होर्मुज़ संकट पर इस्लामाबाद टॉक: अस्थायी राहत या स्थायी अनिश्चितता?
होर्मुज़ संकट पर इस्लामाबाद टॉक: अस्थायी राहत या स्थायी अनिश्चितता?
पश्चिम एशिया में बीते 40 दिनों से जारी तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की है, जिस पर ईरान और इज़राइल दोनों ने सहमति जताई है। 10-11 अप्रैल को इस्लामाबाद में दोनों पक्षों की बैठक होगी, जिसकी मध्यस्थता पाकिस्तान कर रहा है! यह सीज़फायर ऐसे समय में आया है जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया था।
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन को लेकर 40 दिनों तक जारी राष्ट्रीय शोक के आखिरी दिन सीज़फायर की घोषणा, यानी 40 दिन का युद्ध और 40 दिन का शोक, महज़ संयोग है या प्रयोग? गौरतलब है कि 28 फरवरी 2026 को अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद ईरान में 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था।
डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ संघर्ष विराम के बाद मिडिल ईस्ट में "गोल्डन एज" की शुरुआत होने का दावा किया है। उन्होंने इसे विश्व शांति के लिए एक बड़ा दिन बताते हुए कहा कि ईरान अब स्थिरता और पुनर्निर्माण के लिए तैयार है, जिससे क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि और शांति आएगी। लेकिन सवाल यह है कि मिडिल ईस्ट की अगुवाई कौन करेगा—ईरान, अमेरिका या चीन?
हालांकि, इस संघर्ष विराम के समझौते की सबसे दिलचस्प बात यह है कि दोनों पक्ष इसे अपनी-अपनी जीत बता रहे हैं। इज़राइल ने स्पष्ट कर दिया है कि यह युद्धविराम सीमित दायरे में है और लेबनान पर उसकी सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी। इससे यह साफ है कि क्षेत्रीय शांति अभी भी दूर की कौड़ी है और यह सीज़फायर केवल एक रणनीतिक विराम हो सकता है, न कि स्थायी समाधान!
गूगल मैप में ऊपर से देखने पर होर्मुज़ जलडमरूमध्य पानी की नीली नहर सा दिखाई देता है, लेकिन विश्व की कुल कच्चे तेल की आपूर्ति का 50% नियंत्रण उस देश के पास होता है, जो इस शांत से दिखने वाले नीले पानी पर राज करता हो! फिलहाल इस पर ईरान का कब्ज़ा है और जब तक उसका एकाधिकार है, 40 दिनों के युद्ध के बाद भी इज़राइल और अमेरिका द्वारा अपनी जीत का दावा करना खुद को धोका देने जैसा है।
इस घटनाक्रम में एक और चौंकाने वाला पहलू पाकिस्तान की भूमिका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने बयान में कहा कि यह फैसला शहबाज़ शरीफ़ और पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर के अनुरोध के बाद लिया गया। ट्रंप ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को रोकने के लिए यह शर्त रखी कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य को तुरंत और सुरक्षित रूप से खोला जाए।
ट्रंप का यह बयान कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान में सेना की पारंपरिक भूमिका को देखते हुए आसिम मुनीर का नाम सार्वजनिक रूप से लेना यह दर्शाता है कि इस पूरे घटनाक्रम में सैन्य और राजनीतिक शक्ति का संतुलन किस तरह काम कर रहा है। यह सवाल भी उठता है कि क्या अमेरिका अनजाने में एक और क्षेत्रीय शक्ति को बढ़ावा दे रहा है, जो भविष्य में उसके लिए ही चुनौती बन सकती है।
इस पूरे मामले में भारत की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। खाड़ी युद्ध के दो दिन पहले इजराइल की यात्रा और पाकिस्तान की सक्रिय मध्यस्थता को कुछ विश्लेषक भारत की कूटनीतिक विफलता के रूप में देख रहे हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा मध्यस्थता को ‘दलाल देश’ कहने वाले पुराने बयान के संदर्भ में यह मुद्दा और भी संवेदनशील हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की अनुपस्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक मानी जा रही है।
प्रेसिडेंट ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के अलावा अपने सोशल मीडिया पोस्ट में ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची का बयान भी साझा किया, जिसमें संघर्षविराम की पुष्टि की गई थी। ईरानी विदेश मंत्री ने कहा, “अगर ईरान के खिलाफ हमले रोके जाते हैं, तो हमारी शक्तिशाली सशस्त्र सेनाएं भी अपने रक्षात्मक अभियान रोक देंगी।” यह इस बात को दर्शाता है कि ट्रंप खाड़ी संकट का हल जल्द चाहते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप भी बातचीत को लेकर उत्साहित दिख रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि अमेरिका को ईरान से 10 बिंदुओं वाला प्रस्ताव मिला है, जिसे वह बातचीत के लिए एक व्यवहारिक आधार मानते हैं। उन्होंने कहा कि दो सप्ताह के संघर्षविराम का उपयोग एक बड़े समझौते पर बातचीत के लिए किया जाएगा, जिससे युद्ध को समाप्त किया जा सके।
समझौते के तहत होर्मुज़ जलडमरूमध्य से तेल, गैस और अन्य वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जाएगी, जिसमें ईरानी सेना की भूमिका अहम होगी। इसके बदले में ईरान शुल्क वसूलेगा। यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से ईरान को आर्थिक और रणनीतिक बढ़त देती है। अमेरिकी और इज़राइली दावों के बावजूद, इस समझौते में ईरान का पलड़ा भारी नजर आता है।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने दावा किया है कि अमेरिका ने उसका 10-सूत्रीय प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है। यह दावा भले ही पूरी तरह सत्यापित न हो, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि ईरान इस समझौते को अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है!
