रामलीला मैदान में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन: मोदी सत्ता का 'वोट चोरी' से 'परिसीमन' तक गोलपोस्ट बदलने की तैयारी!




रामलीला मैदान में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन: मोदी सत्ता का 'वोट चोरी' से 'परिसीमन' तक गोलपोस्ट बदलने की तैयारी!


                          लेखक -अरुण कुणाल 


चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में कथित गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में इंडिया गठबंधन ने दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में महारैली का आयोजन किया। इस रैली के जरिए विपक्षी दलों ने न सिर्फ चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, बल्कि केंद्र की मोदी सरकार पर भी सीधा राजनीतिक हमला बोला। सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, ममता बनर्जी, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, तेजस्वी यादव, हेमंत सोरेन और प्रियंका गांधी समेत विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं की मौजूदगी ने इसे एक बड़े शक्ति प्रदर्शन का रूप दिया।

महारैली से पहले राहुल गांधी की अगुवाई में विपक्षी दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं और चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में मृत घोषित किए गए लोगों ने मिंटो रोड से रामलीला मैदान तक मार्च निकाला। लगभग दो किलोमीटर लंबे इस मार्च में भारी संख्या में लोग शामिल हुए। सड़कों पर 'वोट चोर, गद्दी छोड़' के नारे गूंजते रहे। इस मार्च का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही था कि जिन लोगों के मतदान के अधिकार पर सवाल खड़े हुए हैं, वे अब खुद अपनी आवाज बुलंद करने सड़कों पर उतर आए हैं।

पब्लिक इम्पीचमेंट और रामलीला मैदान के मेगा शो के बाद विपक्षी एकजुटता के साथ-साथ राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर भी एक नया संकेत दिखाई दे रहा है। पहले इंडिया गठबंधन की रैलियों में वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी और प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी के भाषण का क्रम तय किया जाता था। कई बार उन्हें वरिष्ठ नेताओं के बाद बोलने का मौका मिलता था, लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है। रामलीला मैदान की महारैली में राहुल गांधी ने सबसे अंत में संबोधन किया।

राजनीति में मंच पर कौन पहले बोलता है और कौन सबसे आखिर में, यह महज कार्यक्रम का क्रम नहीं होता, इसके अपने राजनीतिक मायने भी होते हैं। सबसे अंत में बोलने वाले नेता को अक्सर सभा का समापन संदेश देने की जिम्मेदारी मिलती है। ऐसे में राहुल गांधी का अंत में बोलना इंडिया गठबंधन के भीतर बदलते नेतृत्व-संकेत और उनकी बढ़ती केंद्रीय भूमिका के रूप में देखा जा सकता है।

हालांकि रामलीला मैदान की महारैली की सफलता को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के दावे अलग-अलग हैं। विपक्ष ने दस लाख लोगों के जुटने का दावा किया था, जबकि वास्तविक संख्या इससे काफी कम बताई गई। भारतीय जनता पार्टी ने इसे पूरी तरह 'फ्लॉप शो' करार देते हुए दावा किया कि मैदान का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा खाली था। वहीं, दिल्ली पुलिस के अनुमान के मुताबिक रैली में 60 से 70 हजार लोग शामिल हुए। अगर पुलिस के ही आकलन को माने तो 50 हजार की क्षमता वाला रामलीला मैदान भरा हुआ था और बाहर की सड़कों पर भी लोगों की मौजूदगी थी।

किसी राजनीतिक रैली की सफलता का आकलन सिर्फ भीड़ के आंकड़ों से करना उचित नहीं है। इंडिया गठबंधन के 'दिल्ली चलो' आंदोलन को संख्या बल से ज्यादा उसके राजनीतिक संदेश के आधार पर समझने की जरूरत है। विपक्ष का दावा है कि उसने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और वोट चोरी के मुद्दे को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। अगर सत्ता पक्ष को इस मुद्दे पर जवाब देने के लिए लगातार राजनीतिक कार्यक्रम करने पड़ रहे हैं, तो इसे भी विपक्ष की एक उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि जब रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की महारैली चल रही थी, उसी दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन हरियाणा के रोहतक में रोड शो कर रहे थे। इससे पहले वे दिल्ली के चांदनी चौक में भी रैली कर चुके थे। सवाल यह है कि सत्ता में बैठी पार्टी को विपक्ष की महारैली के समानांतर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?

