जो "वोट- गणित" को समझ लेगा, वही अगला "सिकंदर" होगा!
जो "वोट-गणित" को समझ लेगा, वही अगला "सिकंदर" होगा!
ले0- अरुण कुणाल
झारखण्ड विधानसभा चुनाव के दौरान मैं अक्सर अपने लेखों और चर्चाओं में कहा करता था कि बीजेपी केवल धनबाद और झरिया में मजबूत दिख रही है और बाघमारा लूज करने वाली है!मेरे आंकलन के अनुसार कांग्रेस बाघमारा में 10% वोट से आगे थी! धनबाद और झरिया का तो सही रहा पर बाघमारा में उल्टा हो गया तो कई लोग सवाल कर रहे है, जो जायज भी है! बाघमारा के चुनावी परिणामों का गणित साधारण नहीं है और इसे मेरे गांव के "मास्टर जी के फॉर्मूले" से ही समझा जा सकता है!
हमारे गांव के एक मैथ टीचर की कहानी बहुत फेमस है! जब मैथ के फार्मूला से सवाल हल नहीं होते थे, तो वे दुबारा कोशिश करने की बजाय कुछ अंक जोड़ - घटाव कर उत्तर सही करने की सलाह देते थे! मसलन उत्तर 135 है और मास्टर जी के फार्मूला से 130 आता है तो वे उसमें 5 जोड़ कर समस्या का हल कर लेते थे! मास्टर जी ने कभी यह सोचने की कोशिश नहीं की कि फार्मूला क्यों गलत है, बल्कि समस्या का तात्कालिक हल खोज लिया।
बाघमारा के कुल वोट शेयर के गणित को "गांव के मास्टर जी" के स्टाइल में समझते हैं:
कांग्रेस: 34.49% (68,847 वोट)
बीजेपी: 43.85% (87,529 वोट)
रोहित यादव, दीपक रवानी और अन्य: 40,010 वोट
अगर अन्य उम्मीदवारों ने केवल कांग्रेस का वोट काटा होता, तो कांग्रेस का वोट 20% के करीब गिरना चाहिए था। लेकिन कांग्रेस का वोट प्रतिशत 34.49% पर स्थिर रहा। यह बताता है कि कांग्रेस का वोट बैंक उतना नहीं टूटा, जितना दावा किया जा रहा है। जबकि 40 हजार वोट अन्य उम्मीदवारों को जाने के बावजूद, बीजेपी का वोट प्रतिशत 43.85% पर स्थिर रहा। यदि अन्य उम्मीदवारों ने दोनों दलों का वोट काटा होता, तो बीजेपी का वोट प्रतिशत कम होना चाहिए!
कही ऐसा तो नहीं, नतीजों को "अनुकूल" बनाने के लिए मास्टर जी ने थोड़ी "जोड़-घटाव की जादूगरी" कर दी। बीजेपी का वोट प्रतिशत स्थिर या बढ़ा हुआ दिखाने के लिए कुछ "अतिरिक्त वोट" जोड़े गए, जो वास्तविकता में मौजूद नहीं थे। कांग्रेस का वोट घटा कर बीजेपी का वोट थोड़ा बढ़ाया गया, ताकि बढ़त "विश्वसनीय" लगे।
गांव के मास्टर जी का फॉर्मूला बाघमारा के चुनाव में बखूबी लागू हुआ! "गणित" के सवाल हल नहीं हो रहे थे, तो कुछ वोट जोड़ दिए, कुछ घटा दिए, और जवाब अपने हिसाब से निकाल लिया। इस "मैथेमेटिकल जादूगरी" ने बीजेपी को बढ़त दिलाई और कांग्रेस को हार! रोहित यादव, दीपक रवानी और अन्य उम्मीदवारों का वोट ऐसा दर्शाया गया जैसे उसने केवल कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया हो, जबकि ऐसा नहीं हुआ।
गांव के मास्टर जी की कहानी आपके लिए भले ही एक मजाकिया किस्सा हो, लेकिन यह ईवीएम या चुनावी प्रक्रियाओं के संदिग्ध व्यवहार की वास्तविकताओं को उजागर करने का बेहतरीन तरीका है। गांव के मास्टर जी के फॉर्मूले ने बच्चों के नंबर बढ़ाए, लेकिन ईवीएम वाले मास्टर जी का फॉर्मूला किसी के चुनावी भविष्य को बढ़ा देता है। फर्क इतना है कि गांव वाले मास्टर जी का खेल मासूम था, लेकिन ईवीएम का खेल लोकतंत्र को हिलाने वाला है।
बाघमारा विधानसभा सीट के चुनाव परिणामों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि इस बार भाजपा का वोट शेयर मामूली रूप से बढ़ा (43.72% से 43.85%), लेकिन कुल मतों में बड़ा अंतर आया। जबकि कांग्रेस का वोट शेयर 43.22% से घटकर 34.49% रह गया, जिसके कारण भाजपा के शत्रुघ्न महतो कांग्रेस के जलेश्वर महतो को 18,682 वोटों के बड़े अंतर से हरा पाने में सफल रहे! जबकि 2019 में दोनों पार्टियों के बीच कांटे की टक्कर थी! 2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी जलेश्वर महतो को 43.22 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 77,208 और भाजपा से ढुलू महतो को 43.72 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 78,087 वोट मिले थे।
