अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में नहीं चला 'ट्रम्प कार्ड' : बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रम्प के बाद अब किसकी बारी...?

अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में नहीं चला 'ट्रम्प कार्ड' :  बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रम्प के बाद अब किसकी बारी...?

                           लेखक : अरुण कुणाल


3 नवंबर डोनाल्ड ट्रम्प के लिए 'तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा' साबित हुआ! संविधान बदलकर तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का सपना देखने वाले ट्रम्प साहब को अमेरिकी मतदाताओं ने बड़ा झटका दिया है। इस हार को वे अपनी व्यक्तिगत हार मानने से इनकार कर रहे हैं, लेकिन चुनाव परिणामों ने उनकी लोकप्रियता और राजनीतिक पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसका भारत के प्रति अमेरिकी नीति पर क्या असर पड़ेगा, यह आने वाले समय में पता चलेगा, लेकिन ट्रम्प की हार पर अमेरिका के साथ-साथ भारत में भी खुशी देखने को मिल रही है।

दुनिया के दो सबसे महंगे चुनावों में अरबों डॉलर खर्च हुए और दोनों के नतीजों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। इजराइल में बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से दूर रह गया, तो अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी ने कांग्रेस के दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण खो दिया। ट्रम्प तो रिपब्लिकन पार्टी के पारंपरिक गढ़ों में भी अपनी पकड़ नहीं बचा पाए। जिन राज्यों ने दो साल पहले उन्हें भारी समर्थन देकर व्हाइट हाउस पहुंचाया था, वहां भी डेमोक्रेट्स ने सेंध लगा दी।

इन दोनों चुनावों का असर सिर्फ अमेरिका और इजराइल की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। मध्य पूर्व की राजनीति, भारत के साथ रिश्ते, अमेरिका-इजराइल की रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक कूटनीति पर भी इसका असर पड़ सकता है। 2026 के दो चुनाओं ने 2028 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव और मध्य पूर्व के भविष्य की राजनीति के लिए एक नई जमीन तैयार कर दी हैं!

ट्रम्प की हार की कहानी तो न्यूयॉर्क शहर के मेयर चुनाव के वक्त ही लिखी जाने लगी थी, जब ज़ोहरान ममदानी ने एंड्रयू कुओमो जैसे दिग्गज नेता को हराकर इतिहास रच दिया था। ममदानी का चुनाव केवल एक मेयर का चुनाव नहीं था, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की समस्याओं को केंद्र में रखकर लड़ी गई राजनीति की जीत थी।

अब मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेट्स की सफलता को उसी राजनीतिक बदलाव की अगली कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। सवाल सिर्फ ट्रम्प की खोती जा रही लोकप्रियता का नहीं, बल्कि अमेरिकी राजनीति में उन मुद्दों की वापसी का भी है जिन्हें आम मतदाता अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर देखता है।

इस बार के मिडटर्म चुनाव सिर्फ अमेरिकी कांग्रेस तक सीमित नहीं रहे। प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों के अलावा सीनेट की 35 सीटों और 36 राज्यों के गवर्नर पदों के लिए भी मतदान हुआ। डेमोक्रेट्स ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में बहुमत हासिल किया। गवर्नर चुनावों में भी पार्टी ने महत्वपूर्ण बढ़त बनाई। रिपब्लिकन पार्टी से जॉर्जिया, आयोवा, नेवादा, ओहायो और टेक्सास जैसे राज्यों के गवर्नर पद छीनना इस चुनाव की बड़ी राजनीतिक घटना मानी जा रही है!

