ब्रिक्स पर डोनाल्ड ट्रंप का साया : तस्वीर और बयानों में जो दिखा, दिल्ली डिक्लेरेशन में गायब!




ब्रिक्स पर डोनाल्ड ट्रंप का साया : तस्वीर और बयानों में जो दिखा, दिल्ली डिक्लेरेशन में गायब!


                         लेखक – अरुण कुणाल


नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का मंच सजा तो दुनिया की निगाहें भारत पर टिक गईं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने वैश्विक राजनीति को एक नई तस्वीर दी, तो दूसरी तरफ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की मौजूदगी ने इस मंच को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया। लेकिन इस पूरी तस्वीर में एक ऐसा चेहरा मौजूद नहीं था, जिसकी परछाईं पूरे सम्मेलन पर साफ दिखाई दे रही थी! जी हाँ, हम बात कर रहे हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की।

सम्मेलन ऐसे समय में हुआ जब दुनिया तेजी से बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक समीकरणों से गुजर रही है। व्यापारिक तनाव, एकतरफा शुल्क, क्षेत्रीय संघर्ष और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में बढ़ती अनिश्चितता के बीच ब्रिक्स ने बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक दक्षिण की भूमिका को मजबूत करने का संदेश देने की कोशिश की।

भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ यह समूह अब ईरान, मिस्र, इथियोपिया, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देशों तक फैल चुका है। इसका प्रभाव वैश्विक जनसंख्या और अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से तक पहुंचता है। लेकिन विस्तार के साथ इसकी चुनौती भी बढ़ी है! क्या इतने अलग-अलग हितों वाले देश अमेरिका और पश्चिमी व्यवस्था को लेकर एक साझा रणनीति बना सकते हैं? 

दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं की तस्वीरों और बयानों में भले ही ट्रंप का नाम बार-बार न आया हो, लेकिन उनकी नीतियों का असर सम्मेलन की बातचीत और अंततः नई दिल्ली घोषणा-पत्र की भाषा में महसूस किया जा सकता है। खास तौर पर व्यापार, एकतरफा प्रतिबंध, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के सवाल पर अमेरिका की मौजूदा नीति ब्रिक्स के लिए एक ऐसी पृष्ठभूमि बन चुकी है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

ट्रंप पहले ही ब्रिक्स को लेकर अपनी नाराजगी सार्वजनिक कर चुके हैं। जुलाई 2025 में उन्होंने चेतावनी दी थी कि जो देश ब्रिक्स की कथित “अमेरिका-विरोधी नीतियों” के साथ जुड़ेंगे, उन पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया था कि इस नीति में कोई अपवाद नहीं होगा। यानी वॉशिंगटन की नजर में ब्रिक्स केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का आर्थिक मंच नहीं, बल्कि ऐसी संभावित व्यवस्था भी है जो अमेरिकी आर्थिक और वित्तीय प्रभाव को चुनौती दे सकती है।

यही वजह है कि दिल्ली में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की एक साथ दिखाई देती तस्वीर का राजनीतिक महत्व सामान्य कूटनीतिक मुलाकात से कहीं ज्यादा है। तीनों देशों के रिश्तों की अपनी जटिलताएं हैं, लेकिन एक तस्वीर यह संदेश जरूर देती है कि दुनिया अब किसी एक शक्ति-केंद्र के इर्द-गिर्द नहीं घूम रही। भारत की रणनीति हालांकि चीन या रूस के साथ किसी अमेरिकी-विरोधी गठबंधन का हिस्सा बनने की नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने की है।

प्रधानमंत्री मोदी ने भी ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी संगठन के रूप में पेश करने से परहेज किया है। भारत का जोर “ग्लोबल साउथ” की आवाज को मजबूत करने, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों को ज्यादा प्रतिनिधित्व दिलाने पर रहा है। भारत की अध्यक्षता की थीम भी “रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी” रही है।

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि 'अमेरिकी डॉलर से दूरी' के जिस मुद्दे ने पिछले वर्ष ब्रिक्स और ट्रंप प्रशासन के बीच टकराव की आशंका पैदा की थी, उस पर दिल्ली ने बेहद सावधानी बरती है।  भारत ने किसी साझा ब्रिक्स मुद्रा या डॉलर को सीधे चुनौती देने वाली व्यवस्था का समर्थन नहीं किया। इस मुद्दे को स्थानीय मुद्राओं में भुगतान तक सीमित रखा गया, ताकि ब्रिक्स की आर्थिक भूमिका मजबूत हो लेकिन अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते अनावश्यक टकराव में न जाएं।

ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच अमेरिका को लेकर दृष्टिकोण एक जैसा नहीं है। रूस और ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों और पश्चिमी दबाव का सीधे सामना कर रहे हैं। चीन अमेरिका के साथ लंबे समय से रणनीतिक और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में है। दूसरी तरफ भारत अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और व्यापार में गहरे रिश्ते विकसित कर रहा है। जून 2026 में प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की मुलाकात में दोनों देशों ने रक्षा, रणनीतिक तकनीक, ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई थी।

