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Showing posts from November, 2024

जो "वोट- गणित" को समझ लेगा, वही अगला "सिकंदर" होगा!

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जो "वोट-गणित" को समझ लेगा, वही अगला "सिकंदर" होगा!              ले0- अरुण कुणाल  झारखण्ड विधानसभा चुनाव के दौरान मैं अक्सर अपने लेखों और चर्चाओं में कहा करता था कि बीजेपी केवल धनबाद और झरिया में मजबूत दिख रही है और बाघमारा लूज करने वाली है!मेरे आंकलन के अनुसार कांग्रेस बाघमारा में 10% वोट से आगे थी! धनबाद और झरिया का तो सही रहा पर बाघमारा में उल्टा हो गया तो कई लोग सवाल कर रहे है, जो जायज भी है! बाघमारा के चुनावी परिणामों का गणित साधारण नहीं है और इसे मेरे गांव के "मास्टर जी के फॉर्मूले" से ही समझा जा सकता है! हमारे गांव के एक मैथ टीचर की कहानी बहुत फेमस है! जब मैथ के फार्मूला से सवाल हल नहीं होते थे, तो वे दुबारा कोशिश करने की बजाय कुछ अंक जोड़ - घटाव कर उत्तर सही करने की सलाह देते थे! मसलन उत्तर 135 है और मास्टर जी के फार्मूला से 130 आता है तो वे उसमें 5 जोड़ कर समस्या का हल कर लेते थे! मास्टर जी ने कभी यह सोचने की कोशिश नहीं की कि फार्मूला क्यों गलत है, बल्कि समस्या का तात्कालिक हल खोज लिया।  बाघमारा के कुल वोट शेयर के गणित को "गांव के मास्ट...

एग्जिट पोल में हेमंत की सरकार/ "कोल्हान टाइगर" का रिंग मास्टर फेल

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  एग्जिट पोल में हेमंत की सरकार/ "कोल्हान टाइगर" का रिंग मास्टर फेल                             ले 0- अरुण कुणाल  झारखंड चुनाव के एग्जिट पोल में एक बार फिर से हेमंत सोरेन की सरकार की वापसी का अनुमान लगाया गया हैँ! ऐसे में "कोल्हान टाइगर" चंपई सोरेन के रिंग मास्टर अमित शाह की भूमिका पर सवाल उठ सकते हैँ! हेमंत सोरेन को जेल भेजना और उनके करीबी चेहरे चंपई सोरेन, जिन्हें "कोल्हान टाइगर" कहा जाता है, पर सबकुछ दांव पर लगाने के बावजूद सत्ता से दूरी बीजेपी के चाणक्य की व्यक्तिगत हार होगी! अगर एंटी-इंकंबेंसी के बाद भी कोल्हान में JMM अपेक्षित प्रदर्शन कर पाती, तो इसे क्षेत्रीय प्रभाव और मूल वोट बैंक पर चंपई सोरेन और बीजेपी की पकड़ कमजोर होने के संकेत के रूप में देखा जाएगा। अंततः, 23 नवंबर को चुनाव परिणाम बताएंगे कि कोल्हान टाइगर और हेमंत सोरेन की राजनीतिक रणनीति कितनी प्रभावी रही। अगर एग्जिट पोल सही साबित होते हैं और हेमंत सोरेन की सरकार बनती है, तो यह झारखंड की राजनीति में एक बड़ा बदलाव होगा। क्योंकि झारखंड का र...

किसका बूथ सबसे मजबूत?

