अमेरिका में मोहन भागवत का ‘मोहब्बत की दुकान’: लव जिहाद से यू-टर्न, विदेशी दबाव या नया प्रयोग?
अमेरिका में मोहन भागवत का ‘मोहब्बत की दुकान’: लव जिहाद से यू-टर्न, विदेशी दबाव या नया प्रयोग?
लेखक – अरुण कुणाल
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS के प्रमुख मोहन भागवत का अमेरिका दौरा इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है। मुस्लिम विरोध की खाद से जिस संस्था को सौ साल तक सींचा गया, उसके प्रमुख मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में कहना कि, “सच्चा हिंदुत्व भारत से मुसलमानों को बाहर नहीं करता। जो हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है, वह हिंदू नहीं रह जाता।” आरएसएस के शताब्दी वर्ष में संघ प्रमुख का बयान भले ही बाहरी दिखावा हो, लेकिन इसके मायने बहुत हैं!
मोहन भागवत का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय आया है जब RSS अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है और संगठन अपनी विचारधारा को वैश्विक स्तर पर सामने रखने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ संघ की पुरानी विचारधारा की अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति है, या फिर बदलते राजनीतिक और सामाजिक माहौल के बीच संघ अपनी भाषा में भी बदलाव कर रहा है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि भागवत का यह बयान पूरी तरह नया नहीं है। वह पहले भी हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को मुसलमानों के बहिष्कार से अलग बताते रहे हैं। लेकिन राजनीति में सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि नेता ने पहले क्या कहा था। यह भी मायने रखता है कि कब, कहां और किस दर्शक के सामने क्या कहा गया। मोहन भागवत ने यह बात भारत में नहीं, बल्कि न्यूयॉर्क में कही है, वह भी ऐसे समय में जब उनके अमेरिका दौरे को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे।
न्यूयॉर्क सिटी के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने यह कहते हुए मोहन भागवत का विरोध किया था कि आरएसएस का “बहिष्कार करने वाला” नज़रिया उस बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष भारत की सोच के विपरीत है, जिसमें वह पले-बढ़े हैं। आरएसएस का कार्यक्रम रद्द किए जाने के सवाल पर ममदानी ने कहा था, “मैं भागवत के इस कार्यक्रम का समर्थन नहीं करता, लेकिन मुझे नहीं पता कि शहर के पास किसी निजी कार्यक्रम को रद्द करने का अधिकार है या नहीं।”
भागवत के कार्यक्रम के खिलाफ अमेरिका में कुछ मानवाधिकार और इंटरफेथ संगठनों ने भी आवाज उठाई। अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी संस्था USCIRF ने RSS को लेकर गंभीर आरोप लगाए और कुछ लोगों पर लक्षित प्रतिबंधों की सिफारिश तक की हैं। ऐसे माहौल में भागवत का मंच से यह कहना कि मुसलमानों को भारत से बाहर करने की सोच हिंदुत्व नहीं है, स्वाभाविक रूप से ज्यादा ध्यान खींचता है। यही वजह है कि उनके बयान को कुछ लोग ‘मोहब्बत की दुकान’ वाली राजनीति के करीब देख रहे हैं।
यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि कुछ महीने पहले मोहन भागवत ने ‘लव जिहाद’ को लेकर परिवारों में संवाद की कमी को एक कारण बताया था और इसे रोकने के लिए परिवार तथा समाज को जागरूक होने की बात कही थी। हालांकि, बाद में उन्होंने यह भी कहा कि सभी मुसलमानों को एक ही नजर से नहीं देखा जाना चाहिए और बड़ी संख्या में मुसलमान ‘लव जिहाद’ या ‘गजवा-ए-हिंद’ जैसी अवधारणाओं का समर्थन नहीं करते। मोहन भागवत एक तरफ संघ के पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर अपनी बात रखते हैं और दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय के प्रति सामूहिक विरोध की छवि से दूरी बनाने की कोशिश करते नज़र आते हैं।
अमेरिकी मीडिया और कुछ संगठन भी मोहन भागवत के कार्यक्रम का विरोध कर रहे थे! लेकिन उनके बयान के बाद उनकी बदली हुई सोच की चर्चा अमेरिका से लेकर भारत तक हो रही है! कुछ लोग इस बयान को विदेशी दबाव, तो कुछ यूपी चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं! जो लोग श्मशान-कब्रिस्तान और 80:20 की बात करते हैं, उन्हें शायद भागवत का हृदय परिवर्तन पसंद न आए!
