लोकतंत्र के ढहते स्तंभों के बीच सत्याग्रह की बदलती गूंज: अन्ना हज़ारे से सोनम वांगचुक तक गांधीवादी सत्याग्रह की प्रासंगिकता!

 


लोकतंत्र के ढहते स्तंभों के बीच सत्याग्रह की बदलती गूंज: अन्ना हज़ारे से सोनम वांगचुक तक गांधीवादी सत्याग्रह की प्रासंगिकता!


                          लेखक - अरुण कुणाल 


सोनम वांगचुक को अधिकांश लोग "3 इडियट्स" फिल्म के प्रेरणा स्रोत के रूप में जानते हैं, लेकिन उनका वास्तविक परिचय लद्दाख के पर्यावरण, संस्कृति और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में है। इस संघर्ष के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आज वे लद्दाख से दिल्ली आकर युवाओं के राष्ट्रीय आंदोलन का न केवल अन्ना हज़ारे की तरह प्रमुख चेहरा हैं, बल्कि गांधीवादी सत्याग्रह की एक चलती-फिरती प्रयोगशाला भी बन चुके हैं।

भारतीय लोकतंत्र में अनशन केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति का प्रतीक रहा है। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और उपवास को सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का ऐसा हथियार बनाया, जिसमें हिंसा नहीं, बल्कि आत्मबल और जनमत की ताकत होती है। स्वतंत्र भारत में यदि किसी अनशन ने राष्ट्रीय राजनीति को सबसे अधिक प्रभावित किया, तो वह 2011 में अन्ना हज़ारे का जनलोकपाल आंदोलन था। 

आज, लगभग डेढ़ दशक बाद, जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन के समर्थन में सोनम वांगचुक का अनशन एक बार फिर लोकतंत्र, जवाबदेही और जनभागीदारी पर सवाल खड़े कर रहा है। लेकिन इन दोनों आंदोलनों के बीच सबसे बड़ा अंतर केवल मुद्दों का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका का भी दिखाई देता है।

2011 में अन्ना हज़ारे के अनशन ने देश की राजनीति की दिशा बदल दी। रामलीला मैदान और जंतर-मंतर से दिन-रात सीधा प्रसारण होता था। लगभग हर राष्ट्रीय समाचार चैनल पर आंदोलन प्रमुख खबर बना रहता था। अन्ना हज़ारे भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावनाओं का चेहरा बन गए थे। मीडिया ने आंदोलन को व्यापक मंच दिया और करोड़ों लोग उससे भावनात्मक रूप से जुड़ गए। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उस दौर में टेलीविज़न मीडिया स्वयं उस जनआंदोलन का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया था।

इसके विपरीत, जंतर-मंतर पर CJP के आंदोलन और उसके समर्थन में सोनम वांगचुक के लंबे अनशन को राष्ट्रीय समाचारों में जगह तो मिली है, लेकिन उसकी निरंतरता और प्रमुखता को लेकर बहस जारी है। कई समाचार संस्थानों ने उनके अनशन, बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति और आंदोलन की मांगों पर रिपोर्ट प्रकाशित की हैं, किंतु  2011 जैसी चौबीसों घंटे की टीवी बहस और रिपोर्टिंग देखने को नहीं मिल रही है।

यह तुलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों आंदोलनों की आत्मा गांधीवादी सत्याग्रह में निहित है। अन्ना हज़ारे ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध नैतिक दबाव बनाया था, जबकि सोनम वांगचुक ने शिक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही के प्रश्नों को लेकर अनशन का रास्ता चुना है। दोनों ही मामलों में आंदोलनकारियों ने लोकतांत्रिक और अहिंसक माध्यम अपनाए। दोनों ने जनता और सरकार के बीच संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। फिर भी दोनों आंदोलनों की सार्वजनिक दृश्यता अलग-अलग रही है।

इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे मुख्य कारण मीडिया संस्थानों का व्यवसायीकरण है! ऐसे वातावरण में समाचार भी एक बाज़ारू उत्पाद में बदलने लगते हैं और दर्शकों या पाठकों को जागरूक नागरिक के बजाय विज्ञापनदाताओं के लिए "उपभोक्ता" या "उत्पाद" के रूप में देखा जाने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि जनहित से जुड़े गंभीर मुद्दों की अपेक्षा टीआरपी, क्लिक और व्यावसायिक लाभ देने वाली खबरों को प्राथमिकता मिलने लगती है। 

अन्ना आंदोलन के समय मीडिया परिदृश्य आज से भिन्न था। उस समय टीवी मीडिया जनमत निर्माण का सबसे प्रभावशाली माध्यम था। आज सूचना का बड़ा हिस्सा या यू कहे कि सत्ता विरोधी खबरें डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और सोशल मीडिया पर स्थानांतरित हो चुका है। आज पत्रकारिता की निष्पक्षता, गहराई और सामाजिक उत्तरदायित्व पर सवाल उठ रहे है, जिससे लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में मीडिया की विश्वसनीयता खोती जा रही है।

