राहुल गांधी का Gen-Z वर्सेज कॉकरोच जनता पार्टी : आंदोलन हमेशा जनता से जन्म लेते हैं!
राहुल गांधी का Gen-Z वर्सेज कॉकरोच जनता पार्टी : आंदोलन हमेशा जनता से जन्म लेते हैं!
ले. अरुण कुणाल
पश्चिम एशिया में अशांति और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच राहुल गांधी का यह कहना कि मोदी सत्ता एक साल की मेहमान है और कॉकरोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर धूम मचाने के बाद सरकार भले ही कहे कि सब ठीक चल रहा है पर जिस तरह से राहुल गांधी और युवाओं को सरकार टारगेट कर रही है, उसे देखकर आने वाले समय में किसी बड़े आंदोलन से इंकार नहीं किया जा सकता है। जबकि दूसरी तरफ सरकार लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सब कुछ नियंत्रण में है।
पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से राहुल गांधी, विपक्षी आवाज़ों और खासकर युवाओं को लेकर सरकार की आक्रामकता दिखाई दे रही है, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश किसी बड़े राजनीतिक या जनआंदोलन की ओर बढ़ रहा है। इतिहास गवाह है कि जब आर्थिक दबाव, बेरोजगारी, महंगाई और राजनीतिक असंतोष एक साथ मिलते हैं, तब सत्ता की स्थिरता के दावे अचानक कमजोर पड़ने लगते हैं।
आज का भारत भी ऐसे ही दौर से गुजरता दिख रहा है, जहां एक तरफ राष्ट्रवाद और मजबूत नेतृत्व का नैरेटिव है, तो दूसरी तरफ युवाओं में बढ़ती बेचैनी, आर्थिक असुरक्षा और असहमति के लिए घटती जगह को लेकर चिंता। ऐसे माहौल में अगर सरकार आलोचना को संवाद की बजाय दमन से जवाब देती है, तो असंतोष और गहरा सकता है। ऐसे में आने वाले समय में यह असंतोष किसी बड़े आंदोलन का रूप लेगा या नहीं, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखकर इस संभावना से पूरी तरह इंकार भी नहीं किया जा सकता।
भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी, दोनों का राजनीतिक इतिहास यह संकेत देता है कि वे प्रायः पहले से चल रहे जनआंदोलनों या जनभावनाओं के सहारे अपने राजनीतिक विस्तार कर पाए हैं । चाहे जेपी आंदोलन का दौर रहा हो या अन्ना आंदोलन का उभार, दोनों दलों ने उन आंदोलनों से निकली जनऊर्जा को अपने राजनीतिक आधार में बदलने का काम किया। 2014 में भी नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ किसी प्रत्यक्ष जनआंदोलन का नेतृत्व नहीं किया था, बल्कि भ्रष्टाचार-विरोधी माहौल, सत्ता-विरोधी भावना और व्यापक जनअसंतोष को राजनीतिक समर्थन में परिवर्तित किया। इसके विपरीत, राहुल गांधी आज खुद सड़क पर उतरकर यात्राओं, सभाओं और प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से राजनीतिक संघर्ष का चेहरा बनने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।
भारत का लोकतंत्र इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ सत्ता और जनता के बीच का रिश्ता तेजी से बदल रहा है। लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ता दबाव, मीडिया के एक बड़े हिस्से का सत्ता के प्रति झुकाव, कॉरपोरेट और राजनीति का गहराता गठजोड़ तथा विपक्ष की कमजोर होती आवाज़, इन सबके बीच राहुल गांधी लगातार संघर्ष करते दिखाई देते हैं। संसद से सड़क तक, यात्राओं से लेकर जनसभाओं तक, वे खुद को एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं जो केवल चुनाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श की लड़ाई लड़ रहा है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा संकट शायद विपक्ष का नहीं, बल्कि जनता का है। आज भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग नागरिक से अधिक प्रजा में बदलता दिखाई देता है। उसे अधिकारों से ज्यादा सुविधा चाहिए, सवालों से ज्यादा स्थिरता चाहिए और लोकतंत्र से ज्यादा मनोरंजन। यही कारण है कि लोकतंत्र के मूल प्रश्नों—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संस्थाओं की स्वायत्तता और राजनीतिक जवाबदेही पर समाज का बड़ा हिस्सा या तो मौन है या उदासीन।
