घटता शिक्षा बजट, बढ़ती चिंताए : बजट...शिक्षा के लिए तू तो हानिकारक है!
घटता शिक्षा बजट, बढ़ती चिंताए : बजट...शिक्षा के लिए तू तो हानिकारक है!
(बजट स्पेशल)
लेखक: अरुण कुणाल
भारत जैसे युवा आबादी वाले देश में शिक्षा केवल एक सामाजिक ज़रूरत नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की बुनियाद है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस देश में राइट टू एजुकेशन जैसे संवैधानिक अधिकार मौजूद हैं, जहाँ “पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालों” जैसी कविताएँ और “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे नारे गढ़े जाते हैं, उसी देश में शिक्षा बजट हर साल प्राथमिकताओं की सूची में सबसे पीछे धकेल दिया जाता है।
क्यूएस सस्टेनेबिलिटी रैंकिंग 2026 में इस बार भारत का प्रदर्शन चिंता बढ़ाने वाला है। विश्व के टॉप 200 यूनिवर्सिटी में भारत का कोई विश्वविद्यालय नहीं, IIT दिल्ली भी बाहर हो गया है! आईआईटी दिल्ली जो पिछले साल की रैंकिंग में 171 वें स्थान पर था, इस साल उसकी रैंकिंग 205 है! आईआईटी जैसे भारतीय संस्थान का ग्लोबल रैंकिंग गिरना चिंता का विषय है!
हर साल 1 फरवरी को पेश होने वाले आम बजट से देश के सभी सेक्टरों को उम्मीदें रहती हैं। शिक्षा क्षेत्र भी इन्हीं उम्मीदों के सहारे हर साल बजट का इंतज़ार करता है। लेकिन अनुभव बताता है कि जब भी वैश्विक दबाव, आर्थिक मंदी या अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर बजट पर पड़ता है, तो सबसे पहले शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक सेक्टरों की बलि दी जाती है।
मोदी सरकार 'मिशन 2047' के तहत विकसित भारत की बात करती है, लेकिन जबतक शिक्षा को नीति और बजट दोनों में प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक यह सपना महज़ भाषणों और पोस्टरों तक सीमित रहेगा। पिछले कुछ वर्षों से यह आरोप लगातार लगते रहे हैं कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट में शिक्षा के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है।
बजट 2026 से भी शिक्षा जगत को बहुत उम्मीदें नहीं हैं। अगर पिछले बजट की तस्वीर देखें तो चिंता और गहरी हो जाती है। जिस तरह महंगाई, आबादी और तकनीकी ज़रूरतें लगातार बढ़ रही हों, वहाँ शिक्षा बजट का घटना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। अब यदि 2026 के बजट में शिक्षा बजट को 6-7 प्रतिशत बढ़ाया भी जाता है, जैसा कि अनुमान लगाए जा रहे हैं तो भी यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होगी। क्योंकि पहले की कटौती की भरपाई के बाद यह बढ़ोतरी वास्तविक प्रगति नहीं, बल्कि नुकसान की मरम्मत भर होगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 ने साफ तौर पर सिफारिश की थी कि जीडीपी का कम से कम 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए। यह कोई नई मांग नहीं है; दशकों से शिक्षा विशेषज्ञ यही कहते आए हैं। लेकिन हकीकत यह है कि पिछले बजट में शिक्षा और उच्च शिक्षा के लिए जीडीपी का केवल 2.9 प्रतिशत ही आवंटित किया गया। यानी घोषित लक्ष्य से आधे से भी कम। सवाल यह है कि जब नीति और बजट के बीच इतना बड़ा अंतर हो, तो नीति का औचित्य ही क्या रह जाता है?
