राजनीतिक सौदों और सत्ता समीकरणों के बीच फंसी हुई है। असल सवाल यह नहीं कि मैक्सवेल ने क्या कहा, बल्कि यह है कि क्या भारत ऐसे वैश्विक सत्ता-जाल के बीच भी अपने लोकतांत्रिक भरोसे और संप्रभु निर्णय-क्षमता को सुरक्षित रख पाएगा?
अब सवाल यह नहीं रह गया कि मैक्सवेल अगली सुनवाई में क्या कहेंगी, बल्कि यह है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाएं इस खामोशी के बावजूद सच तक पहुंचने की इच्छाशक्ति दिखा पाएंगी। क्योंकि अगर इस मामले में भी सच्चाई सौदेबाज़ी की भेंट चढ़ गई, तो यह केवल एक अपराध की कहानी नहीं रहेगी, यह लोकतांत्रिक भरोसे की हार की कहानी बन जाएगी।
एपस्टीन केस में टाल - मटोल विपक्ष को राजनीतिक हथियार देता है और सत्ता पक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में ले आता है। आने वाले समय में, खासकर चुनावी राजनीति में, “एपस्टीन फाइल्स” और “कंप्रोमाइज्ड पीएम” जैसे शब्दों का इस्तेमाल और तेज़ होने की संभावना है। ऐसे में “कंप्रोमाइज्ड” होने का आरोप केवल व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर सवाल बन जाता है।


Comments
Post a Comment