एग्जिट पोल बनाम ज़मीनी हकीकत: मोशा के लिए ममता का ‘अभेद्य किला’ दक्षिण बंगाल को भेद्य पाना मुश्किल!

 



एग्जिट पोल बनाम ज़मीनी हकीकत: मोशा के लिए ममता का  ‘अभेद्य किला’ दक्षिण बंगाल को भेद्य पाना मुश्किल!

                           लेखक - अरुण कुणाल 

पांचों चुनावी राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में रिकॉर्ड मतदान ने मुकाबले को और भी दिलचस्प बना दिया है, जिसके चलते लोग एग्जिट पोल्स का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। बाकी चार राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल का सट्टा बाजार ज्यादा गर्म नजर आ रहा है। अब तक जो रुझान सामने आ रहे हैं, वे बंगाल की जनता की असली बेचैनी को पूरी तरह बयां नहीं कर पा रहे हैं। जमीनी स्तर पर लोगों में बेचैनी जरूर महसूस की जा रही है, लेकिन यह साफ नहीं है कि यह बदलाव की चाहत है या फिर SIR को लेकर नाराजगी का असर हैं?

गृह मंत्री अमित शाह का यह कहना कि विधानसभा चुनाव के बाद भी केंद्रीय बलों के जवान 60 दिनों तक पश्चिम बंगाल में तैनात रहेंगे, इस बात का संकेत माना जा रहा है कि बंगाल की बेचैनी दिल्ली तक महसूस की जा रही है। यह भी संकेत देता है कि किसी भी अप्रत्याशित रिजल्ट को बंगाल की जनता, खासकर ममता बनर्जी के समर्थकों पर थोप पाना आसान नहीं होगा। इसलिए एग्जिट पोल्स कराने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है!

पश्चिम बंगाल के दूसरे और अंतिम चरण के चुनाव के बाद जो लोग शाम 6 बजे के बाद चुनावी सर्वे का इंतजार कर रहे हैं, उन्हें मेरी सलाह है कि वे 2021 का सर्वे देख लें, शाम तक इंतजार करने की शायद जरूरत नहीं पड़े। क्योंकि कई एग्जिट पोल पहले से तय नैरेटिव के साथ तैयार हैं। 2021 के अनुभव को देखें तो कई आकलन ज़मीन से ज्यादा स्टूडियो और पार्टी दफ्तरों की हवा पर टिके नजर आए थे! इस बार कुछ महानुभाव तो 2021 के सर्वे को ही कॉपी-पेस्ट कर के बैठे हैं, इस उम्मीद में कि जो तब नहीं हुआ, वह शायद 2026 में हो जाए।

आज शाम यह भी दिखाने की कोशिश होगी कि 1975 में जननायक जयप्रकाश नारायण की कार की बोनट पर चढ़कर नारे लगाने वाली और 1977 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को कोलकाता में काला झंडा दिखाने वाली ममता बनर्जी चुनाव हार रही हैं, ताकि परिणाम को लेकर कोई सवाल न उठ सके! एग्जिट पोल कराने वाले पंडितों के तोते को जादुई नंबर दे दिए गए हैं। अब वह तोता घूम-फिर कर वही पर्ची उठाएगा, जिसका निर्देश उसे पहले से दिया गया है।

सर्वे में बताया जाएगा कि महिला आरक्षण बिल के बाद पीएम मोदी का ग्राफ बढ़ा है और महिला आरक्षण का विरोध करने वाली TMC के 5 से 10 प्रतिशत महिला वोट बीजेपी की ओर शिफ्ट हो गए हैं। कुछ सर्वे बढ़े हुए वोटिंग प्रतिशत को एंटी-इनकंबेंसी का संकेत बताएंगे, तो कुछ कांग्रेस को “वोट कटवा” करार देकर 4 मई से पहले ही TMC की हार का नैरेटिव गढ़ देंगे।