इस बार मामला कुछ आगे बढ़ता नज़र आ रहा है। अब तक पाकिस्तान की मध्यस्थता को अस्वीकार कर रहा ईरान भी नरम दिख रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने सीज़फायर से एक कदम आगे बढ़ाते हुए अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधिमंडलों को शुक्रवार, 10 अप्रैल को इस्लामाबाद आने का निमंत्रण दिया, ताकि सभी विवादों के समाधान के लिए आगे बातचीत की जा सके।
दोनों पक्षों के बीच औपचारिक बातचीत 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में शुरू होने वाली है। स्थानीय समय के अनुसार शनिवार की सुबह पहले दौर की बैठक होगी। व्हाइट हाउस की तरफ से इस बैठक में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और राष्ट्रपति ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर भाग लेंगे। Cयह बातचीत ईरान के प्रस्तावों के आधार पर होगी और इसका उद्देश्य दीर्घकालिक समाधान तलाशना है। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि यह वार्ता स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करेगी या नहीं।
ऊर्जा के दृष्टिकोण से यह सीज़फायर वैश्विक बाजारों के लिए राहत लेकर आया है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस का परिवहन होता है। इसके खुलने से शेयर बाजारों में उछाल देखा गया है और ऊर्जा कीमतों में स्थिरता आने की उम्मीद है। भारत जैसे ऊर्जा-निर्भर देशों के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है।
इस पूरे संकट में चीन की भूमिका भी अहम रही है। ईरान के साथ उसके मजबूत संबंध और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर उसकी रणनीति अमेरिका के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। पिछले 40 दिनों के संघर्ष के दौरान चीन ने अपने ऊर्जा हितों को सुरक्षित रखने में सफलता हासिल की है। यही कारण है कि अमेरिका इस युद्ध को लंबा खींचने के पक्ष में नहीं दिखता, क्योंकि इससे ईरान पूरी तरह चीन के प्रभाव में जा सकता है।
मानवीय दृष्टिकोण से भी यह संघर्ष कई मार्मिक तस्वीरें सामने लेकर आया है। ईरान में लोगों ने पावर प्लांट्स और पुलों पर मानव श्रृंखला बनाकर अपने देश के प्रति एकजुटता दिखाई। एक तस्वीर विशेष रूप से चर्चा में रही, जिसमें एक प्रोफेसर खंडहर हो चुकी यूनिवर्सिटी में बैठकर छात्रों को पढ़ा रहा है। यह दृश्य न केवल ईरानी समाज के जज्बे को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि युद्ध के बीच भी जीवन और शिक्षा की धारा रुकती नहीं है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि यह सीज़फायर स्थायी शांति का संकेत नहीं है। ईरान और इज़राइल दोनों की शर्तें और रणनीतियां यह संकेत देती हैं कि यह केवल एक अस्थायी विराम है। भविष्य में संघर्ष के फिर से भड़कने की पूरी संभावना बनी हुई है।
होर्मुज़ संकट पर यह सीज़फायर वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के जटिल समीकरणों का एक उदाहरण है। यह राहत जरूर देता है, लेकिन साथ ही यह भी याद दिलाता है कि पश्चिम एशिया में स्थायी शांति अभी भी एक अधूरा सपना है।
शनिवार को होने वाली ‘इस्लामाबाद टॉक’ एक नाज़ुक मोड़ पर है। यदि दोनों पक्षों की आम सहमति बनती है, तो यह मध्य पूर्व में एक ऐतिहासिक शांति ला सकती है, लेकिन अगर वे ईरान और इज़राइल के आपसी सियासी मुद्दों के बीच अटक गए, तो फिर से विश्व संकट कई स्तरों पर तनाव बढ़ा सकता है।


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