कतरास की प्राणवायु पंचमढ़ी बाजार वेंटिलेटर पर : गजलीटांड त्रासदी की 31वीं बरसी और कतरास -पंचमढ़ी पर विस्थापन का खतरा!
कतरास की प्राणवायु पंचगढ़ी बाजार वेंटिलेटर पर: गजलीटांड त्रासदी की 31वीं बरसी और कतरास-पंचमढ़ी पर विस्थापन का खतरा!
लेखक — अरुण कुणाल
धनबाद के लिए 26 सितंबर की तारीख कभी न भर पाने वाला वह ज़ख्म है, जिससे आज भी खून रिस रहा है। 26 सितंबर 1995 की रात गजलीटांड की खदान नंबर-6 में आई भयानक आपदा में 64 खनिकों की जान चली गई थी। 1975 की चासनाला दुर्घटना के बाद यह भारत के इतिहास की सबसे भीषण खनन आपदाओं में से एक थी, जिसने धनबाद से लेकर दिल्ली तक को हिला कर रख दिया था।
तीन दिनों तक लगातार हुई मूसलाधार बारिश के कारण खदान के पास बहने वाली कतरी नदी का जलस्तर बढ़ गया और नदी का बेकाबू पानी सीधे गजलीटांड की खदान नंबर-6 में समा गया। आधिकारिक तौर पर 64 मजदूरों की जलसमाधि हुई थी, जबकि आसपास की खानों को मिलाकर मृतकों का आंकड़ा 79 तक पहुंच गया था।
मुझे आज भी अच्छी तरह याद है, हर रोज सुबह से शाम तक वहां लोगों का जमघट लगा रहता था। हम हर दिन इस उम्मीद में जाते थे कि शायद आज कुछ मजदूरों का पता चल जाए। लेकिन जब इंतज़ार के पल हफ्तों में बदल गए, तो उम्मीद भी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगी। मजदूरों के परिवारों और भारत कोकिंग कोल लिमिटेड के आला अफसरों की बेबसी आखिरकार एक समाधि में बदल गई।
गजलीटांड की खान दुर्घटना बिन बुलाई आपदा थी, लेकिन यह बात कतरास के लिए नहीं कही जा सकती। कतरास इतने वर्षों से आंखों देखी मक्खी निगल रहा है। पहले पंचगढ़ी के आसपास ओपन माइनिंग पर चुप्पी और उसके बाद अवैध कोयला खनन पर मौन सहमति ने चासनाला और गजलीटांड जैसी त्रासदियों को खुद न्योता दिया है।
धनबाद के झरिया की तरह अब कतरास में लगातार हो रहे भू-धंसान के कारण स्थानीय लोगों पर विस्थापन का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। कतरास की प्राणवायु कहे जाने वाले पंचगढ़ी बाजार के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है। झरिया के विस्थापन का दर्द अभी कम भी नहीं हुआ था कि अब कतरास का नंबर आ गया है। अब विकास के नाम पर कतरास की बोली लगेगी?
धनबाद का इतने वर्षों तक दोहन होने के बावजूद माना जाता है कि आज भी यहां लगभग 19.4 अरब टन कोयले का विशाल भंडार मौजूद है! ऐसे में BCCL के मेगा ‘ई-ब्लॉक’ प्रोजेक्ट की बात हो रही है, तो उसे ज्यादा समय तक टाला नहीं जा सकता है। मेगा ‘ई-ब्लॉक’ प्रोजेक्ट में आकाशकिनारी से लेकर खास कुसुंडा तक BCCL के 9 कोलियरी क्षेत्रों में कतरास -पंचगढ़ी भी शामिल है! लेकिन सवाल यह है कि क्या कतरास के लोगों को भी झरिया की तर्ज पर मुआवज़ा दिया जाएगा? क्योंकि झरिया के लोग विस्थापन के बाद आज भी खुद को ठगा-सा महसूस कर रहे हैं!