पिछले कुछ सालों के अनुभव बताते है कि ज़मीनी हकीकत एग्जिट पोल्स से अलग होते है। झाड़ग्राम में झालमुरी का स्टॉल लगाने वाला विक्रम शॉ हो, कोलकाता में पढ़ाई कर रहा अयान सेनगुप्ता हो या पश्चिम बंगाल का सबसे पिछड़ा और गरीब जिला पुरुलिया की प्रीति सरकार हो, ये वे मतदाता हैं जिनके दरवाजे तक शायद ही कोई एग्जिट पोल वाला पहुंचता हो। आजकल चुनावी सर्वे “राजा बाबू" के सपनों पर टिके लगते हैं, जहां लोकतंत्र का राजा सपने में जितनी सीटें देखता हैं, मीडिया के पंडित उसी के हिसाब से आंकड़ों की इमारत खड़ी कर देते हैं।

बंगाल की राजनीति सिर्फ चुनावी सर्वे के ग्राफ से नहीं समझी जा सकती। यहां मतदाता का व्यवहार अक्सर आखिरी चरण में तस्वीर बदल देता है। कोलकाता से लेकर ग्रामीण इलाके तक, जमीनी स्तर पर मतदाता अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर वोट करता है, न कि टीवी डिबेट के शोर और एग्जिट पोल के आधार पर तय करता है। अंततः एग्जिट पोल एक संकेत दे सकते हैं, लेकिन नतीजे नहीं तय करते। बंगाल में “खेला” का असली फैसला मतपेटियों में बंद है और उसकी तस्वीर 4 मई को ही साफ होगी।

अगर पश्चिम बंगाल का खेला समझना है, तो उसे केवल पहले और दूसरे चरण के मतदान प्रतिशत में नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में भी देखना होगा। बिहार में नीतीश कुमार की बदली हुई राजनीतिक दिशा और पंजाब में राज्यसभा के समीकरणों में आए बदलाव इस बात के संकेत देते हैं कि सियासत अब राज्य की सीमाओं से आगे बढ़कर एक बड़े रणनीतिक खेल का हिस्सा बन चुकी है।

पंजाब में बीजेपी के पास अपने दम पर एक राज्यसभा सांसद जिताने का आंकड़ा नहीं था, वहीं बदले हुए राजनीतिक हालात में उसके पास सभी सातों सीट है। इसलिए नीतीश कुमार का “शिंदेकरण” और आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों का कथित “हृदय परिवर्तन” जैसे उदाहरण 4 मई के बाद बंगाल की कहानी बयां करेगा।

इन सब घटनाक्रमों को जोड़कर देखने पर यह तर्क सामने आता है कि बंगाल का चुनाव केवल राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी असर राष्ट्रीय राजनीति, खासतौर पर राज्यसभा की ताकत पर भी पड़ सकते हैं। अगर किसी पार्टी की राज्यसभा में ताकत बढ़ती है, तो उसे महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में आसानी होती है। ऐसे में बंगाल जैसे बड़े राज्य के चुनाव का असर राष्ट्रीय स्तर पर भी पड़ सकता है।

पहले चरण के मतदान के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने 152 सीटों में से 110 सीटें जीतने का दावा किया था। हालांकि 2021 के आंकड़े कुछ अलग तस्वीर पेश करते हैं! पहले चरण की 152 सीटों में बीजेपी को 59 सीटें मिली थीं, जबकि टीएमसी ने 92 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं अंतिम चरण की 142 सीटों पर पिछली बार बीजेपी को महज 18 सीटें मिली थीं, जबकि टीएमसी ने 123 सीटों पर एकतरफा जीत हासिल की थी। 