अमेरिका के मिडटर्म चुनावों में डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को करारी शिकस्त मिली है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने संसद के दोनों सदनों—हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट पर कब्जा कर लिया है। रिपब्लिकन पार्टी ने न सिर्फ अपना बहुमत खोया है, बल्कि कई ऐसे राज्यों में भी हार का सामना किया है, जिन्हें ट्रम्प का मजबूत गढ़ माना जाता था। यह नतीजा महज कुछ सीटों का उलटफेर नहीं, बल्कि ट्रम्प की नीतियों के खिलाफ अमेरिकी जनता का राजनीतिक संदेश है।

भारत के विपरीत, अमेरिकी संसद में बहुमत खोने के बावजूद डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार अगले दो साल तक कायम रहेगी। इसकी वजह भारत और अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था में बुनियादी अंतर है। भारत में लोकसभा में बहुमत खोने पर सरकार के सामने सत्ता गंवाने का संकट खड़ा हो जाता है, जबकि अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव और संसद का चुनाव अलग-अलग होते हैं। राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है। इसलिए कांग्रेस में उनकी पार्टी का बहुमत न होने के बावजूद राष्ट्रपति अपनी कुर्सी पर बने रहते हैं।

जब राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच यानी दूसरे वर्ष में कांग्रेस के चुनाव होते हैं, तो इन्हें 'मिडटर्म इलेक्शन' कहा जाता है। इन चुनावों के जरिए अमेरिकी जनता राष्ट्रपति के कामकाज और नीतियों पर अपनी राय जाहिर करती है। इस बार के नतीजों ने ट्रम्प को साफ संदेश दिया है कि व्हाइट हाउस में बैठने का मतलब यह नहीं कि जनता के सवालों से बचा जा सकता है।

कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत खोने से ट्रम्प की कुर्सी पर सीधे तौर पर कोई खतरा नहीं है, लेकिन अब उनके लिए नए कानून पास कराना आसान नहीं होगा। बजट, सरकारी खर्च, टैक्स और दूसरी नीतियों से जुड़े विधेयकों के लिए उन्हें डेमोक्रेट्स का समर्थन हासिल करना पड़ सकता है। राष्ट्रपति के कई अहम नियुक्तियों पर सीनेट की मंजूरी भी जरूरी होती है। अब डेमोक्रेट्स इन नियुक्तियों पर भी अपनी राजनीतिक ताकत दिखा सकते हैं।

इतना ही नहीं, डेमोक्रेट्स को अब ट्रम्प प्रशासन के खिलाफ संसदीय जांच कराने, अधिकारियों को तलब करने और दस्तावेज मांगने की ताकत भी मिल गई है। राष्ट्रपति के फैसलों, सरकारी खर्च और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर संसद की निगरानी बढ़ेगी। महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का राजनीतिक रास्ता भी खुला रहेगा। हालांकि, राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सीनेट में उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है, जो अपने आप में बड़ी चुनौती है।

यही वजह है कि ट्रम्प के पास अब राष्ट्रपति की वीटो पावर का सहारा तो रहेगा, लेकिन इसका इस्तेमाल भी हमेशा उनकी राजनीतिक जीत सुनिश्चित नहीं कर सकता। राष्ट्रपति किसी विधेयक को वीटो कर सकते हैं, लेकिन कांग्रेस के दोनों सदन दो-तिहाई बहुमत से उस वीटो को निष्प्रभावी कर सकते हैं। यानी ट्रम्प के पास सत्ता तो रहेगी, लेकिन संसद में उनकी मनमानी पर लगाम लग सकती है।

नई संसद जनवरी में कामकाज संभालेगी, लेकिन चुनाव परिणामों ने अभी से राष्ट्रपति ट्रम्प के 'ट्रम्प कार्ड' की हवा निकाल दी है! ट्रम्प ने चुनाव प्रचार में अपनी नीतियों का बचाव किया, लेकिन मतदाताओं ने मतदान के जरिए अपना फैसला सुना दिया। मीडिया और सोशल मीडिया पर लोकप्रिय दिखने वाले राष्ट्रपति ट्रम्प के खिलाफ जमीन पर नाराजगी कहीं ज्यादा है।

