'वंदे ट्रम्प ट्रेन’ को हरी झंडी का इंतजार: भारत–अमेरिका ट्रेड डील त्रिशंकु की तरह अधर में लटका!




‘वंदे ट्रम्प ट्रेन’ को हरी झंडी का इंतजार: भारत–अमेरिका ट्रेड डील त्रिशंकु की तरह अधर में लटका!


                            लेखक: अरुण कुणाल


भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील इन दिनों त्रिशंकु की तरह अधर में लटकी हुई है - न पूरी तरह टूटी, न ही आगे बढ़ती हुई। इस डील के अटकने की वजह कूटनीतिक दस्तावेज़ों से ज़्यादा अब बयानबाज़ी, अहं और राजनीतिक प्रतीकों में खोजी जा रही है। ताज़ा विवाद तब खड़ा हुआ, जब अमेरिका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तय समय-सीमा में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन नहीं किया, जिससे यह डील पटरी से उतर गई।

अमेरिकी पक्ष की भाषा और लहजा इस पूरे घटनाक्रम को एक कारोबारी सौदे से ज़्यादा ‘डील मेकिंग शो’ में बदल देता है। लुटनिक का यह कहना कि “ट्रेन तीन हफ्ते पहले छूट चुकी थी”, दरअसल अमेरिकी राजनीति की उस मानसिकता को उजागर करता है, जिसमें कूटनीति को भी रियल एस्टेट सौदे की तरह देखा जाता है या तो अभी हाँ कहो, वरना अवसर खत्म।

लुटनिक के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील लगभग अंतिम चरण में थी। सभी शर्तें तय हो चुकी थीं। बस एक औपचारिक राजनीतिक संकेत की कमी रह गई थी! प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्रपति ट्रंप को फोन कॉल। लेकिन यह कॉल नहीं हुआ। अमेरिकी पक्ष का आरोप है कि मोदी इस कॉल को लेकर “असहज” थे और इसी कारण डील अटक गई।

हालाँकि, भारत सरकार ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच करीब आठ बार बातचीत हुई। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर प्रतिबद्धता दोहराई और कई मौकों पर यह डील अंतिम चरण तक पहुँची भी थी। यानी सवाल यह नहीं है कि बातचीत हुई या नहीं, बल्कि यह है कि क्या बातचीत को अमेरिकी शर्तों पर ही आगे बढ़ना था।

दरअसल, इस पूरे विवाद के पीछे एक बड़ा वैचारिक टकराव छिपा है। ट्रंप की राजनीति दबाव, डेडलाइन और धमकी के सहारे सौदे करवाने की रही है। दूसरी ओर, भारत कम से कम आधिकारिक तौर पर अब भी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की बात करता है। लेकिन समस्या यह है कि इस स्वायत्तता और मौन के बीच की रेखा अब धुंधली होती जा रही है।

अगर यह ट्रेड डील हो जाती, तो भारत को टैरिफ के मोर्चे पर बड़ी राहत मिल सकती थी। प्रस्तावित समझौते के तहत 2030 तक भारत–अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया था। यह लक्ष्य सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं था, बल्कि भारत की निर्यात क्षमता, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और रोज़गार सृजन से सीधे जुड़ा हुआ था। डील के अटकने का मतलब है-अनिश्चितता, निवेशकों की हिचक और बाज़ारों में अस्थिरता।

इस अनिश्चितता को और गहरा कर रहा है ट्रंप प्रशासन का टैरिफ युद्ध। अप्रैल 2025 में अमेरिका ने कई देशों पर 10 से 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए थे, जिन्हें अमेरिकी अदालतों में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि राष्ट्रपति को संविधान के तहत इतनी व्यापक आर्थिक शक्तियाँ नहीं दी गई हैं। अब पूरी दुनिया की निगाहें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, क्योंकि उसका फैसला न सिर्फ अमेरिका बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था की दिशा तय करेगा।

भारत की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। ऊर्जा क्षेत्र में भारत पहले से ही दबाव में है। रियल-टाइम डेटा एनालिटिक्स कंपनी केप्लर के अनुसार, दिसंबर 2025 में भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल का आयात घटकर लगभग 12 लाख बैरल प्रति दिन रह सकता है, जो नवंबर के 18.4 लाख बीपीडी से काफी कम है। यह दिसंबर 2022 के बाद का सबसे निचला स्तर होगा। रूस से सस्ते तेल की आपूर्ति भारत के लिए महंगाई नियंत्रण और चालू खाते के संतुलन में अहम भूमिका निभाती रही है।

इसी पृष्ठभूमि में ट्रंप प्रशासन का ‘Sanctioning Russia Act 2025’ भारत के लिए खतरे की घंटी बनकर सामने आया है। इस कानून के तहत उन देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है, जो रूस से तेल, गैस या अन्य रणनीतिक वस्तुओं का व्यापार कर रहे हैं। भारत भी ऐसे देशों में शामिल है। अगर यह कानून सख्ती से लागू होता है, तो इसका सीधा असर भारत के निर्यात, मुद्रा स्थिरता और समग्र अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

यहाँ सवाल सिर्फ अर्थव्यवस्था का नहीं है, बल्कि राजनीतिक छवि का भी है। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति अब तक ‘मजबूत नेता’ और ‘वैश्विक मंच पर भारत की आवाज़’ के रूप में पेश की जाती रही है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में मोदी की चुप्पी लगातार सवालों के घेरे में है। आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या यह रणनीतिक संयम है या निर्णयहीनता?

व्यंग्यात्मक रूप से कहा जाए तो, मोगेम्बो को तो खुश किया जा सकता है, लेकिन ट्रंप को खुश करना आसान नहीं है। ट्रंप तेल, टैरिफ और प्रतिबंधों के जिस खेल में उतरे हैं, उसमें सहयोगी भी कब प्रतिद्वंद्वी बन जाए, कहना मुश्किल है। इस रास्ते पर चलते हुए संभव है कि अगले चौराहे पर ट्रंप खुद को अकेला खड़ा पाएं, लेकिन उससे पहले कई अर्थव्यवस्थाएँ झटके झेल चुकी होंगी।

जहाँ तक प्रधानमंत्री मोदी का सवाल है, आलोचकों का तंज यह है कि उनके पास सोमनाथ मंदिर के स्वाभिमान पर्व के लिए समय है, लेकिन ट्रंप के दबावों का राजनीतिक जवाब देने का समय नहीं। यह तुलना भले तीखी लगे, लेकिन यह उस असहजता को दर्शाती है, जो भारत की वर्तमान कूटनीतिक मुद्रा को लेकर महसूस की जा रही है।

अगर भारत पर वास्तव में 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया गया, तो इसका असर सिर्फ GDP के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा प्रभाव रोज़गार, उद्योग, मुद्रा और अंततः मोदी सरकार की राजनीतिक छवि पर पड़ेगा। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि ‘वंदे ट्रंप ट्रेन’ छूटी या नहीं, बल्कि यह है कि भारत इस वैश्विक व्यापार के 'ट्रम्प स्टेशन' पर जाने का फैसला स्वाभिमान के साथ करता है या दबाव में.....?

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