राहुल गांधी की राजनीति इसी बदलती मानसिकता से टकराती है। जब जनता प्रश्न पूछना बंद कर देती है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल चुनावी प्रक्रिया बनकर रह जाता है। जो नेता व्यवस्था से सवाल पूछते हैं, वे अक्सर उन्हीं लोगों के बीच अकेले पड़ जाते हैं जिनके अधिकारों के लिए वे लड़ रहे होते हैं। राहुल गांधी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही दिखाई देती है। एक तरफ़ सत्ता की विशाल मशीनरी है, दूसरी तरफ़ जनता का बढ़ता राजनीतिक डर और उदासीनता। कई लोग अब यह मानने लगे हैं कि असहमति राष्ट्रविरोध है और आलोचना व्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिश है।
कॉकरोच जनता पार्टी भले ज़मीन पर कोई संगठित राजनीतिक शक्ति न दिखती हो, लेकिन सोशल मीडिया पर उसने तेज़ उपस्थिति दर्ज कराई है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इस अभियान के पीछे आम आदमी पार्टी से जुड़े कुछ समूह सक्रिय हो सकते हैं, जिनका डिजिटल संचालन विदेश, विशेषकर अमेरिका से भी किया जा रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी अब अन्ना आंदोलन जैसी डिजिटल जनमुहिम खड़ी करने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है, जहाँ सड़क की बजाय सोशल मीडिया को राजनीतिक संघर्ष का मुख्य मंच बनाया जा रहा है।
कुछ लोग इसे आम आदमी पार्टी की रणनीति मानते हैं, तो कुछ इसे सत्ता-विरोधी युवाओं के असंतोष की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं। वहीं एक वर्ग ऐसा भी है जो इसे राहुल गांधी की बढ़ती Gen-Z लोकप्रियता को चुनौती देने की कोशिश मानता है। सत्य चाहे जो हो, लेकिन यह स्पष्ट है कि नई पीढ़ी का एक हिस्सा पारंपरिक राजनीति से असंतुष्ट है और वह अपने लिए नए प्रतीक गढ़ना चाहता है।
भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि बड़े आंदोलन कभी नेताओं से शुरू नहीं हुए। आंदोलन हमेशा जनता से जन्म लेते हैं और बाद में नेता उनके प्रतीक बनते हैं। चंपारण सत्याग्रह का श्रेय भले गांधी जी को मिलता हो, लेकिन उसकी शुरुआत किसानों की पीड़ा और प्रतिरोध से हुई थी। महात्मा गांधी वहाँ इसलिए पहुँचे क्योंकि जनता उन्हें बुला रही थी। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में शीर्ष नेतृत्व जेलों में बंद था, फिर भी आंदोलन जारी रहा क्योंकि जनता मानसिक रूप से तैयार हो चुकी थी।
1857 का विद्रोह भी किसी एक नेता की महत्वाकांक्षा नहीं था। बहादुर शाह ज़फर को विद्रोहियों ने प्रतीक के रूप में चुना था। यही दृश्य बाद में जेपी आंदोलन में दिखाई दिया। जनता पहले उठी, नेताओं को बाद में स्वीकार किया गया। इतिहास का यह सार्वभौमिक नियम है कि आंदोलन नेता नहीं बनाते, आंदोलन नेता पैदा करते हैं।
भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन भी इसी सत्य का प्रमाण है। भगत सिंह अचानक इतिहास में नहीं आए थे। उनसे पहले राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला ख़ान, चंद्रशेखर आज़ाद, करतार सिंह सराभा और अनगिनत क्रांतिकारियों ने अपने बलिदान से वह जमीन तैयार की थी जिस पर आगे चलकर नई वैचारिक राजनीति खड़ी हुई। भगत सिंह की विशेषता यह थी कि उन्होंने क्रांति को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक और आधुनिक दृष्टि से देखा। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि उनके पहले की पीढ़ियों ने रास्ता न बनाया होता तो उनका संघर्ष भी इतना व्यापक प्रभाव न छोड़ पाता।