यह भी गौर करने वाली बात है कि आज जो लोग मोहन भागवत का विरोध कर रहे हैं, वही लोग सितंबर 2018 में शिकागो में आयोजित “वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस” के समय उनका स्वागत कर रहे थे! भारत की मीडिया के साथ-साथ विदेशी मीडिया भी उनकी तुलना स्वामी विवेकानंद के 11 सितंबर 1893 के शिकागो भाषण से कर रहे थे! ऐसे में सवाल उठता है कि पिछले 8 वर्षों में ऐसा क्या हुआ, जो भारत के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की भाषा अमेरिका बोल रहा है!
2018 में शिकागो में आयोजित वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस के दौरान भी मोहन भागवत का भाषण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा था। तब उनका स्वागत करने वालों में भारतीय और विदेशी हिंदू संगठनों के लोग शामिल थे। आज 8 साल बाद उसी संगठन के प्रमुख को अमेरिका में विरोध का सामना करना पड़ रहा है तो यह चिंता का विषय हैं!
मानवाधिकार संगठनों के प्रदर्शन और USCIRF की आलोचना ने RSS की अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इसलिए यह संभव है कि RSS अपने वैश्विक विस्तार के दौरान अपनी भाषा को ज्यादा समावेशी बनाना चाहता हो। आखिरकार विदेशों में रहने वाले भारतीयों की नई पीढ़ी के लिए केवल धार्मिक पहचान पर्याप्त नहीं है। वहां भारत की छवि, लोकतंत्र, बहुलतावाद और विभिन्न समुदायों के बीच संबंध भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
अमेरिका के बाद मोहन भागवत का कनाडा और ब्रिटेन में कार्यक्रम है। अगर वहां भी उनका विरोध होता है, तो इसमें राहुल गांधी की जीत है। क्योंकि विपक्ष में वे एकमात्र नेता हैं, जो बीजेपी के साथ-साथ आरएसएस की नीतियों का भी विरोध करते हैं। राहुल गांधी न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी खुलकर अपनी बात रखते हैं! सत्ता पक्ष उनके बयानों को भारत विरोधी बताकर उनकी आलोचना करता है।
बीजेपी और संघ के बीच चल रहे राजनीतिक अंतर्विरोध और FCRA बिल के तहत भारत में विदेशी फंडिंग पर रोक की ट्रंप प्रशासन द्वारा खिलाफत के बीच मोहन भागवत का अमेरिकी दौरा काफी मायने रखता है। मोहन भागवत के अलावा भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी अमेरिका दौरे पर हैं!
गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। यही कारण है कि कोई न कोई मंत्री अमेरिका दौरे पर नज़र आता है। भारत-अमेरिका ट्रेड डील, कच्चा तेल, इथनॉल और रूस से दूरी बनाने का दबाव जैसे कुछ मुद्दे हैं, जिन पर मोदी सरकार बैकफुट पर नज़र आ रही है।
ट्रंप प्रशासन के अलावा न्यूयॉर्क सिटी के मेयर ज़ोहरान ममदानी का विरोध भी चिंता का विषय है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को प्रभावित कर रहा है। शायद यही कारण है कि संघ प्रमुख “मोहब्बत की दुकान” खोलते नज़र आ रहे हैं। इसका चुनाव में क्या फायदा होगा, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन विदेशों में भारत की छवि पर इसका पॉजिटिव असर जरूर पड़ सकता है।
मोहन भागवत का न्यूयॉर्क वाला बयान निश्चित रूप से संघ की राजनीति और विचारधारा पर नई बहस शुरू करेगा। इसे कोई हृदय परिवर्तन कहेगा, कोई रणनीतिक बदलाव और कोई अंतरराष्ट्रीय मंच पर छवि सुधारने की कोशिश। लेकिन असली सवाल भाषण से आगे का है। अगर विदेश में ‘एकता और मानवता’ की बात हो और भारत में राजनीति फिर पुराने ध्रुवीकरण की भाषा में लौट आए, तो अंतरराष्ट्रीय मंच से दिया गया संदेश भी जुमला साबित होगा!
इसलिए मोहन भागवत की ‘मोहब्बत की दुकान’ का असली इम्तिहान न्यूयॉर्क में नहीं, भारत में होगा। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है - क्या यह वास्तव में विचारधारा में बदलाव है, विदेशों में छवि सुधारने की रणनीति है, या बदलते राजनीतिक माहौल के हिसाब से संघ भी राहुल गांधी की भाषा बोल रहा हैं? इसका जवाब आने वाले समय में मोहन भागवत के बयानों से ज्यादा, संघ के व्यवहार से मिलेगा।


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