बूंद-बूंद टपकती इमरजेंसी : मीनाक्षी नटराजन और ममता बनर्जी के साथ खेला, डिलिमिटेशन बिल का नंबर गेम कनेक्शन?
बूंद-बूंद टपकती इमरजेंसी : मीनाक्षी नटराजन और ममता बनर्जी के साथ खेला, डिलिमिटेशन बिल का नंबर गेम कनेक्शन?
लेखक : अरुण कुणाल
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं पर जनता का विश्वास रहा है। लेकिन जब चुनाव, उम्मीदवारों की पात्रता, विपक्षी दलों की राजनीतिक स्वतंत्रता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर लगातार विवाद सामने आने लगें, तब सवाल केवल किसी एक चुनाव या एक नेता का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की विश्वसनीयता का बन जाता है। हाल के घटनाक्रमों ने यही चिंता पैदा की है कि कहीं देश में औपचारिक रूप से नहीं, लेकिन "बूंद-बूंद टपकती इमरजेंसी" जैसी स्थिति तो नहीं बन रही।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर उठे सवालों के जवाब अभी पूरी तरह सामने भी नहीं आए थे कि कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को लेकर पैदा हुआ विवाद नई बहस छेड़ गया। यदि किसी उम्मीदवार का नामांकन तकनीकी या कानूनी आधार पर खारिज होता है और अदालत में मामला लंबित रहते हुए प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से विपक्षी दलों के मन में आशंका पैदा होती है।
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन जिस शिकायत का हवाला देकर खारिज किया गया था, उसी मामले में अब तेलंगाना की स्थानीय अदालत ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या भविष्य में विपक्ष को एक नहीं बल्कि दो या तीन अतिरिक्त उम्मीदवारों के नामांकन दाखिल करने होंगे, ताकि किसी एक नामांकन के रद्द होने की स्थिति में चुनाव पूरी तरह एकतरफा न हो जाए?
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल तब उठते हैं, जब झारखंड में बीजेपी समर्थित उम्मीदवार परिमल नाथवानी को नामांकन पत्र की त्रुटियां सुधारने का पूरा अवसर दिया जाता है, जबकि मध्य प्रदेश में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन तत्काल निरस्त कर दिया जाता है। लोकतंत्र में सिर्फ नियम नहीं, बल्कि नियमों का समान और निष्पक्ष अनुपालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लेकिन इन सब बातों पर अब कोई चर्चा भी नहीं होती और विपक्ष की कमजोरी का ठीकरा उसी के सिर फोड़ दिया जाता है!
लोकसभा चुनाव में सूरत सीट पर जो कुछ हुआ था, उसके बाद लगता है कि यह न्यू नॉर्मल हो गया है। तब भी विपक्ष ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। अब राज्यसभा चुनाव से जुड़े विवाद ने उन आशंकाओं को फिर जीवित कर दिया है। लोकतंत्र में चुनाव केवल परिणाम का नाम नहीं है, बल्कि प्रक्रिया का नाम है। यदि प्रक्रिया पर ही संदेह पैदा होने लगे तो परिणाम चाहे जो भी हो, लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर पड़ता है।
इसी संदर्भ में कई राजनीतिक विश्लेषक एक व्यापक राजनीतिक रणनीति की ओर इशारा कर रहे हैं। उनका तर्क है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत को कमजोर करने की कोशिश, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली राजनीति पर दबाव और कांग्रेस के प्रभाव को सीमित करने के प्रयास, अलग-अलग घटनाएं नहीं बल्कि एक बड़ी राजनीतिक परियोजना का हिस्सा हो सकते हैं। इस परियोजना का संबंध भविष्य के परिसीमन (डिलिमिटेशन) से जोड़ा जा रहा है।
परिसीमन का प्रश्न आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन सकता है। जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण से देश के विभिन्न राज्यों की राजनीतिक शक्ति का संतुलन बदल सकता है। दक्षिण भारत के कई राज्यों ने पहले ही आशंका जताई है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के बावजूद वे राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान उठा सकते हैं। दूसरी ओर, अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
ऐसे में यदि कोई सरकार परिसीमन के बाद बनने वाले नए राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर अपनी चुनावी रणनीति तैयार कर रही हो तो यह अस्वाभाविक नहीं होगा। आलोचकों का आरोप है कि विपक्षी दलों को कमजोर करने के पीछे भी यही दीर्घकालिक राजनीतिक गणित काम कर रहा है। उनका मानना है कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण होता है, तो उससे पहले अधिकतम राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।
मीनाक्षी नटराजन के मामले में अदालत की प्रक्रिया भी बहस का विषय बन गई है। आम जनता के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि न्याय मिलने में इतनी देरी हो जाती है कि निर्णय का वास्तविक महत्व ही समाप्त हो जाता है। यदि चुनाव संपन्न हो जाए, परिणाम घोषित हो जाए और उसके बाद न्यायिक फैसला आए, तो वह केवल सैद्धांतिक राहत बनकर रह जाता है।