दिल्ली सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सात साल बाद भारत यात्रा ने इस संतुलन को और महत्वपूर्ण बना दिया। मोदी-शी मुलाकात केवल भारत-चीन संबंधों के लिए नहीं, बल्कि पूरे ब्रिक्स के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक अविश्वास अभी भी मौजूद हैं, लेकिन दोनों देश यह समझते हैं कि वैश्विक शक्ति-संतुलन बदल रहा है।

ब्रिक्स सम्मेलन की तस्वीर को समझने के लिए आने वाले दिनों की एक और अहम कड़ी पर नजर डालनी होगी। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 24 सितंबर को प्रस्तावित अमेरिका यात्रा और व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनकी संभावित अहम बैठक इस बात का संकेत है कि वैश्विक राजनीति में स्थायी दोस्त और दुश्मन जैसी कोई चीज नहीं होती है।

ऐसे में ईरान और रूस की तरह “एकला चलो” की नीति भारत के लिए व्यावहारिक विकल्प नहीं हो सकती। रूस और ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों और दबाव के बावजूद अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन भारत की आर्थिक और रणनीतिक परिस्थितियां कहीं अधिक जटिल हैं।

एक तरफ चीन के साथ भारत का व्यापारिक घाटा लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। चीन भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है। इसके बावजूद नई दिल्ली के लिए बीजिंग के खिलाफ पूरी तरह खड़ा होना आसान नहीं है। सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भी भारत के रिश्ते इतने महत्वपूर्ण हो चुके हैं कि किसी एकतरफा अमेरिकी व्यापार समझौते या टैरिफ व्यवस्था से पूरी तरह बाहर निकलना भारत के लिए आसान विकल्प नहीं होगा। रक्षा, तकनीक, निवेश, ऊर्जा और बाजार, हर क्षेत्र में अमेरिका भारत के लिए महत्वपूर्ण है। यानी भारत के सामने असली चुनौती “किसके साथ जाना है” की नहीं, बल्कि “किसी एक खेमे में गए बिना अपने हित कैसे सुरक्षित रखने हैं” की है।

यही वजह है कि दिल्ली में मोदी-पुतिन-जिनपिंग की तस्वीर जितनी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका दूसरा पहलू भी है। अगर शी जिनपिंग कुछ ही दिनों बाद वॉशिंगटन में ट्रंप के साथ बैठकर व्यापार और रणनीतिक हितों पर बातचीत कर सकते हैं, तो भारत भी अपने विकल्प खुले रखना चाहेगा।

ब्रिक्स के दिल्ली सम्मेलन की एक और दिलचस्प तस्वीर पाकिस्तान के सवाल से जुड़ी है। नाटो की तर्ज पर सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच प्रस्तावित ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ ने पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक नए रणनीतिक समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंच पर पाकिस्तान के खिलाफ कोई कड़ा प्रस्ताव संभव होगा?

भारत के लिए यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन की भूमिका को लेकर नई दिल्ली की चिंताएं सामने आई थीं। दूसरी तरफ पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब की बढ़ती रणनीतिक नजदीकी ने समीकरण को और जटिल बना दिया है। यदि चीन और सऊदी अरब जैसे प्रभावशाली देश पाकिस्तान के साथ अलग-अलग स्तरों पर रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहे हैं, तो ब्रिक्स के भीतर पाकिस्तान के खिलाफ किसी कठोर सामूहिक प्रस्ताव पर सहमति बनाना भारत के लिए आसान नहीं होगा।

ब्रिक्स में शामिल देशों के भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर हित और प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। चीन तो पाकिस्तान का लंबे समय से रणनीतिक साझेदार है। सऊदी अरब भी पाकिस्तान के साथ रक्षा और सुरक्षा सहयोग को महत्वपूर्ण मानता है। रूस और भारत के पुराने संबंध हैं, लेकिन रूस के पाकिस्तान के साथ भी अपने सामरिक संपर्क बढ़े हैं। 

इसी बदलती दुनिया में पुतिन की मौजूदगी भी अहम है। रूस के साथ भारत अपने पुराने रणनीतिक रिश्तों को बनाए रखते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ भी अपने संबंधों को आगे बढ़ा रहा है। दूसरी तरफ ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी एक ही मंच पर हैं जिनके बीच पश्चिम एशिया के संघर्ष के कारण गहरी दूरी पैदा हुई है। 

दिल्ली डिक्लेरेशन की असली कहानी शायद इसी में छिपी है कि ब्रिक्स की मेज पर मौजूद देशों के राष्ट्रीय हित कितने अलग-अलग हैं। और जब राष्ट्रीय हित टकराते हैं, तब साझा घोषणा-पत्र की भाषा अक्सर बहुत कुछ कहने के बजाय बहुत कुछ कहने से बचने की कला बन जाती है।

ब्रिक्स के मंच पर चीन और रूस के साथ खड़ा होना और वॉशिंगटन के साथ आर्थिक रिश्तों को आगे बढ़ाना, भारत की विदेश नीति का यही दोहरा संतुलन आने वाले समय की सबसे बड़ी परीक्षा होने वाला है। 

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