मानसून के साथ दिल्ली में ‘कॉकरोच’ की दस्तक: 6 जून को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की अग्निपरीक्षा!



मानसून के साथ दिल्ली में ‘कॉकरोच’ की दस्तक:  6 जून को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की अग्निपरीक्षा! 

                            लेखक - अरुण कुणाल 



दिल्ली की राजनीति में 6 जून का दिन दिलचस्प और संभावित रूप से महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। एक तरफ सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी कॉकरोच जनता पार्टी जंतर-मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू करने की घोषणा कर रही है, तो दूसरी तरफ दो दिन बाद विपक्षी दलों की एक महत्वपूर्ण बैठक भी प्रस्तावित है, जिसमें 'खेला होबे' की राजनीति के लिए चर्चित ममता बनर्जी स्वयं भाग लेने दिल्ली आ रही हैं। इन दोनों घटनाओं का होना राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए कई सवाल खड़े करता है।

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में यह स्पष्ट रूप से देखा गया है कि सोशल मीडिया अब केवल विचार व्यक्त करने का मंच नहीं रह गया है, बल्कि वह राजनीतिक लामबंदी और जनमत निर्माण का एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। ऐसे समय में कॉकरोच जनता पार्टी का अचानक चर्चा में आना और उसके नेतृत्व द्वारा दिल्ली में आंदोलन की घोषणा करना इस बात का संकेत माना जा सकता है कि डिजिटल राजनीति अब सड़कों की राजनीति में बदलने की कोशिश कर रही है।

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके ने एक वीडियो संदेश जारी कर भारत आने और 6 जून से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने दावा किया है कि इस अभियान के समर्थन में लगभग 8 लाख लोगों ने अपनी सहमति दर्ज कराई है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी मुद्दे का वायरल होना और वास्तविक दुनिया में लोगों का सड़क पर उतरना दो अलग-अलग बातें हैं। अब देखना है कि अभिजीत दीपके सोशल मीडिया की लोकप्रियता को वास्तविक जनभागीदारी में कितना बदल पाते है!

अभिजीत दीपके के भारत आगमन से ठीक पहले कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने तीन प्रवक्ताओं के नामों की घोषणा कर दी है। CJP ने इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट सौरव दास को मुख्य प्रवक्ता नियुक्त किया है। वहीं लेखक और फ़िल्मकार विजेता दहिया तथा आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र आशुतोष रांका को भी पार्टी का प्रवक्ता बनाया गया है। पार्टी की ओर से की गई यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब अभिजीत दीपके के भारत दौरे को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है।

कॉकरोच जनता पार्टी के तीनों प्रवक्ताओं ने पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी पार्टी अपनी मांगों को लेकर सरकार और विपक्ष, दोनों से बातचीत के लिए तैयार है। प्रवक्ताओं ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि अपने मुद्दों को लोकतांत्रिक तरीके से उठाना और उनके समाधान के लिए सभी पक्षों से संवाद करना है।


इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दे बताए जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप, विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल लगातार चर्चा में रहे हैं। देश के कई हिस्सों में छात्रों ने समय-समय पर विरोध प्रदर्शन भी किए हैं। ऐसे में यदि कोई नया राजनीतिक या सामाजिक मंच इन मुद्दों को लेकर सामने आता है, तो उसे युवाओं के एक वर्ग का समर्थन मिलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

इस बीच विपक्ष और छात्रों के दबाव के बाद, देर से ही सही पर CBSE के चेयरमैन और सचिव को हटाकर सरकार ने नुकसान नियंत्रण की कोशिश तो की है, लेकिन पेपर लीक, भर्ती घोटालों और युवाओं के भविष्य को लेकर उठे सवाल अभी भी कायम हैं। इस बार मामला केवल अधिकारियों के बदलाव से नहीं थमेगा, जवाबदेही की मांग अब सीधे शिक्षा मंत्री तक पहुंच चुकी है।

कहा जा रहा है कि सरकार के इस कदम के पीछे केवल बढ़ता जनदबाव ही नहीं, बल्कि दिग्विजय सिंह की अध्यक्षा वाली संसद की स्थायी समिति के समक्ष 12वीं के छात्र सार्थक सिद्धांत की पेशी और CBSE से जुड़े मुद्दों पर उनकी विस्तृत प्रस्तुति भी एक महत्वपूर्ण कारण रही। जब छात्र खुद व्यवस्था की खामियां दस्तावेज़ों और तथ्यों के साथ सामने रखने लगें, तो सवालों को अनदेखा करना आसान नहीं होता है।