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किसका बूथ सबसे मजबूत?  चुनाव मैदान में नहीं, बूथ पर जीते जाते हैं!                             ले0 - अरुण कुणाल  चुनाव प्रचार के थमने और मतदान के बीच के 36 घंटे किसी भी चुनाव में निर्णायक समय होते हैं। यह वह अवधि है जब उम्मीदवार और उनके समर्थक प्रत्यक्ष प्रचार नहीं कर सकते, लेकिन इस दौरान की रणनीति और प्रबंधन पूरी चुनावी बाजी पलट सकता है! अब जब प्रचार थम चुका है, तो चुनावी रणभूमि बूथ मैनेजमेंट पर केंद्रित हो गई है। जिस उम्मीदवार या पार्टी का बूथ मैनेजमेंट मजबूत होगा और जो ग्राउंड लेवल पर बेहतर टीम वर्क दिखाएगी, वही इस चुनावी बाजी को जीतने में कामयाब होगी। बाघमारा जैसे क्षेत्रों में, जहां हर वोट मायने रखता है, बूथ की मजबूत पकड़ ही जीत की कुंजी बनेगी। इस लिहाज से अगला 36 घंटा काफी अहम हो जाता है!  अगर इन 36 घंटों में किसी उम्मीदवार की योजना कमजोर पड़ गई, तो उसके लिए काउंटिंग का दिन "सांप-सीढ़ी" जैसा जोखिम भरा खेल बन सकता है। जहां एक तरफ मजबूत प्रबंधन वाले उम्मीदवार अपनी स्थिति मजबूत कर सकते हैं, वहीं चूक ...

बाघमारा कल आज और कल : एक सियासी सफर!

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  बाघमारा कल आज और कल : एक सियासी सफर!                  ले0- अरुण कुणाल  बाघमारा का सियासी सफर वास्तव में एक गहरी और दिलचस्प कहानी है। ये क्षेत्र कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था! 1967 में विधानसभा क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में आने के बाद से लेकर झारखण्ड के रूप में अलग राज्य बनने तक बाघमारा कांग्रेस का एक अभेद्य किला था, उस किले को भेद पाने का कारनामा जलेश्वर महतो ने किया था! यह राजनीति की दुनिया में समय और परिस्थिति का खेल ही है कि कैसे वक़्त का पहिया घूमता है। आज जलेश्वर महतो के कंधे पर कांग्रेस की जिम्मेदारी आन पड़ी है! आज जलेश्वर महतो के सामने सवाल सिर्फ पार्टी प्रतिष्ठा का नहीं है, बल्कि जनता के बीच विश्वास और लोकप्रियता को फिर से हासिल करने और कांग्रेस को उसकी पुरानी ऊंचाइयों पर पहुंचाने की चुनौती भी हैं। मैं 'बाघमारा के लाल' के दौर का गवाह रहा हूं! कांग्रेस विधायक ओ पी लाल से पहले के दौर के बारे में लोगों से सुना हैं और पढ़ा हैं! इसलिए कल आज और कल का सफर लाल साहब से ही शुरुआत कर रहा हूं! उस समय, बाघमारा की राजनीति का स्वरूप एकतर...

बटेंगे तो कटेंगे का सुर बन सकता हैं भस्मासुर!

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  बटेंगे तो कटेंगे का सुर बन सकता हैं भस्मासुर/ झारखण्ड में "बाहरी-भीतरी" मुद्दा/ पश्चिम बंगाल की तरह हो सकता है झारखण्ड का परिणाम! ले0 - अरुण कुणाल  लोकसभा चुनाव के बाद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन उनका "बंटोगे तो कटोगे" नारा और उनके हिंदुत्व-प्रचारक छवि ने उनके राजनीतिक कद को और अधिक मजबूत बना दिया है। योगी के इस नारे ने उन्हें एक 'हीरो' की छवि दे दी है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां बीजेपी हिंदुत्व के नाम पर अपना आधार मजबूत करना चाहती है। उनके समर्थकों और बीजेपी के कोर वोटर बेस के बीच उनकी लोकप्रियता और अधिक बढ़ी है। योगी की लोकप्रियता को देखते हुए आरएसएस उनके साथ खड़ा हो गया हैं! जिसके कारण अमित शाह एंड कंपनी को बैकफूट पर जाना पड़ गया! मजबूरन नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी योगी के इस नारे का अपने भाषणों में जिक्र कर रहे हैं।   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसे नेताओं का योगी के नारे का जिक्र करना दर्शाता है कि पार्टी ने इस नारे को अपनी चुनावी रणनीति का हिस्सा बना लिया है। बीजेपी का शीर्ष ने...

चौराहे पर खड़ा देश पूछ रहा हैं -नोटबंदी के 50 दिन कब पूरे होंगे?

