वेस्ट बंगाल चुनाव से पहले महिला आरक्षण पर संसद का विशेष सत्र: बंगाल की 'आधी आबादी' पर TMC और बीजेपी का ‘चुनावी ममता’!

वेस्ट बंगाल चुनाव से पहले महिला आरक्षण पर संसद का विशेष सत्र: बंगाल की 'आधी आबादी' पर TMC और बीजेपी का ‘चुनावी ममता’!

लेखक – अरुण कुणाल

16 अप्रैल से संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाया गया है, जिसमें महिला आरक्षण बिल और डिलिमिटेशन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा प्रस्तावित है। यह समय-चयन अपने आप में राजनीतिक संकेतों से भरा हुआ है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया अपने निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है, क्या यह सत्र वास्तव में नीतिगत सुधार के लिए है, या फिर चुनावी रणनीति का एक सुनियोजित हिस्सा?

विपक्ष की मांग थी कि यह विशेष सत्र पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद आयोजित किया जाए, ताकि इसे चुनावी प्रभाव से अलग रखा जा सके, लेकिन सत्ता पक्ष इस पर अड़ा रहा। जब देश की राजनीति में लगभग हर बड़ा निर्णय चुनावी गणित से प्रभावित होता है, तो बंगाल चुनाव के पहले चरण के मतदान से ठीक पहले महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे को संसद में लाना महज संयोग नहीं माना जा सकता।

गौरतलब है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' वर्ष 2023 में ही पारित हो चुका है। अब इसे 2029 के लोकसभा चुनाव से ही लागू करने के लिए केंद्र सरकार संसद के विशेष सत्र में संशोधन विधेयक लेकर आ रही है। ऐसे में सवाल तो उठेगा कि जो बिल सदन में 3 साल पहले पास हो चुका है, उसे दुबारा लाने का मकसद क्या है? महिला आरक्षण बिल पर दोहराव क्यों?

संसद का यह विशेष सत्र एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है, यदि इसे वास्तव में महिला सशक्तिकरण और लोकतांत्रिक सुधार के दृष्टिकोण से देखा जाए। लेकिन जिस तरह इसका समय और संदर्भ तय किया गया है, वह इसे एक राजनीतिक रणनीति के रूप में भी प्रस्तुत करता है। क्या चुनाव के बीच तमिलनाडु और वेस्ट बंगाल के सांसद समय निकाल पाएंगे? चुनावी मजबूरी के कारण जो राजनीतिक दल बहस में भाग नहीं लेंगे, उन्हें महिला विरोधी माना जाएगा। ऐसे में उन दलों के लिए राजनीतिक दुविधा की स्थिति बन सकती है।

महिला आरक्षण का मुद्दा भारतीय राजनीति में लंबे समय से लंबित रहा है। देश के 20 से अधिक राज्यों में पंचायतों और स्थानीय निकायों में देश की आधी आबादी के लिए 33% से बढ़ा कर 50% सीटें आरक्षित की गई हैं। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम को एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। लेकिन जिस समय इसे चर्चा के लिए चुना गया है, वह इसे एक राजनीतिक टूलकिट के रूप में भी प्रस्तुत करता है।

पश्चिम बंगाल में महिला वोटर्स की भूमिका बेहद निर्णायक रही है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने महिला केंद्रित योजनाओं के जरिए एक मजबूत वोट बैंक तैयार किया है। लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री और रूपश्री जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच ममता बनर्जी की लोकप्रियता को मजबूत किया है।

दूसरी ओर, बीजेपी भी इस वर्ग को साधने में पीछे नहीं है। केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन और ममता बनर्जी के 1500 के जवाब में 3000 हजार रुपय प्रतिमाह का वादा के जरिए महिला मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश की गई है। ऐसे में महिला आरक्षण पर संसद में चर्चा, खासकर चुनाव से ठीक पहले, बीजेपी का महिला वोटर्स को संदेश देने का एक प्रभावी माध्यम बन सकता है।

