असम चुनाव में 'ज़ुबीन गर्ग फैक्टर' : बीजेपी का विजय रथ डिरेल होगा या जीत का लगेगा हैट्रिक?




असम चुनाव में 'ज़ुबीन गर्ग फैक्टर' : बीजेपी का विजय रथ डिरेल होगा या जीत का लगेगा हैट्रिक?


                          लेखक – अरुण कुणाल


असम विधानसभा चुनाव कई मायनों में दिलचस्प और बहुस्तरीय होता जा रहा है। एक ओर जहां हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी तीसरी बार सत्ता में वापसी की ओर बढ़ती दिख रही है! वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दों का ऐसा मिश्रण तैयार किया है, जो चुनावी समीकरणों को उलट भी सकता है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा ट्रम्प कार्ड ‘ज़ुबीन गर्ग फैक्टर’ है, जो पारंपरिक चुनावी गणित को चुनौती देता नजर आ रहा है।

असम के तमाम चुनावी सर्वे के अनुसार मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी न केवल मजबूत स्थिति में है, बल्कि हैट्रिक लगाने जा रही है। सर्वे में बीजेपी और उसके सहयोगियों को विधानसभा की 126 सीटों में लगभग 90–98 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। तमाम सर्वे को गलत ठहराते हुए कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को असम की जिम्मेदारी देकर अपना सबकुछ झोंक दिया है। माना जा रहा है कि कांग्रेस की 'समय परिवर्तन यात्रा' और ज़ुबीन गर्ग को न्याय दिलाने का मुद्दा बीजेपी की हैट्रिक के रास्ते में गुगली बॉल साबित हो सकता है।

कांग्रेस ने इस बार आक्रामक रणनीति अपनाई है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की सक्रियता ने चुनाव को राष्ट्रीय विमर्श में ला खड़ा किया है। खास बात यह है कि कांग्रेस इस बार केवल सत्ता विरोधी लहर पर निर्भर नहीं है, बल्कि उसने हिमंत सरकार का भ्रष्टाचार और ‘जस्टिस फॉर ज़ुबीन’ जैसे भावनात्मक मुद्दे को केंद्र में रखकर युवाओं को जोड़ने की कोशिश की है।

चुनावी सर्वे में बढ़त के बावजूद नरेंद्र मोदी और अमित शाह का 'मिशन असम' बीजेपी के लिए इस चुनाव के महत्व को दर्शाता है। हालांकि चुनाव असम में लड़ा जा रहा है, लेकिन नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की चुनावी रैलियों ने इसे राष्ट्रीय महत्व का बना दिया है। एक ओर जहां नरेंद्र मोदी की कोशिश है कि चुनाव स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित रहे, वहीं राहुल गांधी भारत-अमेरिका ट्रेड डील और खाड़ी युद्ध का मुद्दा उठाकर राज्य और केंद्र सरकारों को निशाने पर ले रहे हैं। हालांकि चुनाव असम का है, लेकिन यह धीरे-धीरे नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी की लड़ाई में बदलता जा रहा है।

असम विधानसभा चुनाव में दिवंगत गायक व संगीतकार ज़ुबीन गर्ग की मौत और उससे जुड़ा 'जस्टिस फॉर ज़ुबीन' सबसे बड़ा भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दा बन गया है। इस मामले में कांग्रेस ने सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर न्याय दिलाने का वादा कर बढ़त बनाने की कोशिश की है। राहुल गांधी अपनी हर चुनावी सभा में ज़ुबीन गर्ग का जिक्र करना नहीं भूलते है। असम चुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो, लेकिन 'ज़ुबीन गर्ग फैक्टर' के सामने हिमंत बिस्वा सरमा का हिन्दू-मुस्लिम मुद्दा हल्का पड़ता नजर आ रहा है।

