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Showing posts from July, 2026

मेसी का सपना टूटा, स्पेन ने रचा इतिहास; लामिन यामाल बने विश्व फुटबॉल के नए पोस्टर बॉय!

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  मेसी का सपना टूटा, स्पेन ने रचा इतिहास; लामिन यामाल बने विश्व फुटबॉल के नए पोस्टर बॉय!                            लेखक - अरुण कुणाल  फीफा विश्व कप 2026 कई मायनों में इतिहास के सबसे भव्य, विस्तृत और रोमांचक संस्करणों में से एक साबित हुआ। 48 टीमों ने इस महाकुंभ में हिस्सा लिया और पहली बार ही इसका आयोजन तीन देशों (अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा) ने संयुक्त रूप से किया। नार्वे और इंग्लैंड की टीमों के चौंकाने वाले प्रदर्शन, रोमांचक नॉकआउट मुकाबलों, नेमार और क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे दिग्गजों की भावुक विदाई और अर्जेंटीना–स्पेन के ऐतिहासिक फाइनल ने इस विश्व कप को लंबे समय तक यादगार बना दिया। भारत में फीफा विश्व कप की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अर्जेंटीना और स्पेन के बीच खेले गए फाइनल मुकाबले को देखने के लिए दिल्ली के कई रेस्टोरेंट, स्पोर्ट्स बार और कैफे सुबह चार बजे तक खुले रहे। देर रात से लेकर भोर तक फुटबॉल प्रेमियों का उत्साह देखते ही बनता था। भारत में लियोनेल मेसी के प्रशंसकों की बड़ी सं...

सोनम वांगचूक और राहुल गांधी: एक फूल दो माली! कॉकरोच का हाथी से टक्कर, 20 जुलाई को आंदोलन का हो सकता है निर्णायक मोड़!

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सोनम वांगचूक और राहुल गांधी: एक फूल दो माली! कॉकरोच का हाथी से टक्कर, 20 जुलाई को आंदोलन का हो सकता है निर्णायक मोड़!                               लेखक: अरुण कुणाल "हाथी से टकराना" मुहावरा सुनते ही मुझे जैन टीवी के दिनों की एक पुरानी याद ताज़ा हो जाती है। उस दौर में जैन टीवी के प्रमोटर डॉ. जे.के. जैन और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान सचिव एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा के बीच टकराव की चर्चा मीडिया जगत में खूब होती थी। इस संघर्ष का असर संस्थान की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ा। हालत इतनी खराब हो गई थी कि कर्मचारियों को समय पर वेतन तक नहीं मिल पाता था। एक समय जैन टीवी पत्रकारिता की सबसे बड़ी पाठशालाओं में गिना जाता था। आज देश के कई बड़े पत्रकार वहीं से निकले हैं। उन दिनों सुशांत सिन्हा, रमेश भट्ट और मैं संस्थान के "युवा तुर्क" माने जाते थे। प्रबंधन के खिलाफ वरिष्ठों के आंदोलन में हमें भी आगे कर दिया गया था। अंततः डॉ. जे.के. जैन के साथ एक निर्णायक बैठक हुई। उसी बैठक में उन्होंने कहा था—"मर...

लोकतंत्र के ढहते स्तंभों के बीच सत्याग्रह की बदलती गूंज: अन्ना हज़ारे से सोनम वांगचुक तक गांधीवादी सत्याग्रह की प्रासंगिकता!

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  लोकतंत्र के ढहते स्तंभों के बीच सत्याग्रह की बदलती गूंज: अन्ना हज़ारे से सोनम वांगचुक तक गांधीवादी सत्याग्रह की प्रासंगिकता!                            लेखक - अरुण कुणाल  सोनम वांगचुक को अधिकांश लोग "3 इडियट्स" फिल्म के प्रेरणा स्रोत के रूप में जानते हैं, लेकिन उनका वास्तविक परिचय लद्दाख के पर्यावरण, संस्कृति और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में है। इस संघर्ष के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आज वे लद्दाख से दिल्ली आकर युवाओं के राष्ट्रीय आंदोलन का न केवल अन्ना हज़ारे की तरह प्रमुख चेहरा हैं, बल्कि गांधीवादी सत्याग्रह की एक चलती-फिरती प्रयोगशाला भी बन चुके हैं। भारतीय लोकतंत्र में अनशन केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति का प्रतीक रहा है। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और उपवास को सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का ऐसा हथियार बनाया, जिसमें हिंसा नहीं, बल्कि आत्मबल और जनमत की ताकत होती है। स्वतंत्र भारत में यदि किसी अनशन ने राष्ट्रीय राजनीति को सबसे अधिक प्रभ...