आर्थिक मंदी के दौर में फल-फूल रहा है मर्दानगी का व्यापार!

 आर्थिक मंदी के दौर में फल-फूल रहा है मर्दानगी का व्यापार

ले o — अरुण कुणाल

ट्रेन से दिल्ली आते समय गाजियाबाद में बाउंड्रीवॉल पर पंख फैलाए ‘मोर’ दिखाई देता है, लेकिन ठीक नीचे नज़र जाती है तो दीवार मर्दानगी के कारोबार से जुड़े झोलाछाप डॉक्टरों के विज्ञापनों से पटी मिलती है! मोर के पंखों से नज़र हटते ही इंसान की नज़र और जिज्ञासा दोनों भटक जाएँ, दीवारों पर विज्ञापनों का कुछ ऐसा ही इंतज़ाम है! 

छोटे गाँव-कस्बों के पारंपरिक, आयुर्वेदिक और यूनानी दवाखानों से लेकर मेट्रो सिटी तक, गुप्त रोगों और यौन स्वास्थ्य की हर समस्या का इलाज करने का दावा करने वालों की दुकानें खूब चल रही हैं!बीमारी हो या न हो, इलाज के दावों का बाज़ार नेताओं के चुनावी वादों की तरह हमेशा गर्म रहता है! 

ट्रम्प टैरिफ़ के इस दौर में, जब भारत सहित पूरी दुनिया आर्थिक मंदी की मार झेल रही है, मर्दानगी का व्यापार तेज़ी से फल-फूल रहा है। बेरोज़गारी, असुरक्षा और तनाव से जूझते समाज में सेक्स को रिश्तों का केंद्रीय आधार बना दिया गया है। अक्सर यौन संतुष्टि या असंतुष्टि के नाम पर रिश्ते बनते भी हैं और टूटते भी है!

यही कारण है कि यौन शिक्षा पर केंद्रित पॉडकास्ट और इंटरव्यू तेज़ी से वायरल हो रहे हैं। सीमा आनंद जैसी हस्तियाँ खुले तौर पर सेक्स, संवाद और इच्छाओं की बात करती हैं। यह लोकप्रियता इस बात का संकेत है कि समाज में यौन शिक्षा की भारी कमी है, जिसे बाज़ार अपने तरीक़े से भर रहा है।

शोध बताते हैं कि ऑनलाइन पोर्नोग्राफी देखने वालों की संख्या बेहद बड़ी है और इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने में यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स की भूमिका भी कम नहीं है। भले ही यूट्यूब स्वयं कोई पोर्न साइट नहीं है, लेकिन उन तक पहुंचने में मददगार है! पोर्नहब जैसी साइटें, यूट्यूब के बाद, दुनिया की सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली वेबसाइटों में शीर्ष स्थानों पर बनी हुई हैं। यह स्थिति बताती है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स केवल कंटेंट होस्ट नहीं कर रहे, बल्कि अनजाने में यौन जिज्ञासा और उपभोग की एक पूरी श्रृंखला को दिशा दे रहे हैं।

मंदी और बेरोजगारी के दौर में जो कपल्स 24 घंटे एक-दूसरे के साथ रहने को मजबूर हैं, उनके लिए रिश्तों को निभाना पहले से ज़्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। यही दबाव मर्दानगी और पौरुष बढ़ाने के नाम पर चल रहे कारोबार को खाद-पानी देता है। आज यह महज़ झोला-छाप डॉक्टरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का संगठित उद्योग बन चुका है।

अख़बारों, पत्रिकाओं और सड़कों पर जगह-जगह ऐसे विज्ञापन दिखाई देते हैं जो ‘सस्ते इलाज़’ और ‘पौरुष की गारंटी’ का वादा करते हैं। यौन समस्याओं से निजात दिलाने के नाम पर टॉनिक, कैप्सूल, इंजेक्शन, तेल, क्रीम और स्प्रे बेचे जा रहे हैं। यह बाज़ार लोगों की असुरक्षा और अज्ञानता पर टिका है।

सवाल यह है कि क्या ये दवाएँ वास्तव में कामशक्ति बढ़ाने में सक्षम हैं, या यह चिकित्सा विज्ञान का उपहास मात्र है? महर्षि चरक ने दूसरी सदी में चरक संहिता लिखते समय शायद यह कल्पना नहीं की होगी कि ‘वाजीकरण’ का विचार एक दिन इस तरह के मुनाफ़ाखोर उद्योग का आधार बनेगा।

सेक्स को लेकर समाज में फैली भ्रांत धारणाएँ इस व्यापार की सबसे बड़ी ताक़त हैं। यौन स्वास्थ्य की समग्र समझ के अभाव में, पूरी तरह स्वस्थ लोग भी खुद को ‘कमज़ोर’ या ‘नामर्द’ समझने लगते हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार ऐसे मामले उम्रदराज़ लोगों से ज़्यादा युवाओं में देखने को मिल रहे हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया आधी-अधूरी जानकारी देकर इस भ्रम को और गहरा कर देते हैं।