यदि इस ऐतिहासिक दृष्टि से आज की राजनीति को देखें तो राहुल गांधी की “भारत जोड़ो यात्रा” एक महत्वपूर्ण प्रयोग के रूप में दिखाई देती है। यह यात्रा केवल राजनीतिक पदयात्रा नहीं थी, बल्कि विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ संवाद स्थापित करने का प्रयास थी। यात्रा ने समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने और लोकतंत्र के प्रश्नों को सड़क पर लाने की कोशिश की। लेकिन सत्ता पक्ष और मीडिया के एक बड़े हिस्से ने इसे एक सामूहिक राजनीतिक पहल के बजाय “राहुल गांधी की निजी यात्रा” के रूप में प्रस्तुत किया।
यही वजह रही कि यात्रा का राजनीतिक प्रभाव उतना व्यापक नहीं बन पाया जितनी उसकी संभावनाएँ थीं। जनता और आंदोलन के बीच जो भावनात्मक संबंध बनना चाहिए था, वह पूरी तरह स्थापित नहीं हो सका। फिर भी यह कहना गलत होगा कि इस प्रयास का कोई महत्व नहीं। इतिहास गवाह है कि राजनीतिक चेतना रातोंरात पैदा नहीं होती। जनता धीरे-धीरे जागती है और जब जागती है तो इतिहास बदल देती है।
महात्मा गांधी से पहले बाल गंगाधर तिलक दशकों तक स्वराज की चेतना तैयार कर रहे थे। तिलक ने भारतीय समाज में राजनीतिक आत्मसम्मान का बीज बोया था, गांधी ने उसी बीज को जनआंदोलन में बदल दिया। हर बड़े राजनीतिक परिवर्तन से पहले एक लंबी वैचारिक तैयारी चलती है जिसे अक्सर तत्कालीन समय में असफल मान लिया जाता है।
आज कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी की भूमिका कुछ वैसी ही दिखाई देती है। वे केवल सत्ता से नहीं लड़ रहे, बल्कि अपनी पार्टी की जड़ता, पुराने राजनीतिक ढांचे और जनता की घटती राजनीतिक संवेदनशीलता से भी संघर्ष कर रहे हैं। उनके सामने चुनौती सिर्फ़ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद को पुनर्जीवित करने की भी है। इस अर्थ में वे एक साथ छात्र भी हैं और शिक्षक भी, वे सीख भी रहे हैं और अपनी पार्टी को नया राजनीतिक व्यवहार सिखाने की कोशिश भी कर रहे हैं।
यह भी सच है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल नेताओं की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। नागरिक यह कहकर अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते कि विपक्ष कमजोर है। लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब जनता सवाल पूछती रहती है। जब समाज डर, सुविधा या राजनीतिक थकान के कारण चुप हो जाता है, तब लोकतांत्रिक संस्थाएँ भी धीरे-धीरे खोखली होने लगती हैं।
राजनीति का सबसे कठोर सत्य यही है कि जनता जागती देर से है, लेकिन जब जागती है तो सत्ता के सबसे मजबूत ढांचे भी हिल जाते हैं। राहुल गांधी के सामने आज संघर्ष दोहरा है—एक तरफ़ सत्ता की ताकतों से लड़ाई और दूसरी तरफ़ उस जनता को जगाने की कोशिश जिसे लगातार यह बताया जा रहा है कि सवाल पूछना अपराध है।
अंततः इतिहास केवल नेताओं का मूल्यांकन नहीं करता। इतिहास जनता से भी प्रश्न पूछता है। आने वाली पीढ़ियाँ शायद यह जानना चाहेंगी कि जब लोकतंत्र, अभिव्यक्ति और संस्थाओं पर दबाव बढ़ रहा था, तब भारत की जनता क्या कर रही थी। क्या वह नागरिक की तरह खड़ी थी या प्रजा की तरह मौन? क्योंकि किसी भी जीवित लोकतंत्र में कायर जनता, बहादुर नेता की सबसे बड़ी हार साबित होती है।
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