साफ है कि बंगाल की लड़ाई काफी हद तक उत्तर और दक्षिण बंगाल के बीच बंटी हुई नजर आती है। पिछले चुनाव में दक्षिण बंगाल टीएमसी का गढ़ साबित हुआ। यहां पार्टी ने क्लीन स्वीप करते हुए 150 से ज्यादा सीटें अपने नाम की थी । कोलकाता की सभी 11 सीटों, हावड़ा की 16 सीटों और झारग्राम की 4 सीटों पर टीएमसी ने एकतरफा जीत हासिल की। इस पूरे क्षेत्र की 111 सीटों में से टीएमसी ने 96 सीटों पर कब्जा जमाया, जबकि बीजेपी केवल 14 सीटें ही जीत पाई।

वहीं उत्तर बंगाल की तस्वीर बिल्कुल अलग रही। यहां की 54 सीटों पर बीजेपी का दबदबा देखने को मिला। टीएमसी यहां केवल 5 सीटें ही जीत पाई थी, वह भी बेहद कम अंतर से। कूचबिहार, अलीपुरद्वार और फालाकाटा जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर बीजेपी ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की। इसके पीछे राजबंशी और मतुआ समुदायों का समर्थन एक अहम कारण माना गया। साथ ही चाय बागान श्रमिकों से जुड़े मुद्दों ने भी बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने में भूमिका निभाई थी, वह वोटर्स इस बार भी बीजेपी के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है।

जो लोग राहुल गांधी के बंगाल चुनाव में प्रचार करने की आलोचना कर रहे हैं, वे यह न भूलें कि आज बीजेपी का जो वोट बैंक दिखता है, उसका एक बड़ा हिस्सा कभी कांग्रेस और वाम दलों के कोर वोटर्स का रहा है। जब पश्चिम बंगाल में बीजेपी का पहली बार खाता खुला और उसे महज 3 सीटें मिलीं, तब कांग्रेस राज्य में दूसरे नंबर की पार्टी थी। 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वाम दलों के गठबंधन को कुल 77 सीटें मिली थीं, जिसमें कांग्रेस के खाते में 44 और वाम दलों के पास 33 सीटें आई थीं।

2021 में जब कांग्रेस और वाम दल शून्य पर सिमट गए, तब बीजेपी 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी। यहां “77” का यह राजनीतिक आंकड़ा दिलचस्प है! 2016 में यही संख्या कांग्रेस-वाम गठबंधन के पास थी और 2021 में बीजेपी के खाते में चली गई। ऐसे में, 100 के आंकड़े को पार कर तीन अंकों में पहुंचना बीजेपी के लिए एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि माना जाएगा।

ऐसे में यदि कांग्रेस इस बार कुछ सीटें निकालने में सफल होती है या अपने प्रदर्शन में सुधार करती है, तो उसका सीधा नुकसान बीजेपी को हो सकता है, क्योंकि वही वोट बैंक वापस खिसक सकता है! राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ममता बनर्जी भी इस समीकरण को भली-भांति समझती हैं। शायद यही वजह है कि उनके सीधे राजनीतिक हमलों का केंद्र अक्सर बीजेपी रहती है, न कि राहुल गांधी या कांग्रेस।

1972 से अब तक के चुनावी रुझानों पर नजर डालें तो पश्चिम बंगाल में एक दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिलता है, जो भी पार्टी सत्ता में आती है, वह आमतौर पर 200 से ज्यादा सीटें हासिल करती है। इस सिलसिले में सिर्फ 2001 अपवाद रहा, जब वाम मोर्चे को 200 से चार सीटें कम, यानी 196 सीटें मिली थीं।

इन आंकड़ों के आधार पर बीजेपी का 110 सीटों का दावा पूरी तस्वीर से मेल खाता नहीं दिखता है। अगर मान भी लिया जाए कि पहले चरण में बीजेपी को बड़ी बढ़त मिलती है, तो दूसरे चरण में करीब 40 अतिरिक्त सीटें जीतकर 200 के पार पहुंचना चुनौतीपूर्ण नजर आता है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि बंगाल की सियासत में केवल दावों से ज्यादा, जमीनी गणित और क्षेत्रीय रुझान निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