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  चौराहे पर खड़ा देश पूछ रहा हैं -नोटबंदी के 50 दिन कब पूरे होंगे?                       ले0- अरुण कुणाल  ”मैंने देश से सिर्फ 50 दिन मांगे हैं। मुझे 30 दिसंबर तक का वक्त दीजिए। उसके बाद अगर मेरी कोई गलती निकल जाए, कोई कमी रह जाए, मेरे इरादे गलत निकल जाएं तो देश जिस चौराहे पर खड़ा करके जो सजा देगा, उसे भुगतने के लिए मैं तैयार हूं।’’ - नरेंद्र मोदी  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान, जो उन्होंने नोटबंदी के तुरंत बाद 8 नवंबर 2016 को दिया था, तब उन्होंने देश से "50 दिन" की मोहलत मांगी थी, आज 8 साल हो गया! मोदी जी तो चौराहे पर नहीं आए पर देश चौराहे पर आ गया!  बयान के बाद के वर्षों में जब आलोचनाएँ बढ़ी और आंकड़े और रिपोर्ट्स सामने आए, तो यह सवाल उठता रहा कि प्रधानमंत्री ने जो "सजा" लेने का वादा किया था, वह क्या कभी पूरी हुई? क्या सरकार ने अपनी जिम्मेदारी और नीतियों के असर पर सही तरीके से जवाब दिया? सरकार और गोदी मीडिया के ताली -थाली पीटने के बावजूद जैसा कि देखा गया, नोटबंदी के परिणाम जमीनी स्तर पर बहुत विवादित थे। न...

राजनीति में जिसका फ्रंट फुट डिफेंस बेहतर होगा, वह जीतेगा बाघमारा

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राजनीति में जिसका फ्रंट फुट डिफेंस बेहतर होगा, वह जीतेगा बाघमारा!                         ले0 - अरुण कुणाल  बाघमारा की चुनावी क्रिकेट मैदान की बात करे तो इस बार "ड्रॉप-इन पिच" हैं! इस विकेट पर डिफेन्सिव खेलना बेहतर रणनीति होगी! बाघमारा का चुनाव एक कठिन मुकाबला है, और इसमें वही जीत दर्ज करेगा जिसका राजनीतिक फ्रंट फुट डिफेंस मजबूत और स्थिर होगा। राजनीति में फ्रंट फुट डिफेंस का मतलब होता है कि उम्मीदवार के पास स्पष्ट नीति, वोट बैंक पर पकड़ और विवादों से निपटने की क्षमता होनी चाहिए। जो नेता सही समय पर, दृढ़ता से सामने आकर मुद्दों का समाधान करेगा और प्रतिद्वंद्वियों की आलोचनाओं को अच्छे से डिफेंड करेगा, अपने वोटर्स को जोड़े रखेगा, उसकी जीत की संभावना बढ़ जाएगी। इस बार की लड़ाई रन बनाने की नहीं बल्कि विकेट बचाने की हैं! जिसका जितना विकेट बचा रहेगा, वही चुनाव का विजेता होगा! क्रिकेट में फ्रंट फुट डिफेंस एक रक्षात्मक शॉट होता है, जिसमें बल्लेबाज अपने शरीर का वजन आगे (फ्रंट फुट पर) डालते हुए गेंद को अपने बल्ले से डिफेंड करता है...

बीजेपी के चाणक्य को नहीं मिल रहा कल्पना सोरेन के 'ट्रंप कार्ड' की काट!

