गांधी के देश में सत्याग्रह पर रोक : जंतर-मंतर और शिवाजी पार्क में Gen-Z की गांधीगिरी!
गांधी के देश में सत्याग्रह पर रोक : जंतर-मंतर और शिवाजी पार्क में Gen-Z की गांधीगिरी!
लेखक — अरुण कुणालआज गांधी जयंती पर एक तरफ देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को नमन कर रहा है, दूसरी तरफ दिल्ली के जंतर-मंतर और मुंबई के शिवाजी पार्क से लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर उठती आवाजें देश का ध्यान अपनी ओर खींच रही हैं। सवाल चुनाव आयोग, मतदाता सूची और SIR को लेकर हैं। सवाल यह भी है कि जिस देश ने सत्याग्रह के रास्ते अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी थी, उसी देश में आज अपने मताधिकार को लेकर सवाल उठाने के लिए युवाओं को सड़क पर उतरना पड़ रहा है।
दिल्ली में विपक्ष के नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र समूहों ने गांधी जयंती पर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था। पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों के जुटने की खबर आई और करीब 1,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई। इनमें दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, सीपीएम नेता वृंदा करात, राज्यसभा सांसद संजय सिंह, मनोज झा और छात्र नेता नेहा बोरा भी शामिल हैं।
आज सुबह से ही दिल्ली पुलिस BNSS की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा का हवाला देते हुए जंतर मंतर से हटने की अपील कर रही थी । इसके बावजूद अलग-अलग रास्तों से प्रदर्शनकारी पहुंचते रहे और उन्हें हिरासत में लेने का काम जारी रहा! अब देखना है कि मुंबई -दिल्ली कब एक होती है! अगर आंदोलन दो की बजाए एक जगह होता तो आज की तस्वीर कुछ दूसरी होती!
शिवाजी पार्क में आज शाम 4 बजे आंदोलन होना था, लेकिन दोपहर से ही बड़ी संख्या में युवा शिवाजी पार्क के बाहर जुटने लगे और पुलिस के सुरक्षा बंदोबस्त के बावजूद प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ती गई। मुंबई पुलिस की अनुमति नहीं मिलने के बावजूद CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके के ‘जेल भरो आंदोलन’ के आह्वान पर बड़ी संख्या में युवा वहां नजर आए। शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, संगीतकार विशाल ददलानी और महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी भी आज कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में साथ खड़े नज़र आए!
दिल्ली की तुलना में मुंबई पुलिस का रवैया कुछ अलग नजर आया। दिल्ली में जहां प्रदर्शनकारियों के साथ धक्का-मुक्की करने और उन्हें सड़क पर घसीटने की तस्वीरें सामने आईं, वहीं मुंबई में पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश की।
आज दिल्ली से मुंबई तक एक ही आवाज़ उठ रही थी—“ज्ञानेश कुमार, इस्तीफ़ा दो!” फिलहाल, आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े के साथ SIR पर रोक और चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता की मांग शामिल है। लेकिन अगर जल्द कोई फैसला नहीं लिया गया, तो आंदोलन की तपिश मोदी सरकार तक भी पहुँच सकती है।
इस बार पुलिस की तैयारी पिछली बार की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और कड़ी नजर आ रही है। दिल्ली में जंतर-मंतर धरना स्थल की ओर जाने वाली लगभग सभी सड़कों पर बैरिकेडिंग कर दी गई है। इसके अलावा, चुनाव आयोग के दफ्तर की ओर जाने वाले रास्तों पर भी सुरक्षा बढ़ा दी गई है और आयोग के कार्यालय के बाहर बैरिकेड लगा दिए गए हैं। साफ है कि प्रशासन इस बार किसी भी तरह के जमावड़े और प्रदर्शन को लेकर पहले से अधिक सतर्क नजर आ रहा है।
भारत ने आजादी के बाद सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को लोकतंत्र की बुनियाद बनाया। संविधान के तहत 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाला पात्र भारतीय नागरिक मतदाता सूची में पंजीकरण का अधिकार रखता है। चुनाव आयोग स्वयं कहता है कि उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई पात्र नागरिक छूटे नहीं और कोई अपात्र व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल न हो।
आज यदि किसी युवा को यह चिंता हो कि मतदाता सूची में उसका नाम रहेगा या नहीं, उसे अपने पुराने रिकॉर्ड से संबंध साबित करना पड़ेगा या उसकी पात्रता को लेकर सवाल खड़े होंगे, तो उसकी चिंता को केवल राजनीतिक नारे के रूप में खारिज करना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करेगा। दूसरी ओर, SIR के समर्थकों का तर्क है कि मतदाता सूची को शुद्ध करना आवश्यक है ताकि अपात्र या दोहराव वाले नाम हटाए जा सकें। इसलिए असली सवाल प्रक्रिया की पारदर्शिता, सत्यापन और अपील की प्रभावी व्यवस्था का है।
कल तक जिस SIR और ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी प्रमुखता से उठा रहे थे, आज वही मुद्दा INDIA गठबंधन के अलावा आम आदमी पार्टी और अन्य राजनीतिक तथा नागरिक समूहों के आंदोलनों में भी दिखाई दे रहा है। मुंबई में CJP का आंदोलन भी इसी व्यापक असंतोष की एक अलग अभिव्यक्ति है।दिलचस्प बात यह है कि विरोध का केंद्र केवल राजनीतिक दल नहीं हैं। युवा, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक समूह भी इसमें अपनी आवाज जोड़ रहे हैं। यही लोकतंत्र की ताकत भी है और उसकी चुनौती भी।
जब युवा सड़क पर आता है तो सत्ता और संस्थाओं के लिए जवाबदेही का सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। गांधी जयंती पर जंतर-मंतर और शिवाजी पार्क की तस्वीरें केवल प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें नहीं हैं। वे चुनाव आयोग और सरकार के सामने भी एक सवाल रखती हैं, क्या नागरिकों की शंकाओं का जवाब संवाद से दिया जाएगा या पुलिसिया कार्रवाई से?
