दिल्ली छावनी में तब्दील : ममता बनर्जी समेत TMC के कई नेता हिरासत में! कॉकरोचों के लिए जंतर-मंतर अब दूर नहीं? राहुल गांधी की शतरंज वाली ‘कैसलिंग’ चाल और जनांदोलन का खतरा
दिल्ली छावनी में तब्दील : ममता बनर्जी समेत TMC के कई नेता हिरासत में! कॉकरोचों के लिए जंतर-मंतर अब दूर नहीं?
राहुल गांधी की शतरंज वाली ‘कैसलिंग’ चाल और जनांदोलन का खतरा
लेखक - अरुण कुणाल
दिल्ली सात बार उजड़ी और बसी है। उस दिल्ली की न हवा दिल्ली की है, न पानी दिल्ली का, न मौसम दिल्ली का और न ही लोग दिल्ली के! देश के कोने-कोने से युवा यहां पढ़ने, रोजगार तलाशने और अपने सपनों को पूरा करने आते हैं। ऐसे में दिल्ली आने वाले युवाओं पर पाबंदियां लगाकर सरकार आखिर क्या हासिल करना चाहती है? सवाल सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध के अधिकार का भी है।
इमरजेंसी के दौर में भी इंदिरा गांधी ने ट्रेनों के पहिए नहीं रोके थे। उलटे, कहा जाता है कि लेट चलने वाली ट्रेनें भी समय पर चलने लगी थीं! लेकिन दिल्ली में युवाओं को रोकने के लिए मोदी सरकार की ट्रेनें रोकने की रणनीति भी नाकाम होती दिख रही है। लगता है, युवाओं को सरकार के इस कदम का पहले से ही अंदाज़ा था, तभी वे दो दिन पहले ही दिल्ली पहुंच गए थे!
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ आंदोलन के दौरान केवल जंतर-मंतर की घेराबंदी की गई थी, लेकिन ‘कॉकरोच जनता पार्टी पार्ट-2’ के आंदोलन में पूरी दिल्ली को छावनी में तब्दील कर दिया गया है। हालात ऐसे बना दिए गए हैं, मानो राजधानी में लॉकडाउन लगा हो। आंदोलनकारियों के दिल्ली पहुंचने के रास्ते बंद करने की खबरें हैं। दिल्ली आने वाली ट्रेनों, एनसीआर से राजधानी को जोड़ने वाली बसों और मेट्रो सेवाओं पर भी पाबंदियों की खबरें सामने आई हैं।
आखिर सेना और पुलिस के दम पर युवाओं को कितने दिन रोका जा सकता है? अंततः सरकार को बातचीत का रास्ता अपनाना ही पड़ेगा। क्योंकि ट्रेनें रोकने से आंदोलन रुकते, तो इतिहास में कभी कोई जनांदोलन हुआ ही नहीं होता!
नेताओं की गिरफ्तारी से आंदोलन नेतृत्वविहीन?
कॉकरोच जनता पार्टी के तमाम नेताओं को हिरासत में लिए जाने की खबरें हैं। मुंबई से दिल्ली आ रहे अभिजीत दिपके, सौरभ दास और आशुतोष रांका को फ्लाइट के अंदर से ही हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई। पहली बार कॉकरोच आंदोलन में भाग ले रहे ध्रुव राठी को भी गिरफ्तार किए जाने की सूचना है। सरकारी आंकड़ों और वास्तविकता में अंतर अपनी जगह है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर हिरासत का सवाल सरकार की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आंदोलन के प्रमुख चेहरों को हिरासत में लेने के बाद सरकार को लग सकता है कि विरोध की आवाज कमजोर पड़ जाएगी। लेकिन क्या किसी आंदोलन का नेतृत्व गिरफ्तार करके उसकी वजह को भी खत्म किया जा सकता है? कई जगहों से पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प की तस्वीरें सामने आने की खबरें हैं। यदि आंदोलन का नेतृत्व कमजोर पड़ता है और संवाद के रास्ते बंद होते हैं, तो हालात संभालना पुलिस के लिए भी मुश्किल हो सकता है।
इस आंदोलन में CJP के अलावा वामपंथी दलों और उनके छात्र संगठनों की भी सक्रिय भागीदारी है। वरिष्ठ CPM नेता वृंदा करात और पार्टी महासचिव एम. ए. बेबी की गिरफ्तारी की खबरें आई हैं। दो अक्टूबर से आंदोलनरत छात्र नेता नेहा बोरा को भी हिरासत में लिए जाने की सूचना है। नेहा के साथ सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और CPI-ML के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य जैसे चेहरे भी आंदोलन में शामिल हुए हैं।