यही कारण है कि लोगों को पश्चिम बंगाल के उन लाखों मतदाताओं की याद आती है जिनके मतदान अधिकारों को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। आलोचक तंज कसते हुए कहते हैं कि जैसे तब मतदाताओं से कहा गया था कि "अगली बार वोट डाल लेना", वैसे ही अब उम्मीदवारों से कहा जाएगा कि "इस बार नहीं तो अगली बार चुनाव लड़ लेना"। लोकतंत्र में यह तर्क खतरनाक माना जाता है, क्योंकि लोकतांत्रिक अधिकारों का मूल्य तभी है जब उनका उपयोग सही समय पर किया जा सके।
विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि संसद में उसकी आवाज को पर्याप्त स्थान नहीं दिया जाता। विपक्षी नेताओं के भाषणों के दौरान कैमरे का फोकस बदलने, माइक बंद होने या बार-बार व्यवधान पैदा होने जैसी शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। सरकार इन आरोपों को खारिज करती है, लेकिन इन विवादों ने लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न अवश्य खड़े किए हैं।
इसी पृष्ठभूमि में राहुल गांधी लगातार चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं। वे कई प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुके हैं और चुनावी पारदर्शिता पर सवाल पूछ रहे हैं। जब उनसे पूछा गया कि वे अदालत का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाते, तो उनका जवाब था कि उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस केवल मीडिया के लिए नहीं, बल्कि उन सभी संस्थाओं के लिए भी है जो लोकतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी निभाती हैं। उनका तर्क था कि यदि आरोप गंभीर हैं तो संबंधित संस्थाएं स्वतः संज्ञान ले सकती हैं।
आजकल स्वतः संज्ञान की बात तो दूर, अदालत का दरवाज़ा खटखटाने पर भी विपक्ष को न्याय नहीं मिलता। चुनाव आयोग विपक्ष की सुनता नहीं है और सुप्रीम कोर्ट चुनावी प्रक्रिया में दखल देने से इंकार कर देता है। महाराष्ट्र में जो खेला हुआ था, उस पर अदालत ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के कदम को असंवैधानिक करार दिया था, फिर भी असंवैधानिक तरीके से बनी सरकार को चलने दिया।
इंडिया गठबंधन की बैठक में राहुल गांधी ने चुनाव प्रक्रिया और वोट चोरी पर खुलकर कहा — "ममता जी 100% श्योर नहीं हैं, लेकिन उन्हें लगभग 90% श्योर है कि उनका चुनाव उनसे चुरा लिया गया था। उद्धव जी 40% श्योर हैं कि उनका चुनाव चुरा लिया गया था। मेरे भाई तेजस्वी जी 40% श्योर हैं। सुनिए — 100% चुनाव चुराए जा रहे हैं। कृपया अपने मन से शक निकाल दें!" जब कोलकाता के एक सरकारी भवन में आग लगने से 4,000 EVM जलकर भस्म हो जाती हैं, तो कहीं न कहीं संदेह पहले से कुछ प्रतिशत अधिक बढ़ जाता है।
चाहे कोई राहुल गांधी के आरोपों से सहमत हो या असहमत, लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि लोकतंत्र में जनता का विश्वास केवल चुनाव जीतने से नहीं बनता। विश्वास तब बनता है जब हारने वाला भी प्रक्रिया को निष्पक्ष माने और जीतने वाला भी संस्थाओं को अपने राजनीतिक हितों का उपकरण बनाने से बचे। यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी ने अपने सभी महासचिवों, राज्य प्रभारियों और प्रदेश कांग्रेस कमेटियों के अध्यक्षों की एक आपात बैठक बुलाई थी। इस बैठक में राहुल गांधी ने अगले तीन महीनों के भीतर जिला और ब्लॉक स्तर पर संगठन को सक्रिय करते हुए जमीनी लड़ाई को धार देने पर विशेष जोर दिया।
भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। लेकिन लोकतंत्र का आकार नहीं, उसकी आत्मा महत्वपूर्ण होती है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि उसके वोट का मूल्य घट रहा है, विपक्ष को बराबरी का अवसर नहीं मिल रहा, अदालतों से समय पर राहत नहीं मिल रही और संस्थाएं राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बनती जा रही हैं, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि लोकतंत्र भ्रम के सहारे आखिर कब तक चलेगा? न जनता के प्रति जवाबदेही, न प्रेस कॉन्फ़्रेंस का साहस और न ही लोकतंत्र के मंदिर संसद के प्रति कोई आदर! आखिर ये पर्दे के पीछे से चल रहा ‘कठपुतली का खेल’ कब तक चलेगा? वोट डालने के अधिकार तक छिन लिया गया है! जब अदालत का दरवाजा खटखटाओ तो जवाब मिलता है "अगली बार वोट डाल लेना"! जब सरकार अपना वोटर्स को चुनने लगे तो फिर लोकतंत्र का नाटक ही क्यों करना!
इन घटनाओं के बीच एक बड़ा प्रश्न जवाब मांग रहा है—क्या लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम है, या फिर विपक्ष को समान अवसर देना, संस्थाओं की निष्पक्षता सुनिश्चित करना और जनता के अधिकारों की रक्षा करना भी उसकी अनिवार्य शर्त है? इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव आयोग, न्यायपालिका, संसद और राजनीतिक दल, सभी मिलकर जनता के विश्वास को मजबूत करें। क्योंकि लोकतंत्र एक दिन में खत्म नहीं होता। वह धीरे-धीरे कमजोर होता है, बूंद-बूंद करके...


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