भारत इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ युवाओं के भीतर बढ़ता असंतोष केवल राजनीतिक नारेबाज़ी का विषय नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक वास्तविकता बनता जा रहा है। पिछले एक दशक में विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक की घटनाओं ने सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले लाखों युवाओं का भरोसा कमजोर किया है। बेरोजगारी लंबे समय से एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है और जब भर्तियाँ निकलती भी हैं तो परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो जाते हैं।  

दूसरी ओर प्राइवेटाइजेशन के प्रति मोदी सत्ता का झुकाव के बावजूद निजी क्षेत्र पहले जैसी उम्मीदें पैदा नहीं कर पा रहा है । रिलायंस और इंफोसिस में नौकरी के अवसर कम हो रहे है। आईटी, स्टार्टअप और कॉर्पोरेट क्षेत्र में भर्ती की रफ्तार धीमी पड़ने, छंटनी और लागत कटौती की खबरों ने युवाओं की चिंताओं को और बढ़ाया है। ऐसे माहौल में यदि मात्र 15 दिन पहले अस्तित्व में आई कोई नई राजनीतिक पहल सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में युवाओं का ध्यान आकर्षित कर रही है, तो यह केवल उस संगठन की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि व्यवस्था के प्रति बढ़ती निराशा का भी संकेत है। 

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ बन गई हैं कि स्थापित राजनीतिक दलों और पारंपरिक छात्र संगठनों से निराश युवा किसी नए और अपरंपरागत मंच की ओर देखने लगे हैं। संभव है कि यह समर्थन किसी विचारधारा से अधिक उस बेचैनी और हताशा की अभिव्यक्ति हो, जो रोजगार, शिक्षा और भविष्य की अनिश्चितता को लेकर देश के एक बड़े युवा वर्ग के भीतर जमा होती जा रही है। यदि यह असंतोष लगातार बढ़ता है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों की दिशा पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है।

इस बीच आर्थिक मोर्चे से भी सरकार के लिए उत्साहजनक संकेत नहीं मिल रहे हैं। हाल के महीनों में शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव और निवेशकों की सतर्कता ने आर्थिक माहौल को प्रभावित किया है। वैश्विक शेयर बाजारों के कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन (नेटवर्थ) के आधार पर भारतीय शेयर बाजार की रैंकिंग में भी गिरावट दर्ज की गई है। भारत, जो कुछ समय पहले दुनिया के शीर्ष पांच शेयर बाजारों में शामिल था, अब सातवें स्थान पर पहुंच गया है और ताइवान तथा दक्षिण कोरिया जैसे बाजार उससे आगे निकल गए हैं।

हालांकि शेयर बाजार की रैंकिंग किसी देश की अर्थव्यवस्था का एकमात्र पैमाना नहीं होती, लेकिन यह निवेशकों के विश्वास, कॉर्पोरेट प्रदर्शन और भविष्य की आर्थिक संभावनाओं का महत्वपूर्ण संकेतक जरूर मानी जाती है। ऐसे समय में जब युवाओं के बीच रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा को लेकर चिंताएं पहले से मौजूद हैं, आर्थिक मोर्चे पर आने वाली ऐसी खबरें भी जनभावनाओं को प्रभावित कर सकती हैं।

ऐसे समय में जब युवाओं के बीच रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा को लेकर चिंताएं पहले से मौजूद हैं, आर्थिक मोर्चे पर आने वाली ऐसी खबरें भी जनभावनाओं को प्रभावित कर सकती हैं। यही कारण है कि रोजगार, शिक्षा और आर्थिक सवालों से आने वाले समय में केंद्र और राज्य सरकारों का बच पाना मुश्किल होगा।