दिल्ली के पूर्व CM अरविंद केजरीवाल, सिविल सोसाइटी के सदस्यों और सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने भी प्रदर्शन में भाग लेकर गिरफ्तारियां दी हैं। मीडिया रिपोर्टों में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। कुछ रिपोर्टों में जंतर-मंतर पहुंचने की कोशिश कर रहे लगभग 500 लोगों को हिरासत में लेने और करीब 50 लोगों को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर गिरफ्तार करने की बात कही गई, जबकि कुछ अन्य रिपोर्टों में यह संख्या 5,000 तक बताई गई है और देश भर में अलग-अलग जगहों से कम से कम 10,000 लोगों को हिरासत में लिया गया है।
ममता बनर्जी समेत TMC के कई नेता हिरासत में
पश्चिम बंगाल की पूर्व CM ममता बनर्जी के साथ TMC सांसद डेरेक ओ’ब्रायन, डोला सेन, साकेत गोखले और पार्टी के अन्य नेताओं को भी हिरासत में लिया गया है। ममता बनर्जी अपने नेताओं के साथ दिल्ली के साउथ एवेन्यू बस स्टैंड पर प्रदर्शन कर रही थीं।
आज हिरासत में लिए गए नेताओं में ममता बनर्जी सबसे बड़ा नाम हैं। उनकी इस आंदोलन में मौजूदगी के साथ ही कॉकरोच आंदोलन से INDIA गठबंधन की दूरी को लेकर उठ रहे सवालों पर भी नया मोड़ आ गया है! अब देखना यह है कि दिल्ली की सड़कों से उठी यह आवाज विपक्षी एकजुटता को किस दिशा में ले जाती है।
जंतर-मंतर से बीजेपी कार्यालय तक पहुंचा विरोध की ताप
जंतर-मंतर तक नहीं पहुंच पाने से नाराज युवाओं ने बीजेपी कार्यालय के बाहर भी प्रदर्शन किया। यह तस्वीर आंदोलन के बदलते स्वरूप का संकेत देती है। जिस आंदोलन की शुरुआत चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध से हुई थी, उसके निशाने पर अब मोदी सरकार भी आती दिखाई दे रही है।
यही किसी भी आंदोलन का निर्णायक मोड़ होता है। जब प्रदर्शनकारियों को लगता है कि उनकी शिकायत सुनने के बजाय उनकी आवाज दबाई जा रही है, तो उनका गुस्सा उस व्यवस्था के खिलाफ केंद्रित होने लगता है, जिसे वे अपनी समस्या के लिए जिम्मेदार मानते हैं। सरकार के लिए यह समझना जरूरी है कि सड़क पर उतरने वाले हर युवा को हिरासत में लिया जा सकता है, लेकिन उसके मन में उठ रहे सवालों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
ध्रुव राठी पर ‘शासन परिवर्तन’ की साजिश का आरोप
आंदोलन में यूट्यूबर ध्रुव राठी की एंट्री ने विवाद को नया मोड़ दे दिया है। 8 अक्टूबर को जर्मनी से भारत आए ध्रुव राठी ने बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में CJP और नागरिक समाज संगठनों के ‘पीपुल्स ट्रिब्यूनल’ कार्यक्रम में हिस्सा लिया और SIR को लेकर चुनाव आयोग की पारदर्शिता तथा जवाबदेही पर सवाल उठाए।
इसके बाद बेंगलुरु के पूर्व पुलिस आयुक्त और 2023 में भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके भास्कर राव ने केंद्रीय गृह सचिव को पत्र लिखकर ध्रुव राठी की नागरिकता, पासपोर्ट, वीजा और राजनीतिक प्रदर्शन में भाग लेने की अनुमति की जांच कराने की मांग की है।
दिलचस्प यह है कि आंदोलन की शुरुआत SIR और चुनाव आयुक्त की जवाबदेही के सवाल से हुई थी, लेकिन अब बहस आंदोलनकारियों की नागरिकता और उनकी कथित ‘सत्ता परिवर्तन’ की मंशा तक पहुंच गई है!
सवाल यह है कि क्या मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे विवादों को हवा दी जा रही है? आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन जांच की मांग को साजिश का सबूत नहीं माना जा सकता। बेहतर होगा कि सरकार आरोपों की राजनीति के बजाय SIR और चुनाव आयोग से जुड़े सवालों का जवाब दे, ताकि आंदोलन के मूल मुद्दे पीछे न छूटें!