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 बीजेपी के चाणक्य को नहीं मिल रहा कल्पना सोरेन के 'ट्रंप कार्ड' की काट!                      ले0 - अरुण कुणाल  हेमंत सोरेन को जेल भेजने की कार्रवाई बीजेपी के लिए एक अप्रत्याशित और उलटा दांव पड़ने वाली साबित हो रही है। लगता है कि "डबल इंजन" सरकार से "डबल गलती" हो गई! बीजेपी की इस रणनीति का उद्देश्य हेमंत सोरेन को कमजोर करना और झारखंड में अपनी स्थिति मजबूत करना था, लेकिन  कल्पना सोरेन का उदय एक नई चुनौती के रूप में सामने आ गया है, जिसका अनुमान शायद बीजेपी ने नहीं लगाया था।  बीजेपी ने झारखंड में अपनी रणनीति हेमंत सोरेन पर केंद्रित की हुई है, मानो उन्होंने हेमंत सोरेन को रोकने के लिए एक मजबूत "फिल्डिंग" लगा रखी हो। बीजेपी का पूरा ध्यान उनके खिलाफ मामलों और राजनीतिक चुनौतियों को बढ़ाने पर है, लेकिन इसी दौरान कल्पना सोरेन साइड से लगातार "गोल" किए जा रही हैं! कल्पना सोरेन की यह "साइड अटैक" बीजेपी के लिए एक नई चुनौती बनकर उभर रही है। वह लगातार बीजेपी के खिलाफ "गोल" करती जा रही हैं। उनकी बढ़ती लोकप्रियता और बीजेपी की कल्प...

दिल्ली दरबार रांची शिफ्ट : दिल्ली को "सिफ्टिंग सुल्तान" का इंतजार!

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दिल्ली दरबार रांची शिफ्ट : दिल्ली को "सिफ्टिंग सुल्तान" का इंतजार!                        ले0 - अरुण कुणाल  आम लोगों के लिए तो दिवाली की सफाई और रंगाई-पुताई ही अपने आप में एक बड़ा काम होता है, और घर बदलने की बात करें तो हाथ-पांव फूल जाते है। परन्तु, दिल्ली के "सुल्तान" के लिए राजधानी बदलना मानो रूटीन का हिस्सा बन गया है। जब देखो 'हाथी घोड़ा पालकी' लेकर निकल पड़ते है! दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि दिल्ली का न मौसम अपना है, न पानी दिल्ली का है और न लोग दिल्ली के है! अब इसमें एक लाईन जुड़ जाएगा 'न सुल्तान दिल्ली का है!' आम जनता जो अपने घर की छोटी-छोटी बातों में उलझी होती है, उसे यह सब देख कर निस्संदेह यह लगता है कि नेताओं के लिए सत्ता के इस खेल में शहर बदलना भी कितना सरल हो जाता है। यह स्थिति वाकई हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि देश की आम जनता के मुद्दे और समस्याएं, जिनके लिए हल करना कठिन होता है, उनके लिए राजधानी बदलना कितना आसान होता है!  तुगलक ने दिल्ली से दौलताबाद एक बार राजधानी सिफ्ट किया था, पर मोदी जी हर पांच स...

झारखंड में कौन घुसपैठ कर रहा है - बांग्लादेशी या गुजरात ईस्ट इंडिया कंपनी?

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  झारखंड में कौन घुसपैठ कर रहा है - बांग्लादेशी या गुजरात ईस्ट इंडिया कंपनी?                   - अरुण कुणाल  कही झारखण्ड में बांग्लादेशी घुसपैठ का मामला मोदी सरकार के गले की हड्डी न बन जाए? क्योंकि सवाल तो केंद्र सरकार से भी होगा! अगर घुसपैठिए देश में घुसकर रोटी, बेटी, माटी छीन रहे हैं तो घुसपैठ रोकने में विफल गृहमंत्री से इस्तीफा क्यों नहीं मांगा जा रहा है? बांग्लादेशी घुसपैठ की बात करने वाली बीजेपी को झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में अक्सर "बाहरी" पार्टी के रूप में देखा जाता है। अब संघ और बीजेपी मंडल मुर्मू जैसे आदिवासी नेता के सहारे पार्टी की छवि को बदलने की कोशिश कर रही है लेकिन मोदी -शाह की बीजेपी को "स्थानीय समर्थक पार्टी" के रूप में स्थापित करने के लिए अभी लंबी दूरी तय करनी है! केवल आदिवासियों नेताओ को मुखौटा बनाने से झारखण्ड में घुसपैठ कर पाना मुश्किल है!   अमित शाह और नरेंद्र मोदी आदिवासियों के साथ हिन्दू वोटर की तरह बर्ताव कर रहे है जो उनके खिलाफ जा सकता है! आदिवासियों के बीच बांग्लादेशी घुसपैठ से बड़ा मुद्दा "...