युवा आज सड़क पर है और विपक्ष का नैतिक समर्थन उनके साथ दिखाई दे रहा है। अब देखना यह है कि पिछली बार प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठने वाले नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी खुद कब सड़कों पर उतरते हैं। इंडिया गठबंधन के सांसदों ने 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग के कार्यालय तक मार्च करने का कार्यक्रम बनाया है। दोनों के रास्ते फिलहाल अलग-अलग हैं, लेकिन मुद्दा एक ही है और मंज़िल भी एक है - चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता के अधिकारों की रक्षा।
लेकिन सवाल यह है कि जब तक सड़क पर संघर्ष कर रहे युवाओं और संसद के भीतर आवाज उठा रहे विपक्ष के बीच सीधा और मजबूत तालमेल नहीं बनेगा, तब तक यह संघर्ष कितना लंबा चलेगा? अलग-अलग रास्तों पर चलने के बजाय अगर दोनों एक साथ दिखाई दें, तो लोकतांत्रिक दबाव कहीं अधिक स्पष्ट रूप से सामने आएगा।
लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं है। संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार देता है। इसलिए विरोध और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना राज्य की जिम्मेदारी है। प्रदर्शनकारियों को भी शांतिपूर्ण और कानूनसम्मत तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए और प्रशासन को भी असहमति को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा मानना चाहिए।
वोट केवल EVM या बैलेट पर दबाया गया एक बटन नहीं है। वोट नागरिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच भरोसे का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। अगर किसी नागरिक को यह भरोसा ही न रहे कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है, उसकी आवाज सुनी जाएगी और शिकायत का निष्पक्ष समाधान होगा, तो लोकतंत्र की संस्थाओं पर विश्वास कमजोर होता है।
इसी संदर्भ में विपक्ष के चुनाव बहिष्कार का सवाल भी महत्वपूर्ण है। जब ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, तब विपक्ष के सामने चुनावी प्रक्रिया से बाहर जाने और उसी प्रक्रिया के भीतर रहकर संघर्ष करने, दोनों रास्तों पर विचार का प्रश्न है। चुनाव का बहिष्कार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुत बड़ा राजनीतिक निर्णय होता है। विपक्ष यदि चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर हो जाए तो प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर उसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।
संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च राजनीतिक संस्थाओं में से एक है और सड़क लोकतांत्रिक असहमति की महत्वपूर्ण जगह। आज गांधी जयंती पर यही उम्मीद करनी चाहिए कि ‘संसद’ भी आबाद रहे और ‘जंतर-मंतर’ भी, लेकिन दोनों के बीच संवाद का रास्ता कभी बंद न हो। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति विरोध नहीं, बल्कि वह स्थिति होती है जब नागरिक सवाल पूछना ही छोड़ दें।
गांधी जयंती पर दिल्ली से मुंबई तक एक विचित्र तस्वीर दिखाई दे रही है—एक तरफ गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण, दूसरी तरफ गांधी के बताए सत्याग्रह की शैली में सड़क पर सवाल पूछती नई पीढ़ी। गांधी के देश में Gen-Z की यह ‘गांधीगिरी’ सत्ता के लिए विरोध का संदेश भर नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिक भागीदारी की याद दिलाने वाली तस्वीर भी है। नई पीढ़ी अपने तरीके से वही सवाल पूछ रही है—हमारा वोट कहां है, हमारी आवाज कहां है और हमारी लोकतांत्रिक भागीदारी कितनी सुरक्षित है...?


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