जहां महिला आरक्षण को लेकर सरकार सक्रिय दिखाई दे रही है, वहीं डिलिमिटेशन के मुद्दे पर उसकी चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। डिलिमिटेशन का सीधा असर सीटों के पुनर्निर्धारण पर पड़ता है, जो राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है। यह मुद्दा विशेष रूप से उन राज्यों के लिए संवेदनशील है जहां जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच असमानता का प्रश्न उठता रहा है। पश्चिम बंगाल भी इससे अछूता नहीं है। लेकिन सरकार इस पर खुलकर बोलने से बच रही है, जिससे यह आभास होता है कि वह इस मुद्दे को फिलहाल राजनीतिक रूप से “सुरक्षित दूरी” पर रखना चाहती है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू द्वारा नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण बिल) के लिए कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखना भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। दो प्रमुख दलों के बीच यह संवाद दिखाता है कि सरकार विपक्ष को साथ लेकर चलने का प्रयास कर रही है, लेकिन समय-निर्धारण को लेकर उसकी प्राथमिकताएं स्पष्ट रूप से चुनावी हैं।

जब तक SIR जैसे मुद्दों पर पारदर्शिता और विश्वास बहाल नहीं होता, तब तक डिलिमिटेशन पर कोई भी बहस अधूरी और संदिग्ध ही रहेगी। विपक्ष का तर्क है कि महिला आरक्षण जैसे गंभीर विषय पर चर्चा को चुनावी माहौल से अलग रखा जाना चाहिए, ताकि इस पर निष्पक्ष और व्यापक विमर्श हो सके। लेकिन सत्ता पक्ष इसे तत्काल लागू करने की बात कर रहा है, जो उसकी राजनीतिक तत्परता को दर्शाता है।

यह विडंबना ही है कि जिस महिला वर्ग को लेकर इतना राजनीतिक शोर है, वही वर्ग कई बार वास्तविक मुद्दों से वंचित रह जाता है। महिला आरक्षण की बात करना आसान है, लेकिन उसे लागू करने के लिए जरूरी संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाएं कहीं अधिक जटिल हैं, खासकर जब उसे डिलिमिटेशन से जोड़ा गया हो।

अभी SIR का मुद्दा ठंडा भी नहीं पड़ा कि डिलिमिटेशन की बहस ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। चुनाव आयोग SIR को लेकर विपक्ष का भरोसा जीतने में असफल रहा है और यही अविश्वास अब डिलिमिटेशन जैसे बड़े और संवेदनशील मुद्दे पर भी छाया हुआ है। ऐसे में सरकार के लिए यह चुनौती आसान नहीं होगी कि वह विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम मतदाता को भी यह भरोसा दिला सके कि आगामी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होगी।

विपक्ष की स्पष्ट मांग है कि हमेशा की तरह 'डिलिमिटेशन' जनगणना के बाद ही कराया जाए। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन का मूल सिद्धांत रहा है। जनसंख्या के अद्यतन आंकड़ों के आधार पर ही सीटों का पुनर्निर्धारण किया जाता है, ताकि प्रतिनिधित्व का गणित वास्तविकता के करीब रहे। यदि इस प्रक्रिया को जल्दबाजी में या अधूरे आंकड़ों के आधार पर किया जाता है, तो यह न केवल राजनीतिक असंतुलन पैदा कर सकता है, बल्कि संघीय ढांचे पर भी असर डाल सकता है।

डिलिमिटेशन केवल गणितीय अभ्यास नहीं है, यह गहराई से राजनीतिक प्रक्रिया है। लोकसभा और विधानसभाओं के सीटों की संख्या बढ़ाने या उनके पुनर्वितरण का असर सीधे-सीधे राज्यों की राजनीतिक ताकत पर पड़ता है। ऐसे में निष्पक्षता सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी दिखनी चाहिए। लेकिन जब SIR जैसे अपेक्षाकृत छोटे पैमाने की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े हो गए हों, तो डिलिमिटेशन जैसे व्यापक बदलाव पर भरोसा बनाना और भी कठिन हो जाता है।