टीएमसी और बीजेपी के बीच पिछले चुनाव में जो वोटों का अंतर था, उसे SIR के जरिए काफी हद तक कम होने की बात कही जा रही है। कई सीटों पर लगभग 20 हजार वोट घटने का अनुमान जताया जा रहा है, जो पिछले चुनाव में औसतन 10–15 हजार के जीत के अंतर से कहीं ज्यादा है। अगर इस आकलन को आधार मानें तो मुकाबला पहले से ज्यादा करीबी दिखता है और इससे बीजेपी को संभावित बढ़त मिलने की दलील दी जा रही है। 

इस बार SIR के जरिए पिछले चुनाव के हार-जीत के अंतर को पाटने की कोशिश होती नजर आ रही है। भवानीपुर सीट इसका अहम उदाहरण है! 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी करीब 50 हजार वोटों से जीती थीं, और SIR के बाद भवानीपुर सीट पर लगभग 50 हजार वोट कम होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में मुकाबला अब कहीं ज्यादा करीबी होता दिख रहा है। 

यह कहना गलत नहीं होगा कि SIR के कई मामले सुप्रीम कोर्ट और ट्रिब्यूनल की तारीखों में उलझ कर रह गए। हैरानी की बात यह है कि करीब 65 सरकारी कर्मचारियों के नाम ही मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, जबकि वे चुनाव ड्यूटी पर तैनात हैं। यानी वे चुनाव तो करवा सकते हैं, लेकिन खुद वोट देने के अधिकार से वंचित हो गए हैं। आम वोटर्स की तरह  उन सरकारी बाबुओं को भी सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत मिल नहीं पाया हैं ! 

चुनाव आयोग ने SIR के तहत जिन 27 लाख लोगों के नाम काटे, उनमें से 138 को ट्रिब्यूनल में सुनवाई का मौका मिला, और 136 के नाम वापस जुड़ गए। इस हिसाब से मतदान से वंचित 99% वोटर्स सही हैं। यहां सवाल यह नहीं है कि बाकी वोटर्स सही हैं या नहीं, सवाल यह है कि सभी 27 लाख लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई का मौका क्यों नहीं मिला?

नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी के बीच की जुबानी जंग इस बार “मां, माटी, मानुष” बनाम “घुसपैठिए” की बहस से आगे बढ़ गई है। मीडिया के सामने ऑन कैमरा कुछ भी बोलने से बंगाल के मतदाता कतरा रहे हैं। यही वजह है कि बंगाल के मतदाताओं की वास्तविक बेचैनी या रुझान का सटीक अंदाजा एग्जिट पोल से लगा पाना मुश्किल है। झालमुरी की झाल और मछली का कांटा किसे लगता है, यह जानने के लिए 4 मई तक इंतजार करना  पड़ेगा। तब तक आप चाहें तो आईपीएल की तरह एग्जिट पोल्स का आनंद ले सकते हैं!

मीडिया के कुछ साथियों का यह कहना कि वेस्ट बंगाल लोकतंत्र का अंतिम किला है और ममता बनर्जी के हारने से लोकतंत्र खत्म हो जाएगा, तर्कसंगत नहीं लगता। बंगाल ने ज्योति बसु से लेकर ममता बनर्जी तक का दौर देखा है। किसी के हारने या जीतने से न तो लोकतंत्र मजबूत होता है और न ही कमजोर। एक बात जरूर है कि ममता दीदी की हार से भारतीय राजनीति में राहुल गांधी की स्वीकार्यता पहले से अधिक बढ़ सकती है।

Comments

Popular posts from this blog

धनबाद मेयर चुनाव राजनीतिक का नया प्रयोगशाला: झरिया और बाघमारा के बीच शक्ति -संतुलन की निर्णायक जंग!

डोनाल्ड ट्रम्प का एकतरफा सीजफायर, पीएम मोदी का "टीम इंडिया" का नारा : खाड़ी संकट को बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का इंतज़ार!

धर्मेंद्र देओल : द मैन, द मिथ, द लीजेंड ऑफ़ बॉलीवुड