कामशक्ति बढ़ाने की चाह मनुष्य में प्राचीन काल से रही है। वैदिक साहित्य में धर्म और अर्थ के बाद काम को स्थान दिया गया है। गीता में कृष्ण कहते हैं—“मैं मनुष्य के भीतर कामेच्छा के रूप में विद्यमान हूँ।” खजुराहो, कोणार्क और एलोरा की मूर्तियाँ प्रमाण हैं कि संभोग को पाप नहीं माना गया। समस्या सेक्स नहीं, बल्कि उससे जुड़ी गलत धारणाएँ हैं।

ये भ्रांतियाँ केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में, जहाँ साक्षरता दर ऊँची है, वहाँ भी यौन असंतुष्टि और संवाद की कमी रिश्तों के टूटने की बड़ी वजह है। यह मान लेना कि पश्चिमी समाज यौन मामलों में पूरी तरह परिपक्व है, एक भ्रम है।

फिल्मों और विज्ञापनों ने मर्दानगी की एक अवास्तविक छवि गढ़ दी है। लंबे समय तक सेक्स करने को पौरुष का पैमाना बना दिया गया है। जबकि सेक्सोलॉजिस्ट बताते हैं कि औसतन पाँच से दस मिनट का संभोग समय सामान्य है। इस मिथक ने असंख्य पुरुषों को मानसिक रोगी बना दिया है, जो दवाओं और इलाज़ के चक्कर में पड़ जाते हैं।

चिकित्सकीय शोध स्पष्ट करते हैं कि बाज़ार में उपलब्ध कोई भी दवा नपुंसकता का स्थायी इलाज़ नहीं है। यहाँ तक कि वियाग्रा जैसी दवाएँ भी कई मामलों में जानलेवा साबित हुई हैं। कार्ल मार्क्स का कथन—“यदि ईश्वर नहीं है, तो मनुष्य को उसका आविष्कार करना पड़ेगा”—यहाँ पूरी तरह लागू होता है। मर्दानगी का व्यापार इसी मनोविज्ञान पर टिका है।

नपुंसकता आधुनिक जीवन-शैली की देन है। तनाव, अवसाद, शराब, धूम्रपान और असंतुलित दिनचर्या इसके प्रमुख कारण हैं। विशेषज्ञ इसे ‘शांत महामारी’ मानते हैं। नपुंसकता प्राथमिक और माध्यमिक, दो प्रकार की होती है, जिनमें से अधिकांश मामलों में इलाज़ संभव है, बशर्ते सही चिकित्सकीय और मानसिक परामर्श लिया जाए।

इसके बावजूद समाज में यह धारणा गहरी है कि नपुंसकता लाइलाज है या उम्र का स्वाभाविक परिणाम है। किशोरावस्था में हस्तमैथुन को लेकर अपराधबोध भी पुरुषों में मानसिक दबाव पैदा करता है, जबकि चिकित्सा विज्ञान इसे पूरी तरह सामान्य मानता है।

यौन वर्जनाओं और स्वीकृति के बीच की रेखा भारतीय समाज में बेहद जटिल है। महानगरों में जहाँ सहचर्य संबंध सामान्य होते जा रहे हैं, वहीं ग्रामीण समाज में इसकी कल्पना भी अनैतिक मानी जाती है। ऐसी स्थिति में एक ही नैतिक मापदंड लागू करना आसान नहीं है। लेकिन जहाँ नैतिकता क्रूरता और भय का रूप ले ले, वहाँ पुनर्विचार ज़रूरी हो जाता है।

हर युग में यौन नैतिकताएँ बदली हैं। जो वर्जनाएँ कभी नैतिकता का शिखर मानी जाती थीं, वही आज बंधन लगती हैं। इसी टकराव के बीच समाज आगे बढ़ता है। विडंबना यह है कि आज, जब हम अंतरिक्ष में जीवन तलाश रहे हैं, तब भी यौन संबंधों को लेकर अज्ञानता और भय में जी रहे हैं। यदि समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था अब भी यौन शिक्षा से मुँह मोड़े रहेंगे, तो मर्दानगी का यह बाज़ार और फलता-फूलता रहेगा और इंसान मानसिक रूप से और बीमार होता जाएगा।

Comments

Popular posts from this blog

कतरास की प्राणवायु पचगढ़ी बाजार वेंटिलेटर पर : गजलीटांड त्रासदी की 31वीं बरसी और कतरास -पचगढ़ी पर विस्थापन का खतरा!

धनबाद मेयर चुनाव राजनीतिक का नया प्रयोगशाला: झरिया और बाघमारा के बीच शक्ति -संतुलन की निर्णायक जंग!

डोनाल्ड ट्रम्प का एकतरफा सीजफायर, पीएम मोदी का "टीम इंडिया" का नारा : खाड़ी संकट को बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का इंतज़ार!