आज इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि असम के युवाओं के लिए “ज़ुबीन मतलब असम, असम मतलब ज़ुबीन” एक भावना बन चुकी है। ज़ुबीन के प्रति यह दीवानगी किसी उम्र, धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि असम की फिज़ाओं में घुल चुकी है। असम के युवाओं को हिमंत सरकार से उम्मीद थी कि वह ज़ुबीन को न्याय दिलाएगी। अगर यह न्याय चुनाव से पहले मिलता, तो बीजेपी को इसका लाभ मिल सकता था, लेकिन अब यह मुद्दा कांग्रेस के पक्ष में जाता दिख रहा है। यही कारण है कि ज़ुबीन गर्ग के समर्थक कांग्रेस के साथ लामबंद हो रहे हैं, जो बीजेपी के लिए चुनौती बन सकता है।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष 19 सितंबर को ज़ुबीन गर्ग की सिंगापुर के सेंट जॉन्स आइलैंड में तैरते समय मृत्यु हो गई थी। सिंगापुर की अदालत ने इसे दुर्घटनावश मौत करार दिया है, लेकिन असम पुलिस की एसआईटी ने कार्यक्रम के आयोजकों और अन्य लोगों के खिलाफ हत्या, गैर-इरादतन हत्या, साजिश और लापरवाही जैसे आरोपों में कार्रवाई की है। मामले की धीमी जांच से फैंस में नाराजगी है।

राहुल गांधी ने हिमंत बिस्वा सरमा को देश का सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री और “मिनी-मोदी” कहकर जुबानी जंग को तेज कर दिया है। अब तक व्यक्तिगत हमलों से बचने वाली प्रियंका गांधी भी हिमंत सरमा पर सीधे निशाना साध रही हैं। कांग्रेस ने सीधे हिमंत बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी रिंकी भुइयां शर्मा को निशाने पर लिया है। आरोप है कि हिमंत की पत्नी के पास तीन विदेशी पासपोर्ट हैं और अमेरिका में उनकी एक कंपनी संचालित होती है। हालांकि इन आरोपों की अब तक कोई न्यायिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन चुनावी माहौल में ऐसे आरोपों का प्रभाव पड़ना तय है।

वहीं बीजेपी इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बता रही है। हिमंत सरमा ‘मियां मुस्लिम’ नैरेटिव, बांग्लादेशी घुसपैठ और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को प्रमुखता देकर इन आरोपों से ध्यान हटाने की कोशिश कर रहे हैं। यही टकराव इस चुनाव को दिलचस्प बना रहा है। एक ओर कांग्रेस भ्रष्टाचार और ‘जस्टिस फॉर ज़ुबीन’ जैसे मुद्दों के जरिए नैतिक और भावनात्मक दबाव बना रही है, वहीं बीजेपी पहचान, सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए अपना आधार मजबूत कर रही है। आखिरकार, सवाल यही है कि असम की जनता किस नैरेटिव को प्राथमिकता देती है?


असम की 126 विधानसभा सीटों के लिए स्पेशल रिवीज़न के बाद इस साल जो फ़ाइनल वोटर लिस्ट जारी की गई है उसमें 2 करोड़ 49 लाख से ज्यादा वोटर हैं! 2016 में 60 सीटों पर जीत हासिल कर असम में पहली बार सत्ता में आई बीजेपी ने पिछले चुनाव में कुल 93 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 60 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि उसके सहयोगी दलों को 15 सीटें मिली थीं। 2016 के मुकाबले एनडीए को बीते चुनाव में 11 सीटों का घाटा हुआ था। वहीं, असम में पिछले एक दशक से विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने पिछली विधानसभा में 95 सीटों पर चुनाव लड़ा था और महज़ 29 सीटें ही जीत पाई थी, जबकि कांग्रेस गठबंधन के बाकी दलों ने 21 सीटों पर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस के लिए राहत की यह बात है कि पिछले चुनाव में दोनों गठबंधन के बीच वोटों का अंतर लगभग 2% का था!