दिल्ली का जंतर-मंतर लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का प्रतीक रहा है। यहां विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और नागरिक समूह अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते रहे हैं। ऐसे में कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा जंतर-मंतर को अपने आंदोलन के केंद्र के रूप में चुनना भी एक प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश माना जा सकता है। यह संदेश केवल सरकार के प्रति असंतोष व्यक्त करने का नहीं, बल्कि स्वयं को एक व्यापक जन-आंदोलन के रूप में स्थापित करने का प्रयास भी हो सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन यह प्रदर्शन शुरू होने की घोषणा की गई है, उसी दिन विपक्षी दलों के गठबंधन की बैठक भी प्रस्तावित है। इस बैठक का आयोजन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर होना है और इसकी पहल ममता बनर्जी द्वारा किए जाने की चर्चा है। हालांकि दोनों घटनाओं के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध का कोई सार्वजनिक प्रमाण नहीं है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक निश्चित रूप से इस संयोग पर नजर रखेंगे।

विपक्ष के सामने लंबे समय से यह चुनौती रही है कि वह जनता के असंतोष को एक संगठित राजनीतिक दिशा कैसे दे। दूसरी ओर, सरकार का दावा रहा है कि विपक्ष के पास कोई ठोस वैकल्पिक एजेंडा नहीं है और देश विकास के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। ऐसे माहौल में यदि कोई नया मंच या अभियान युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में सफल होता है, तो वह राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है।


राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं कि गृह मंत्रालय कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा प्रस्तावित आंदोलन पर कड़ी नजर बनाए हुए है। यदि आंदोलन केवल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान तक सीमित न रहकर रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और युवाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों को केंद्र में लाता है, तो उसका दायरा स्वाभाविक रूप से अन्य मंत्रालयों और नीतिगत निर्णयों तक भी फैल सकता है।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लंबे समय से यह आरोप लगाते रहे हैं कि मोदी सरकार में सभी निर्णयों का केंद्रीकरण प्रधानमंत्री कार्यालय में हो गया है। ऐसे में यदि विपक्ष और युवा आंदोलनकारी सरकार की जवाबदेही का प्रश्न उठाते हैं, तो आंदोलन की तपिश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास तक महसूस होगी। अब देखना है कि 6 जून के बाद सरकार और आंदोलनकारी कॉकरोच के बीच टकराव बढ़ता है या किसी समाधान की दिशा निकलती है?

पश्चिम बंगाल में हार के बाद विपक्ष जमीनी स्तर पर अधिक आक्रामक राजनीतिक मॉडल अपनाने पर विचार कर सकता हैं। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लंबे समय से संघ और बीजेपी की नीतियों की खुलकर आलोचना करते रहे हैं। वहीं ममता बनर्जी भी केंद्र सरकार के खिलाफ मुखर रुख रखने वाली प्रमुख विपक्षी नेताओं में शामिल हैं। यदि विपक्षी दल साझा रणनीति और साझा मुद्दों पर अधिक समन्वय स्थापित करने में सफल होते हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका और प्रभाव बढ़ सकता है।

हालांकि यह भी उतना ही सच है कि भारतीय राजनीति में किसी भी नई राजनीतिक या सामाजिक पहल की सफलता केवल शुरुआती उत्साह से तय नहीं होती। उसकी वास्तविक ताकत संगठन, नेतृत्व, जनसमर्थन और लंबे समय तक जनता के मुद्दों से जुड़े रहने की क्षमता से निर्धारित होती है। इसलिए 6 जून की घटनाओं को केवल एक दिन की राजनीतिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाएगा, बल्कि उन्हें इस दृष्टि से भी परखा जाएगा कि क्या वे व्यापक जनभावनाओं को अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं या नहीं?


फिलहाल राजनीतिक हलकों की नजरें 6 जून पर टिकी हुई हैं। एक ओर जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का प्रस्तावित प्रदर्शन है, तो दूसरी ओर 8 जून को विपक्षी दलों के गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक। अगर 2029 के चुनावी महाभारत के लिए "ममता मॉडल" पर मंथन की रणनीति आकार लेती है, तो मोदी सत्ता के लिए चौतरफा चुनौतियां बढ़ सकती हैं! वहीं विपक्ष के भीतर यह बहस भी तेज हो सकती है कि भविष्य की राजनीति केवल चुनावी रणनीतियों से नहीं, बल्कि कॉकरोच जनता पार्टी की तरह व्यापक जनसंपर्क और जनआंदोलनों के माध्यम से भी लड़ी जाए।

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