हर साल जनता और शिक्षा विशेषज्ञों को शिक्षा बजट बढ़ने की उम्मीद होती है, लेकिन व्यवहार में शिक्षा को वही बचा-खुचा हिस्सा मिलता रहा है, जो अक्सर अन्य प्राथमिकताओं के बाद बचता है।उच्च शिक्षा की स्थिति और भी चिंताजनक है। यूजीसी,आईआईएम, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के बजट में लगातार कटौती की जा रही है। नतीजा यह है कि शोध कार्य प्रभावित हो रहे हैं, नई नियुक्तियाँ रुक रही हैं और संस्थानों पर आत्मनिर्भरता के नाम पर फीस बढ़ाने का दबाव बढ़ता जा रहा है।जब शिक्षा महंगी होगी, तो स्वाभाविक है कि इसका खामियाज़ा गरीब और मध्यम वर्ग के छात्र ही भुगतेंगे।
शिक्षा बजट की कटौती का सबसे सीधा असर सरकारी स्कूलों पर पड़ा है। सरकार ने संसद में खुद स्वीकार किया है कि बीते पाँच वर्षों में 65.7 लाख बच्चे स्कूल से ड्रॉपआउट हो चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ड्रॉपआउट के मामले में गुजरात सबसे ऊपर है, जबकि उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर। यह आंकड़े किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था की विफलता की ओर इशारा करते हैं।
एक रिपोर्ट बताती है कि 2014–15 से 2023–24 के बीच देश भर में 89,441 सरकारी स्कूल बंद या मर्ज किए गए। 2014–15 में जहाँ सरकारी स्कूलों की संख्या 11,07,101 थी, वह 2023–24 तक घटकर 10,17,660 रह गई। इस प्रक्रिया से करीब 2 करोड़ बच्चों की शिक्षा प्रभावित हुई है।
अगर सरकारी स्कूल इसी रफ़्तार से बंद होते रहे, तो संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत दिया गया 'राइट टू एजुकेशन' का क्या होगा? भारत के संविधान ने 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया है, लेकिन जब पढ़ने के लिए स्कूल ही नहीं रहेंगे, तो यह अधिकार काग़ज़ों से आगे कैसे जाएगा? अधिकार तब तक ही सार्थक है, जब तक उसे लागू करने के लिए संस्थान मौजूद हों।
सरकार का तर्क है कि प्राइवेट स्कूल बेहतर शिक्षा दे रहे हैं, इसलिए बच्चे सरकारी स्कूल छोड़ रहे हैं। लेकिन यह आधा सच है। असल सवाल यह है कि 5 किलो मुफ्त राशन पर ज़िंदगी चलाने वाले परिवार क्या अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों की महंगी फीस, किताबें और यूनिफॉर्म दिला सकते हैं? जब सरकारी स्कूल बंद होते हैं, तो गरीब परिवारों के पास शिक्षा छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यही वजह है कि ड्रॉपआउट के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं।
जिस देश में शिक्षा के निजीकरण के पीछे पैसे की कमी का तर्क दिया जाता है, उसी देश में 'गोबर-गौमूत्र रिसर्च' के नाम पर 3.5 करोड़ रुपये के घोटाले सामने आ जाते हैं। जब दुनिया AI, सेमीकंडक्टर और एडवांस रिसर्च में आगे बढ़ रही है, तब हम गोबर के लेप से एटम बम का असर कम करने जैसे शोधों पर संसाधन खर्च कर रहे हैं। किसी भी आधुनिक समाज के लिए “जय विज्ञान” की जगह “जय बाबा” का नारा विकास का रास्ता नहीं हो सकता।
शिक्षा का भगवाकरण के आरोप के बीच भारत में रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर खर्च जीडीपी का 1% से भी कम है! रिसर्च का टॉपिक साइंस से दूर होता जा रहा है! रिसर्च का कम बजट अपने आप में समस्या है, लेकिन उससे भी बड़ी समस्या है रिसर्च की प्राथमिकताओं का बदलना। विज्ञान, तकनीक, हेल्थ, क्लाइमेट, एग्रीकल्चर जैसे क्षेत्रों को नज़रअंदाज किया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे रिसर्च टॉपिक बढ़ते जा रहे हैं जो मिथक बनाम विज्ञान, इतिहास की पुनर्व्याख्या और वैचारिक पुष्टि के आसपास घूमते हैं।
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की प्रगति की रीढ़ होती है। दुनिया के सबसे शिक्षित देशों ने यह सिद्ध किया है कि शिक्षा में किया गया निवेश ही मजबूत, नवोन्मेषी और समृद्ध समाज की नींव रखता है। जापान, स्वीडन और स्विट्ज़रलैंड जैसे देश शैक्षिक उपलब्धियों के वैश्विक पैमानों पर शीर्ष स्थानों पर हैं, जबकि विश्व का सबसे युवा देश कहलाने वाला भारत शिक्षित राष्ट्रों की सूची में 54वें स्थान पर खड़ा है, जो आत्ममंथन की नहीं, बल्कि नीति-परिवर्तन की मांग करता है!
यह सच है कि ट्रम्प टैरिफ़, वैश्विक मंदी और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच आम बजट पर कठोर फैसले लिए जा सकते हैं। अगर वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और व्यापारिक तनावों के कारण शिक्षा बजट पर कैंची चलती है, तो यह मान लेना गलत नहीं होगा कि शिक्षा क्षेत्र फिर से सबसे ज़्यादा प्रभावित होगा। लेकिन शिक्षा ऐसा क्षेत्र है, जहाँ कटौती नहीं, बल्कि निवेश की ज़रूरत है। देश अपनी वित्त मंत्री से यह उम्मीद कर सकता है कि इस बार लंबे भाषण से बड़ा बजट होगा और शिक्षा को केवल घोषणाओं में नहीं, बल्कि आवंटन में भी प्राथमिकता मिलेगी।
फिलहाल तो शिक्षा मंत्रालय के कर्मचारियों के साथ-साथ पूरा देश निर्मला सीतारमण के 'हलवे' का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है। सवाल बस इतना है कि हलवे के साथ शिक्षा को कितना हिस्सा मिलेगा और कितना फिर से उम्मीदों पर छोड़ दिया जाएगा? इस बार बच्चों को भी मिड-डे मील में हलवे का इंतजार है, लेकिन डर है कि कहीं शिक्षा को फिर से भाषण की चाशनी में लपेटकर खाली न छोड़ दिया जाए और बच्चें गाते न रह जाए -"आ गया, आ गया, हलवा वाला आ गया....!"


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