अगर हम रोहित यादव और दीपक रवानी के वोट शेयर की बात करें तो इन दोनों ने कुल 34,010 वोट (18,314 + 15,696) हासिल किए, और वे भाजपा के खिलाफ प्रचार कर रहे थे। ऐसे में यह वोट या तो कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकता था या भाजपा को। लेकिन भाजपा का वोट 19,442 बढ़ गया, जबकि कांग्रेस का वोट 8,361 घट गया। मतदान प्रतिशत में वृद्धि हुई, और इसका बड़ा हिस्सा भाजपा को गया। यह विरोधाभास है कि कांग्रेस को नुकसान हुआ, जबकि ऐसा नहीं लग रहा कि दोनों निर्दलीय प्रत्याशियों का प्रभाव भाजपा के मुकाबले कांग्रेस पर अधिक होना चाहिए था।
यदि रोहित यादव और दीपक रवानी को भाजपा के खिलाफ वोट मिला होता, तो भाजपा का वोट 50,000 के अंदर होना चाहिए था और कांग्रेस के खिलाफ वोट मिला होता, तो कांग्रेस का वोट 40,000 के अंदर होना चाहिए था पर ऐसा नहीं हुआ, जो दर्शाता है कि यह एक सामान्य गणितीय ट्रेंड नहीं है। भाजपा के वोट का बढ़ना और कांग्रेस का गिरना, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार भाजपा के खिलाफ थे, असंगत है।
रोहित यादव और दीपक रवानी ने कुल 34,010 वोट हासिल किए। यदि यह पूरा वोट कांग्रेस का माना जाए, तो कांग्रेस का कुल वोट होता: 68,847 + 34,010 = 1,02,857 और यह भाजपा के 87,529 से 15,328 वोट ज्यादा होता।
इस गणित से स्पष्ट है कि रोहित यादव और दीपक रवानी ने कांग्रेस से केवल 8,361 वोट काटे, और शेष वोट कहां से आए, यह स्पष्ट नहीं है। जबकि भाजपा का 19,442 वोट बढ़ना एक संदेहास्पद बात लगती है! यह तब हुआ जब दो बड़े उम्मीदवार रोहित और दीपक ने भाजपा के खिलाफ प्रचार किया। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि भाजपा का वोट आधार अचानक कैसे मजबूत हुआ?
इस बार बाघमारा का मतदान प्रतिशत बढ़ा, और इसका बड़ा हिस्सा भाजपा को गया, जबकि उसके वोट प्रतिशत 2019 के चुनाव के मुकाबले 1% भी नहीं बढ़ा, यह स्वाभाविक नहीं लगता। आमतौर पर मतदान प्रतिशत बढ़ने पर विपक्ष को फायदा होता है, लेकिन यहां भाजपा को हुआ! यदि केवल 8,361 वोट कांग्रेस से कटे होते, तो जलेश्वर महतो को जीतना चाहिए था। लेकिन परिणामों में भाजपा की बड़ी जीत और कांग्रेस की हार ने इस गणित को उलझा दिया है।
आखिरी सवाल, यदि कांग्रेस के बागियों ने केवल 8,361 वोट काटे, तो जलेश्वर महतो की हार का कारण क्या है? या तो भाजपा ने विपक्षी वोटों का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में खींच लिया, या चुनाव के दौरान कोई रणनीतिक हेरफेर हुआ, जिसने गणित को भाजपा के पक्ष में झुका दिया। इस स्थिति में कांग्रेस को गहन आत्ममंथन और विस्तृत जांच की आवश्यकता है।
चुनाव के बाद "जो जीता वही सिकंदर" कहकर चर्चा को विराम देना, खासकर जब चुनावी परिणामों में इतने स्पष्ट संदेश छिपे हों, एक बड़ी भूल है। बाघमारा का 2024 का चुनाव केवल जीत-हार की कहानी नहीं है, बल्कि यह बीजेपी और कांग्रेस जैसे बड़े दलों के लिए एक स्पष्ट सबक और चेतावनी भी है।
2019 के चुनाव में अन्य 13 उम्मीदवारों को 20,000 वोट मिले। यह संख्या तब भी एक संदेश था कि कुछ मतदाता इन दोनों प्रमुख दलों से असंतुष्ट हैं। इस बार यह संख्या दोगुनी हो गई। 2024 के चुनाव में अन्य 11 उम्मीदवारों को 40,000 वोट मिले। इसका मतलब यह है कि 40,000 लोग अब सीधे तौर पर इन दोनों दलों को नकार रहे हैं। वहीं अगर कांग्रेस के वोट (68,847) इसमें जोड़ दिए जाएं, तो 1 लाख से ज्यादा लोग बीजेपी के खिलाफ हैं!