राहुल गांधी की ‘कैसलिंग’, मोदी सरकार का साँप-सीढ़ी वाला खेल
जहां तक इंडिया गठबंधन और विशेषकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का सवाल है, तो वे शतरंज की ‘कैसलिंग’ चाल चलते दिखाई दे रहे हैं। शतरंज में कैसलिंग के दौरान राजा को सुरक्षित किया जाता है और हाथी को भी सक्रिय होने का अवसर मिलता है। राजनीति में इस रूपक का अर्थ है—रणनीतिक स्थिति बदलना, अपने मोर्चे को सुरक्षित रखना और अगले कदम के लिए नई जगह बनाना।
तीन दिनों तक दिल्ली में अलग-अलग जगह विरोध प्रदर्शन करने के बाद इंडिया गठबंधन के नेता राष्ट्रपति को चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ज्ञापन सौंपते हैं और फिर राहुल गांधी चेन्नई में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में पहुंच जाते हैं। यह सिर्फ कार्यक्रम बदलना नहीं, बल्कि विरोध के केंद्र को एक शहर तक सीमित न रहने देने की रणनीति भी हो सकती है।
शायद साँप-सीढ़ी का खेल खेलने वालों को शतरंज की यह चाल समझ नहीं आ रही है। सरकार का पूरा ध्यान दिल्ली में आंदोलन को नियंत्रित करने पर है, जबकि राहुल गांधी Gen-Z के साथ चेन्नई में विरोध की दूसरी पारी की तैयारी करते दिखाई दे रहे हैं। इस बार राहुल गांधी क्रिकेट का फॉर्मेट T20 नहीं, बल्कि टेस्ट मैच खेलने के मूड में हैं। यानी तात्कालिक राजनीतिक नतीजे के बजाय लंबी लड़ाई की तैयारी!
CJI के शब्दकोष में ‘कॉकरोच’ के बाद ‘मक्खी’ की एंट्री
CJI साहब के ‘शब्दकोष’ की मेहरबानी से इस बार कॉकरोच के साथ फिल्म ‘दबंग’ के ‘मक्खी सिंह’ की भी मैदान में एंट्री हो गई है! गौरतलब है कि युवाओं को ‘कॉकरोच’ कहने के विवाद के बाद CJI सूर्यकांत ने एक अन्य मुहावरे का इस्तेमाल करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और प्रशासन से कहा कि मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
आगे CJI साहब के शब्दकोष से युवाओं के लिए कौन-सा नया संबोधन निकलेगा, यह कहना मुश्किल है। अलबत्ता, व्यंग्य यह है कि युवा हर नए संबोधन पर एक नई पार्टी बनाने को तैयार हैं! बेहतर यही होगा कि बयानबाजी और शब्दों की बहस के बजाय SIR तथा चुनाव आयुक्त से जुड़े विवादों पर सुप्रीम कोर्ट जल्द निर्णय करे। न्यायिक प्रक्रिया में देरी से असमंजस बढ़ता है और राजनीतिक टकराव को लंबा खिंचने का अवसर मिलता है।
धर्मेंद्र प्रधान मामले से ज्ञानेश कुमार तक
धर्मेंद्र प्रधान से जुड़े विवाद में बैकफुट पर आई मोदी सरकार ज्ञानेश कुमार के मामले में झुकने को तैयार नहीं दिखाई देती। इस बार सरकार बीच का रास्ता चाहती है और वह रास्ता सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निकल सकता है। लेकिन अदालत में तारीख पर तारीख के कारण मामला लंबा खिंचने की आशंका भी है।
यदि फैसला चुनाव आयुक्त के पक्ष में आता है, तो क्या देश के युवा और इंडिया गठबंधन के नेता उसे स्वीकार करेंगे? यह भी उतना ही महत्वपूर्ण सवाल है। लोकतंत्र में अदालत के फैसले का सम्मान जरूरी है, लेकिन संस्थाओं के प्रति भरोसा बनाए रखने के लिए शिकायतों का समय पर और पारदर्शी समाधान भी उतना ही आवश्यक है।
कॉकरोच आंदोलन के जनांदोलन बनने का खतरा
आज देश का युवा सड़कों पर है और राहुल गांधी हर रोज विरोध का कोई नया रास्ता तलाशते दिखाई दे रहे हैं। सरकार के सामने अब दो मोर्चे हैं—एक तरफ सड़क पर आंदोलन और दूसरी तरफ संस्थागत तथा राजनीतिक सवाल। पुलिस और प्रशासन के बल पर आखिर कब तक विरोध को रोका जा सकेगा? दिल्ली में कब तक लॉकडाउन जैसे हालात बनाए रखे जा सकेंगे?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कहीं आज का छोटा-सा आंदोलन कल एक व्यापक जनांदोलन का रूप न ले ले। किसी भी लोकतंत्र में सरकार की ताकत केवल विरोध को नियंत्रित करने में नहीं, बल्कि असहमति को सुनने और उसका समाधान निकालने में होती है। सरकार के पास अभी भी रास्ता है—दमन की जगह संवाद और टकराव की जगह समाधान।
दिल्ली की सड़कों पर उमड़ते युवाओं को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना राजनीतिक भूल हो सकती है। उनकी शिकायतों का समाधान संवाद, पारदर्शिता और समयबद्ध न्याय से ही संभव है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि दिल्ली को कई बार उजाड़ा और बसाया गया, लेकिन सवाल पूछने वालों की आवाज को हमेशा के लिए कोई सत्ता कैद नहीं कर सकी।


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