ट्रम्प की सियासी हार के ठीक बाद दिसंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्तावित अमेरिका दौरे पर भी सबकी निगाहें रहेंगी। इस बार नरेंद्र मोदी का स्वागत करने के लिए ट्रम्प साहब खुद व्हाइट हाउस के बाहर आते हैं या नहीं, यह भी देखने वाली बात होगी! हालांकि, अमेरिकी चुनाव परिणामों के बाद मोदी और ट्रम्प की मुलाकात का राजनीतिक माहौल पहले जैसा नहीं रहेगा।

पूरी दुनिया को टैरिफ की धमकी देकर डराने वाले ट्रम्प के तेवर में नरमी आती है या वे और भी सख्त कदम उठाते हैं, इस पर भी नजर रहेगी। डेमोक्रेट्स अब ट्रम्प की व्यापारिक नीतियों और टैरिफ के फैसलों पर सवाल उठा सकते हैं। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि अमेरिकी विदेश और व्यापार नीति पर राष्ट्रपति के पास व्यापक अधिकार बने रहेंगे। संसद में बहुमत बदलने से राष्ट्रपति की सभी शक्तियां खत्म नहीं हो जातीं।

जहां तक भारत का सवाल है, तो अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील का क्या होगा? क्या ट्रम्प प्रशासन भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों में नरमी दिखाएगा या टैरिफ की राजनीति जारी रखेगा? भारत के लिए अमेरिका एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है। इसलिए अमेरिकी राजनीति में आया यह बदलाव भारत के निर्यात, निवेश और रणनीतिक संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी के लिए भी अब ट्रम्प के साथ रिश्तों को संतुलित रखना आसान नहीं होगा। एक तरफ व्हाइट हाउस में ट्रम्प की सत्ता रहेगी, दूसरी तरफ अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स का दबदबा होगा। ऐसे में भारत को केवल राष्ट्रपति के साथ व्यक्तिगत संबंधों पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के दूसरे महत्वपूर्ण पक्षों से भी संवाद बढ़ाना होगा।

फिलहाल अमेरिकी मतदाताओं ने ट्रम्प को राष्ट्रपति पद से तो नहीं हटाया, लेकिन उनकी सत्ता पर लगाम लगाने के लिए संसद की चाबी डेमोक्रेट्स को सौंप दी है! ट्रम्प साहब के पास व्हाइट हाउस तो रहेगा, लेकिन अब हर फैसले पर संसद की निगाह रहेगी। यही अमेरिकी लोकतंत्र की खूबसूरती है कि राष्ट्रपति कितना भी ताकतवर क्यों न हो, जनता के फैसले के सामने उसकी राजनीतिक ताकत सीमित हो सकती है!

इन नतीजों का असर केवल ट्रम्प के बचे हुए राष्ट्रपति कार्यकाल पर नहीं पड़ेगा, बल्कि 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति पर भी दिखाई देगा। मिडटर्म चुनावों में मिली सफलता से डेमोक्रेटिक पार्टी को नए नेतृत्व, नए मुद्दों और संभावित राष्ट्रपति उम्मीदवारों को सामने लाने का अवसर मिलेगा। दूसरी तरफ रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी ट्रम्प के बाद नेतृत्व और भविष्य की रणनीति को लेकर बहस तेज हो सकती है।

Comments

Popular posts from this blog

कतरास की प्राणवायु पचगढ़ी बाजार वेंटिलेटर पर : गजलीटांड त्रासदी की 31वीं बरसी और कतरास -पचगढ़ी पर विस्थापन का खतरा!

धनबाद मेयर चुनाव राजनीतिक का नया प्रयोगशाला: झरिया और बाघमारा के बीच शक्ति -संतुलन की निर्णायक जंग!

डोनाल्ड ट्रम्प का एकतरफा सीजफायर, पीएम मोदी का "टीम इंडिया" का नारा : खाड़ी संकट को बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का इंतज़ार!