कमाल की बात यह है कि केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने वाली भाजपा भी 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा और रैलियां कर रही है। ऐसा लगता है कि देश में कोई सत्ता पक्ष रहा ही नहीं, सभी विपक्ष की भूमिका में नजर आ रहे हैं! लोकतंत्र को बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी जिस पक्ष पर है, वह भी सड़कों पर उतरकर लोकतंत्र बचाने की अपील कर रहा है। राजनीति का यह विरोधाभास अपने आप में दिलचस्प है।

रामलीला मैदान की महारैली से एक दिन पहले खुले मैदान में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग अपने आप में प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था। भारत में संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की जवाबदेही तय करने के लिए संसद में निर्धारित प्रक्रियाएं मौजूद हैं। लेकिन जब विपक्ष किसी संवैधानिक संस्था के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाते हुए जनता के बीच अपनी बात रखता है, तो वह एक तरह से समानांतर सरकार का रूप ले लेता है। यदि यह प्रयोग आगे बढ़ा, तो आने वाले समय में संसद की तरह जनता की अदालत भी खुले मैदानों में लग सकती है। इसके राजनीतिक और सांकेतिक परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

फिलहाल सत्ता और विपक्ष की पूरी सियासत दो बयानों के बीच उलझकर रह गई है। सत्ता पक्ष का संदेश है—'मोदी कहीं नहीं जाएगा', जबकि विपक्ष का तेवर है—'मोदी जाना चाहे तो भी उसे कहीं जाने नहीं देंगे!' इन दो नारों के बीच लोकतंत्र, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाताओं के अधिकारों की लड़ाई राजनीतिक टकराव का नया केंद्र बनती जा रही है।

रामलीला मैदान की रैली के बाद विपक्षी नेताओं के तेवर से साफ है कि इंडिया गठबंधन वोट चोरी के मुद्दे को इतनी आसानी से ठंडा नहीं होने देगा। आगामी संसदीय सत्रों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक बार फिर हटाने संबंधी प्रस्ताव लाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। विपक्ष के लिए यह केवल किसी एक चुनाव आयुक्त के खिलाफ लड़ाई नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का सवाल है।

दूसरी तरफ, विपक्ष के इस राजनीतिक दबाव के जवाब में सत्ता पक्ष परिसीमन विधेयक को आगे बढ़ाने की तैयारी में दिखाई दे रहा है। गौरतलब है कि पिछली बार यह विधेयक संसद से पारित नहीं हो पाया था। हालांकि, यह भी याद रखना होगा कि विपक्ष के 140 सांसदों के निलंबन के बाद चुनाव आयुक्तों को कानूनी संरक्षण देने वाला विधेयक संसद से पारित कराया गया था। 

विपक्ष और जेन-जी के आंदोलनों से दबाव में नजर आ रही मोदी सरकार आगामी संसदीय सत्र या विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन विधेयक को पारित कराने की हरसंभव कोशिश कर सकती है। परिसीमन का मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। इसके जरिए लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा प्रतिनिधित्व की संरचना में बदलाव हो सकता है।

राजनीति में जब किसी एक मुद्दे पर लगातार सवाल उठने लगते हैं, तो अक्सर बहस की दिशा बदलने की कोशिश होती है। चुनाव आयोग, वोट चोरी और ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही से जुड़ी बहस के बीच परिसीमन को आगे लाना भी इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। आखिरकार, गोलपोस्ट बदलने के लिए परिसीमन से बेहतर मुद्दा क्या हो सकता है?

अंदरखाने की खबरों पर यकीन करें तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा देकर अपनी मुश्किलें कम करना चाहते हैं। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने इस्तीफे की पेशकश भी की थी, लेकिन मोदी सरकार धर्मेंद्र प्रधान एपिसोड को दोहराने के मूड में नहीं है। विपक्ष को वोट चोरी के मुद्दे पर घेरने के बजाय बहस का एजेंडा बदलना और राजनीतिक गोलपोस्ट शिफ्ट करना सरकार की रणनीति हो सकती है।

दरअसल, ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा विपक्ष के लिए एक बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में पेश किया जा सकता है। इससे चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और वोट चोरी के आरोपों पर उठे सवालों को और हवा मिलेगी। इतना ही नहीं, इसकी राजनीतिक आंच नरेंद्र मोदी तक भी पहुंच सकती है। 

ऐसे में मोदी सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ विपक्ष वोट चोरी के मुद्दे को लगातार गर्म रख रहा है, तो दूसरी तरफ ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की मांग राजनीतिक दबाव बढ़ा रही है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या परिसीमन के दांव से वोट चोरी की बहस को पीछे धकेला जा सकेगा, या फिर यह मुद्दा संसद से सड़क तक और ज्यादा जोर पकड़ेगा?

रामलीला मैदान की महारैली ने कम से कम इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि विपक्ष अब केवल संसद के भीतर विरोध दर्ज कराने तक सीमित नहीं रहना चाहता। वह सड़कों पर भी अपनी राजनीतिक मौजूदगी और ताकत दिखाना चाहता है। आने वाले दिनों में यह लड़ाई संसद, सड़क और जनता के बीच किस दिशा में आगे बढ़ती है, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल इतना तय है कि वोट चोरी का मुद्दा विपक्ष के राजनीतिक एजेंडे से हटने वाला नहीं है और मोदी सरकार के सामने इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।


 

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