पश्चिम बंगाल में SIR का मामला इस पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। चुनाव आयोग का तर्क है कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना था और फर्जी नामों को हटाना था। लेकिन जब आंकड़े बताते हैं कि करीब 90 लाख वोटर्स सूची से बाहर हो गए, तो यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह जाती। यह सीधे-सीधे लोकतंत्र की बुनियाद 'मताधिकार' पर सवाल खड़ा करती है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन 90 लाख वोटर्स में बड़ी संख्या  में "लापता लेडीज" हो सकती है। खासकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाएं, जिनके पास अक्सर जरूरी दस्तावेज़ नहीं होते या जिनकी पहचान प्रक्रियागत खामियों में खो जाती है। ये वे महिलाएं हैं जिन्हें राजनीतिक दल अपने भाषणों और घोषणाओं में सबसे ज्यादा प्राथमिकता देते हैं लेकिन जमीनी हकीकत में वही सबसे पहले छूट जाती हैं।

यहां एक गंभीर विरोधाभास उभरता है। एक ओर संसद में महिला आरक्षण पर चर्चा हो रही है, महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की बात की जा रही है। दूसरी ओर, लाखों महिलाएं वोटर लिस्ट से बाहर हो रही हैं, यानी उन्हें वोट देने का बुनियादी अधिकार ही नहीं मिल पा रहा। जब आधार ही कमजोर हो, तो आरक्षण की इमारत कितनी मजबूत होगी?

पश्चिम बंगाल की ग्रामीण और निम्न आय वर्ग की महिलाएं आज भी कई बुनियादी समस्याओं से जूझ रही हैं, चाहे वह स्वास्थ्य सेवाएं हों, शिक्षा हो या रोजगार के अवसर। ऐसे में केवल आरक्षण की घोषणा उनके जीवन में तत्काल बदलाव नहीं ला सकती। बंगाल के चुनावी परिदृश्य में महिला वोटर्स की भूमिका निर्णायक है, और यही कारण है कि TMC और बीजेपी उन्हें साधने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। 

जब TMC और BJP दोनों ही महिला वोटर्स को साधने के लिए इस “चुनावी ममता” दिखा रही हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह वास्तविक संवेदनशीलता है या केवल एक चुनावी रणनीति? महिला वोटर्स को योजनाओं के माध्यम से जोड़ना एक सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन उनकी राजनीतिक भागीदारी और अधिकारों की सुनिश्चितता उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। अगर महिला आरक्षण का मुद्दा केवल चुनावी मंच तक सीमित रह जाता है, तो यह उस वर्ग के साथ एक तरह का राजनीतिक अन्याय होगा।

डिलिमिटेशन और महिला आरक्षण जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा जरूरी है, लेकिन उससे पहले यह सुनिश्चित करना और भी जरूरी है कि हर नागरिक, खासकर हर महिला मतदाता सूची में शामिल हो और अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल कर सके। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत संसद की सीटों में नहीं, बल्कि उस एक वोट में होती है, जो हर नागरिक को बराबरी का अधिकार देता है। और तब तक “महिला सशक्तिकरण” और “प्रतिनिधित्व” जैसे शब्द जमीनी सच्चाई से दूर, केवल राजनीतिक नारों तक सीमित रह जाएंगे!

भारत में महिला आरक्षण स्थानीय निकायों से लेकर संसद तक एक महत्वपूर्ण संवैधानिक विकास की गाथा है। ऐसे में, अगर महिला आरक्षण केवल एक चुनावी मुद्दा बनकर रह जाता है, तो यह लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत के खिलाफ होगा, जिसमें हर नागरिक को समान प्रतिनिधित्व और अवसर देने की बात कही जाती है। महिला सशक्तिकरण और लोकतांत्रिक सुधार, न केवल भाषणों और योजनाओं में बल्कि उनकी वास्तविक राजनीतिक भागीदारी और अधिकारों में भी नज़र आना चाहिए ।

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