आज का कतरास उन संघर्षों और बदलावों का गवाह है, जिन्हें इस क्षेत्र ने पिछले कुछ दशकों में देखा है। आज कतरास के बारे में कह सकते हैं—“सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान-सा क्यों है, इस शहर में हर शख़्स परेशान-सा क्यों है?” लेकिन एक समय था, जब सीने में जलन के बावजूद इस शहर का कोई शख़्स कभी परेशान-सा नहीं था! यहाँ कभी बाहरी-भीतरी का मुद्दा नहीं बना। जो लोग भी बाहर से आए, इस शहर ने उन सभी को फलने-फूलने का मौका दिया।
पंचगढ़ी बाजार में कतरास के रहने वाले करीब 90 प्रतिशत लोगों की दुकानें हैं। दुकानदारों के अलावा सब्ज़ी बेचने वाले और ठेले वाले भी हैं! दुकानदारों को साल में एक बार मिलने वाले BCCL कर्मचारियों के बोनस का इंतज़ार रहता है। बाजार में सबसे ज्यादा रौनक दुर्गापूजा के दौरान दिखाई देती है। यूं तो दुर्गापूजा में खरीदारी सभी करते हैं, लेकिन बाजार की रौनक तब और बढ़ जाती है जब BCCL अपने कर्मचारियों को बोनस बांटता है। एक तरह से देखा जाए तो BCCL कर्मचारियों से ज्यादा दुकानदारों को बोनस का इंतज़ार रहता है।
बीसीसीएल के बोनस के लालच में चुप रहने वाला बाजार जब अवैध कोयले के कारोबार से रोशन होने लगा, तो लोगों ने इसे ‘आपदा में अवसर’ की तरह देखा! लेकिन समय के साथ कब यह भस्मासुर बन गया, उन्हें पता ही नहीं चला! अब जब भस्म होने का समय आया है, तो मुआवज़े के लाले पड़े हुए हैं!
बीसीसीएल का काम निजी हाथों में जाने और बदलते आर्थिक हालात की मार झेल रहे पंचगढ़ी बाजार की हालत भू-धंसान और संभावित विस्थापन ने और भी बदतर कर दी है। पंचगढ़ी के चारों तरफ ओपन माइनिंग होने के कारण लोग प्रदूषित हवा में जीने को मजबूर हैं। उनकी परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। BCCL के मेगा ‘ई-ब्लॉक’ प्रोजेक्ट के कारण लगभग 5 लाख लोगों के विस्थापन का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
अवैध कोयला खनन पर चुप रहने वाला कतरास अब BCCL के मेगा ई-ब्लॉक प्रोजेक्ट पर खुलकर बोलने लगा है। सच तो यह है कि अगर कोयला माफिया के खिलाफ पहले आवाज उठाई गई होती, तो शायद यह नौबत नहीं आती। क्योंकि कतरास का दोहन सिर्फ BCCL ने नहीं किया है; अवैध कोयला खनन से जुड़े लोगों ने भी इसे बुरी तरह खोखला किया है। अवैध खनन के कारण आए दिन भू-धंसान की घटनाएं होती रहती हैं। अगर भू-धंसान का संकट इतना गहरा न होता, तो कतरास को बलि का बकरा बनाना BCCL के लिए इतना आसान भी न होता।
धनबाद में जिस तरह अवैध कोयले का कारोबार फल-फूल रहा है, वह न केवल स्थानीय लोगों के लिए, बल्कि BCCL के लिए भी भस्मासुर साबित हो रहा है। कतरास के इस भस्मासुर के लिए शासन-प्रशासन के साथ-साथ गली-मोहल्ले के नेताओं से लेकर जिला और प्रदेश स्तर के नेता भी जवाबदेह हैं! क्योंकि उनपर अवैध कारोबार से होने वाली कमाई और चंदे का लाभ कई स्तरों तक पहुंचने के आरोप लगते रहे हैं।
कतरास का पंजाबी मोहल्ला, गुजराती मोहल्ला, भगत मोहल्ला, मारवाड़ी पट्टी कपड़ा पट्टी, रानी बाजार और रेलवे क्लोनी में बंटे पंचगढ़ी बाजार का विस्थापन के बाद क्या स्वरूप होगा, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन एक सवाल आज भी खड़ा है—जब अरावली पर्वत की कटाई रोकने की आवाज उठ सकती है, तो कतरासवासियों के विस्थापन को रोकने की आवाज क्यों नहीं उठ सकती? यह याद रखना चाहिए कि इतिहास सिर्फ तारीखें याद रखने के लिए नहीं होता, इतिहास हमें चेतावनी भी देता है।
गजलीटांड की त्रासदी की 31वीं बरसी पर सवाल सिर्फ उन 64 खनिकों की याद का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या हमने उस त्रासदी से कुछ सीखा है? कतरास के लोग तो उस त्रासदी के गवाह रहे हैं! इसके बावजूद, “शिकारी आएगा, दाना डालेगा, जाल बिछाएगा, पर लोभ में फँसना नहीं है” कबूतर की तरह रटते रहे और आखिरकार जाल में फँस गए!
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