2021 असम विधानसभा चुनाव परिणाम :

बीजेपी : 33% वोट /60 सीट

कांग्रेस: 30% वोट / 29 सीट

AIUDF: 9% वोट / 16 सीट

AGP → 7.90 % वोट / 9 सीट 

UPPL → 3.39 % वोट / 6 सीट 

BOPF → 3.39% वोट / 4 सीट

CPM → 0.84 % वोट 1 सीट

निर्दलीय (IND): 5.9% वोट/ 1 सीट 

केंद्र सरकार लोकसभा और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का कानून पारित कर चुकी है। इसको लेकर संसद का 3 दिन का विशेष सत्र भी 15 अप्रैल से बुलाया जा रहा है! इसके बावजूद असम चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या में गिरावट चिंता का विषय है। वर्ष 2011 में महिला उम्मीदवारों की संख्या 2006 की तुलना में 21.43% बढ़ी थी। 2006 में 70 महिलाओं को टिकट मिला था, लेकिन यह संख्या घटकर 2026 में 59 रह गई है।

बिहार की तरह असम चुनाव में महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। राज्य में 2.5 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें 1.25 करोड़ महिलाएं हैं। इसलिए सत्ताधारी बीजेपी ने  बिहार चुनाव के तर्ज पर ‘अरुणोदय’ योजना के तहत लाखों महिलाओं को आर्थिक सहायता देकर एक बड़ा दांव खेला है, जिसे गेम चेंजर माना जा रहा है। हिमंत सरकार की नकदी योजना असम चुनाव में एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है। वहीं कांग्रेस ने भी कैश ट्रांसफर और ₹50,000 तक की आर्थिक सहायता का वादा किया है। बिहार चुनाव के अनुभव बताते है कि चुनाव के समय सीधी आर्थिक मदद चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है! 

कांग्रेस ने भले ही मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया हो, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद राहुल गांधी के सबसे करीबी गौरव गोगोई एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरे हैं। संसद में उनकी मुखरता और जमीनी संघर्ष ने उन्हें युवाओं के बीच लोकप्रिय बना दिया है। अगर सत्ता परिवर्तन होता है, तो उनकी ताजपोशी लगभग तय मानी जा रही है। शायद यही कारण है कि गौरव गोगोई ने अपना सबकुछ दांव पर लगा रखा है! 

कांग्रेस छोड़कर बीजेपी जॉइन करने वाले कई नेताओं की तुलना में हिमंत बिस्वा सरमा पर बीजेपी का भरोसा उनकी लोकप्रियता को दर्शाता है। कई राज्यों में मुख्यमंत्रियों के पुराने चेहरे बदले जाने के कारण योगी आदित्यनाथ और देवेंद्र फडणवीस के बाद कोई बड़ा नाम नहीं बचा है। अगर इस बार हिमंत सरमा अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब हो जाते हैं, तो पार्टी के अंदर उनका महत्व काफी बढ़ जाएगा।

हिमंत सरमा ने पिछले पांच वर्षों में खुद को नॉर्थ-ईस्ट के योगी आदित्यनाथ के रूप में स्थापित किया है। हालांकि राहुल गांधी उन्हें “मिनी मोदी” कहते हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली उन्हें “मिनी योगी” के करीब लाती है। इस बार हिमंत सरमा का समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा, बांग्लादेशी घुसपैठ, 'मियां मुस्लिम', विकास का नारा और 'बुलडोजर' प्रमुख चुनावी मुद्दे हैं। हिमंत बिस्वा सरमा की व्यक्तिगत लोकप्रियता के अलावा बीजेपी का मजबूत संगठन, संसाधन, नेतृत्व और केंद्रीय योजनाए सफलता की कुंजी है। 

असम में 126 सीटों के लिए 9 अप्रैल को एक फेस में मतदान होगा और 4 मई को नतीजे आएंगे। तमाम सियासी मुद्दों के बावजूद ‘ज़ुबीन गर्ग फैक्टर’ इस चुनाव का सबसे अनिश्चित और शक्तिशाली तत्व बन चुका है। अगर यह मुद्दा व्यापक जनसमर्थन में बदलता है, तो बीजेपी की राह मुश्किल हो सकती है। अंततः, असम चुनाव केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि भावनाओं, पहचान और रणनीति की जंग है। अब देखना यह है कि ‘ज़ुबीन गर्ग फैक्टर’ बीजेपी विजय रथ को रोक पाता है या नहीं? 4 मई को आने वाले नतीजे न केवल असम, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकते हैं।

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