2024 के परिणाम यह संकेत देते हैं कि सिर्फ बड़े नाम, धनबल, और चुनावी सभाओं से चुनाव नहीं जीते जा सकते। स्थानीय पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों को 40,000 वोट मिलना बताता है कि जनता तीसरे विकल्प की तलाश कर रही है। यह संख्या क्षेत्रीय दलों और नए राजनीतिक चेहरों को एक मजबूत आधार प्रदान कर सकती है। बढ़ती असंतोष की यह संख्या 2029 में इनके लिए बड़ा खतरा बन सकती है।
बाघमारा का चुनाव परिणाम एक बड़ी राजनीतिक कहानी कहता है। यह दिखाता है कि जनता बड़े दलों से असंतुष्ट है और नए विकल्प तलाश रही है। बीजेपी और कांग्रेस जैसे दलों को आत्ममंथन करना होगा और बूथ-स्तर पर मजबूत पकड़ बनानी होगी। अगला चुनाव केवल नीतियों से नहीं, बल्कि बूथ-स्तर पर मजबूत नेटवर्किंग और जमीनी काम से जीता जाएगा। 2029 का चुनाव मैदान में नहीं, बल्कि बूथों पर जीता जाएगा। जो इस गणित को समझ लेगा, वही अगला "सिकंदर" होगा।
बीजेपी और कांग्रेस को यह समझना होगा कि मतदाता केवल वादों और भाषणों से प्रभावित नहीं होंगे। उन्हें जमीनी स्तर पर काम करके अपना खोया विश्वास वापस पाना होगा। निर्दलीय उमीदवारों को वोट मिलना, इस बात का प्रमाण हैं कि जनता वैकल्पिक नेतृत्व को जगह दे रही है। इसे नजरअंदाज करना आगामी चुनावों में आत्मघाती साबित हो सकता है!
झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए, बीजेपी को सीमित सीटें मिलनी चाहिए थीं। धनबाद में, जहां 6 सीटें हैं, उनमें से बीजेपी को केवल 1 सीट पर मजबूत दिखाई दे रही थी पर बाघमारा और झरिया जैसे इलाकों में चुनावी नतीजों का अचानक बदलना और वोट प्रतिशत का बढ़ना "खेला" होने की आशंका को बल देता है!
यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। मतदान खत्म होने के बाद वोट प्रतिशत का बदलाव केवल तकनीकी त्रुटि हो सकता है, लेकिन बार-बार ऐसा होना इसे संदिग्ध बनाता है। लोकसभा, महाराष्ट्र, हरियाणा जैसे चुनावों में भी यही पैटर्न दिखा है, जहां विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने ईवीएम और चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
क्या विपक्ष झारखण्ड जैसे राज्यों के भरोसे बैठा रहे, जहां ईवीएम का "खेल" कम है, और वहां से अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाने की कोशिश कर सकता है। अगर विपक्ष को लगता है कि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है, तो चुनाव बहिष्कार एक मजबूत संदेश हो सकता है। इससे जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि विपक्ष लोकतंत्र को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि, इसका जोखिम यह है कि बीजेपी बिना किसी चुनौती के सत्ता पर काबिज हो सकती है।
अगर विपक्ष केवल हार का रोना रोएगा, तो जनता का विश्वास खो देगा। उसे नए विकल्प और समाधान पेश करने होंगे। चुनाव आयोग की प्रक्रिया में सुधार और "बैलेट पेपर" की वापसी जैसे मुद्दों पर दबाव बनाना होगा। विपक्ष को जनता को चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता के महत्व के बारे में शिक्षित करना होगा।
झारखंड, महाराष्ट्र, और हरियाणा के चुनाव नतीजों से यह साफ है कि "मास्टर जी का फॉर्मूला" केवल सवाल खड़ा कर रहा है, जवाब नहीं। "बैलेट पेपर" की मांग जनता के बीच तेजी से समर्थन पा सकती है। कांग्रेस और सम्पूर्ण विपक्ष को अब या तो बड़ी रणनीति बनानी होगी या चुनाव बहिष्कार जैसा साहसी कदम उठाना होगा। जनता का भरोसा लोकतंत्र की नींव है। अगर इसे खो दिया गया, तो विपक्ष ही नहीं, पूरी लोकतांत्रिक प्रणाली खतरे में पड़ सकती है।

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