राष्ट्रीय मीडिया लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। उसका दायित्व केवल सूचना देना नहीं, बल्कि जनहित के मुद्दों को समाज के सामने लाना भी है। यह आवश्यक नहीं कि हर आंदोलन को समान समय या समान महत्व मिले, लेकिन यह अपेक्षा अवश्य रहती है कि अहिंसक, लोकतांत्रिक और जनहित से जुड़े आंदोलनों पर संतुलित, निरंतर और तथ्यपरक रिपोर्टिंग हो, ताकि नागरिक स्वयं सूचित राय बना सकें।

फिर भी एक बड़ा प्रश्न बना रहता है कि क्या लोकतंत्र में शांतिपूर्ण आंदोलनों को समान संवेदनशीलता और गंभीरता से सुना जा रहा है? लोकतंत्र की कसौटी केवल चुनाव नहीं होते, उसकी असली परीक्षा तब होती है जब नागरिक बिना हिंसा के अपनी बात रखते हैं और सत्ता उनकी बात सुनने का धैर्य दिखाती है। यदि संवाद की जगह चुप्पी और विमर्श की जगह ध्रुवीकरण ले ले, तो लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है।

दुर्भाग्य से आज लोकतांत्रिक विमर्श का स्तर लगातार गिरता दिखाई देता है। किसी भी आंदोलन को उसके मुद्दों के आधार पर समझने के बजाय उसे राजनीतिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। परिणामस्वरूप वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं और आरोप-प्रत्यारोप आगे आ जाते हैं। यदि कोई शिक्षक, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता या नागरिक संगठन अपनी माँगों के समर्थन में शांतिपूर्ण अनशन करता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का पहला दायित्व होना चाहिए कि वह उसकी बात सुने, न कि उसे केवल विरोधी खेमे का हिस्सा मानकर खारिज कर दे।

अन्ना आंदोलन के दौरान तत्कालीन मनमोहन सरकार अन्ना हज़ारे और उनकी कमेटी से लगातार बातचीत कर रही थी। सरकार के कई मंत्री और प्रतिनिधि आंदोलन को समाप्त करने और गतिरोध को सुलझाने के लिए लगातार अन्ना के संपर्क में थे। लेकिन इस बार सरकार की तरफ़ से बातचीत का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है और इस बात का इंतज़ार हो रहा है कि 'कॉकरोच' कोई गलती करें, ताकि उनके आंदोलन को कुचला जा सके। 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च वह मौका हो सकता है।

सोनम वांगचुक का संघर्ष इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने आंदोलन को गांधीवादी मूल्यों से जोड़ा। उनका आग्रह रहा कि सरकार जनता की बात सुने, संवाद करे और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास कायम रखे। यह वही संदेश है जो कभी गांधी ने दिया था और जिसे अन्ना हज़ारे ने अपने आंदोलन में दोहराया था।

शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों का विषय नहीं है, यह समाज के भविष्य का निर्माण करती है। इसलिए शिक्षा से जुड़े किसी भी विवाद या आंदोलन का समाधान संवेदनशीलता, पारदर्शिता और बातचीत के माध्यम से होना चाहिए। शिक्षा मंत्रालय और आंदोलनकारियों के बीच खुला संवाद न केवल तत्काल विवाद को सुलझा सकता है, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास को भी मजबूत कर सकता है।

जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन और सोनम वांगचुक का सत्याग्रह हमें एक साझा संदेश देते हैं! लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान के प्रावधानों से नहीं होती, बल्कि उन मूल्यों से होती है जो नागरिकों और सरकार दोनों को संवाद, धैर्य और संवेदनशीलता के साथ जोड़ते हैं। यदि लोकतंत्र के स्तंभ कमजोर पड़ रहे हैं, तो गांधीवादी सत्याग्रह आज भी उन्हें संभालने का नैतिक आधार प्रदान करता है। यही उसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।

संसद में विपक्ष, न्यायपालिका में न्याय, मीडिया में प्रश्न और सड़कों पर शांतिपूर्ण आंदोलन, ये सभी लोकतंत्र के आवश्यक स्तंभ हैं। लेकिन जब जनता को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज़ सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँच रही है, तब वह गांधी के बताए सत्याग्रह के मार्ग की ओर लौटती है। आज जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्री के खिलाफ चल रहा आंदोलन और अनशन इसी लोकतांत्रिक परंपरा की याद दिलाता है। यह केवल किसी मंत्री या किसी एक नीति का विरोध नहीं, बल्कि संवाद, जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की माँग का प्रतीक है।


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