पिनराई विजयन : द लास्ट कॉमरेड ऑफ़ लेफ्ट मुक्त भारत!
पिनराई विजयन : द लास्ट कॉमरेड ऑफ़ लेफ्ट मुक्त भारत!
भारतीय राजनीति के लंबे और उतार-चढ़ाव भरे इतिहास में वामपंथ एक समय वैचारिक दृढ़ता, संगठनात्मक अनुशासन और जन-आंदोलनों की शक्ति का पर्याय हुआ करता था। लेकिन समय के साथ बदलते राजनीतिक समीकरणों, सामाजिक आकांक्षाओं और नेतृत्वगत निर्णयों ने इस धारा को सीमित कर दिया। आज जब हम केरल की राजनीति को देखते हैं, तो पिनराई विजयन एक ऐसे नेता के रूप में उभरते हैं, जो न केवल अपने राज्य में वामपंथ की अंतिम मज़बूत कड़ी हैं, बल्कि एक युग के समाप्त होने के प्रतीक भी बनते जा रहे हैं।
केरल को लंबे समय तक वामपंथ का गढ़ माना जाता रहा है। यहां की राजनीतिक चेतना, शिक्षा का स्तर और सामाजिक विकास ने वामपंथी विचारधारा को गहराई से जड़ें जमाने का अवसर दिया। लेकिन हाल के वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति में जो बदलाव आया है, उसका प्रभाव केरल पर भी धीरे-धीरे दिखने लगा है। यदि यह कहा जाए कि केरल वामपंथ का आख़िरी किला है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। और इस किले के सबसे प्रमुख प्रहरी हैं—पिनराई विजयन।
कॉमरेड विजयन का नेतृत्व पारंपरिक वामपंथी नेताओं से अलग दिखाई देता है। जहां एक ओर वे पार्टी के सख्त अनुशासन और वैचारिक प्रतिबद्धता को बनाए रखते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक दक्षता और व्यावहारिक राजनीति का भी परिचय देते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान उनकी सरकार की कार्यशैली ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। लेकिन इसके बावजूद, यह भी सच है कि वामपंथ की जड़ें अब पहले जैसी मजबूत नहीं रहीं।
यदि हम इतिहास की ओर लौटें, तो वामपंथ का स्वर्णकाल पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में देखने को मिलता है। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा ने लगातार तीन दशकों से अधिक समय तक शासन किया। ज्योति बासु जैसे नेताओं ने न केवल राज्य बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी छाप छोड़ी। लेकिन 2011 के बाद से बंगाल में वामपंथ का पतन इतना तेज़ हुआ कि वह आज राजनीतिक हाशिये पर पहुंच चुका है। त्रिपुरा में भी यही कहानी दोहराई गई, जहां लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद वाम दल सत्ता से बाहर हो गए और वापसी का रास्ता अब तक नहीं खोज पाए हैं।
इन परिस्थितियों में केरल का महत्व और बढ़ जाता है। लेकिन यहां भी चुनौतियां कम नहीं हैं। भारतीय जनता पार्टी लगातार अपने संगठन का विस्तार कर रही है और वामपंथ की खाली होती जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है। कांग्रेस भी अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के प्रयास में है। ऐसे में वामपंथ के लिए राजनीतिक स्पेस सिकुड़ता जा रहा है।
वामपंथ के पतन के पीछे केवल बाहरी कारण ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि आंतरिक निर्णयों ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1990 के दशक में जब केंद्र में गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपा विकल्प की तलाश हो रही थी, तब ज्योति बासु को प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला था। लेकिन पार्टी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। बाद में स्वयं ज्योति बासु ने इसे “ऐतिहासिक भूल” बताया। यह केवल एक राजनीतिक अवसर का खोना नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथ की संभावनाओं को सीमित कर देने वाला निर्णय था।
इसके बाद 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के विरोध में यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेना भी एक बड़ा राजनीतिक दांव था, जो उल्टा पड़ गया। इससे न केवल केंद्र में वामपंथ का प्रभाव समाप्त हुआ, बल्कि उसकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लग गया। इन निर्णयों का असर धीरे-धीरे राज्यों में भी दिखने लगा और वामपंथ का जनाधार कमजोर होता गया।
फिर भी, यह कहना गलत होगा कि वामपंथ का योगदान समाप्त हो गया है। भारत में भूमि सुधार, मजदूर अधिकार, शिक्षा और खाद्य सुरक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में वामपंथी दलों की भूमिका निर्णायक रही है। पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार की पहल हो या केंद्र में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान शिक्षा का अधिकार और खाद्य सुरक्षा कानून, इन सबमें वामपंथ का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
केरल में भी वामपंथी सरकारों ने सामाजिक विकास के कई मॉडल प्रस्तुत किए हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में केरल का प्रदर्शन देश के अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर रहा है। इसमें वामपंथी नीतियों और दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिसका परिणाम है कि केरल ने हर पाँच साल पर सत्ता परिवर्तन की परंपरा को तोड़कर सीपीआई(एम) को लगातार दो बार मौका दिया।
लेकिन राजनीति केवल उपलब्धियों के आधार पर नहीं चलती, वह निरंतर बदलती सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के साथ खुद को ढालने की मांग करती है। यही वह क्षेत्र है, जहां वामपंथ पिछड़ता हुआ नजर आता है। नई पीढ़ी की आकांक्षाएं, डिजिटल युग की चुनौतियां और वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रभाव, इन सबके बीच वामपंथ को अपनी विचारधारा को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है।
अब केरल में शायद ही वापसी हो, क्योंकि बंगाल हो या त्रिपुरा, लेफ्ट की दोबारा सत्ता में वापसी नहीं हो सकी। केरल इस बात का अपवाद ज़रूर है कि वहाँ 5 साल बाद सत्ता परिवर्तन होता रहता है। यह अलग बात है कि इस बार 10 साल लग गए। लेकिन बंगाल में 3 सीट से 200 पार करने वाली बीजेपी का अगला मिशन केरल है। लेफ्ट की खाली ज़मीन पर कब्ज़ा करने की बीजेपी भरसक कोशिश करेगी। अगर 2031 में लेफ्ट की वापसी नहीं होती है, तो दूसरा मौका उसे बीजेपी नहीं देगी।
कॉमरेड पिनराई विजयन इस बदलाव की संभावना और सीमाओं, दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे एक ओर परंपरागत वामपंथी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक स्तर पर आधुनिकता और व्यावहारिकता को अपनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह प्रयास कितने समय तक वामपंथ को जीवित रख पाएगा, यह एक बड़ा प्रश्न है।
अंततः, यह कहना उचित होगा कि पिनराई विजयन केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक विचारधारा के अंतिम मजबूत स्तंभ हैं। उनके बाद वामपंथ किस दिशा में जाएगा, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने अतीत से क्या सीखता है और भविष्य के लिए खुद को कैसे तैयार करता है।
भारतीय राजनीति में विचारधाराएं कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं, वे बदलती हैं, रूपांतरित होती हैं और नए संदर्भों में पुनः उभरती हैं। संभव है कि वामपंथ भी किसी नए रूप में वापस आए। लेकिन फिलहाल, केरल के चुनावी परिणाम और पिनराई विजयन को देखते हुए यह एहसास होता है कि हम एक युग के अंतिम अध्याय के साक्षी हैं। यह उस विचारधारा के कमजोर पड़ने का संकेत है , जिसने कभी देश की राजनीति को वैकल्पिक दिशा दी थी।


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