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Showing posts from January, 2026

अमेरिकी अदालत का अडानी को समन: 14 महीने की लुका-छुपी का अंत!

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  अमेरिकी अदालत का अडानी को समन: 14 महीने की लुका-छुपी का अंत!                            लेखक-अरुण कुणाल “लुका-छुपी बहुत हुई, सामने आ जा ना…”अगर गाने की यह पंक्ति तारीख़ पे तारीख़ वाली भारतीय अदालतों के गलियारों में गूंजे, तो शायद किसी को हैरानी न हो। लेकिन जब वही ‘लुका-छुपी’ की गूंज अमेरिकी अदालत में हो, तो वह सिर्फ़ कानूनी घटना नहीं रहती, वह वैश्विक चर्चा का विषय बन जाती है। अमेरिकी समन को लेकर पिछले 14 महीनों से चली आ रही कानूनी और कूटनीतिक लुका-छुपी अब समाप्त हो चुकी है। समन स्वीकार करते ही अडानी का मामला टालमटोल से निकलकर औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में आ गया है। अब यह खेल देरी और तकनीकी आपत्तियों का नहीं, बल्कि सबूतों, दस्तावेज़ों और जवाबदेही का है, वह भी ऐसी अदालत में, जहां “तारीख़ पे तारीख़” नहीं होती हैं। गौतम अडानी और सागर अडानी द्वारा अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के समन को स्वीकार करना केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उस लंबे राजनीतिक–कॉरपोरेट अध्याय का निर्णायक मोड़ ...

सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी एक्ट-26 की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’: दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय!

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सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी एक्ट-26 की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’: दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय!                            लेखक – अरुण कुणाल यूजीसी द्वारा लाए गए ‘इक्विटी रेगुलेशन 2026’ पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक महज़ एक कानूनी हस्तक्षेप नहीं है, बल्कि यह सरकार की राजनीतिक रणनीति पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने न केवल नियमों की अस्पष्टता की ओर इशारा किया, बल्कि केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की असामान्य चुप्पी भी कई संकेत छोड़ गई। अगर मंशा सचमुच नीतिगत सुधार की होती, तो यूजीसी एक्ट के संदर्भ में भी अध्यादेश का रास्ता अपनाया जा सकता था, जैसा कि पहले कई बार किया गया है। ट्रिब्यूनल अध्यादेश, 2021 और दिल्ली सेवा अध्यादेश, 2023 इसके ठोस उदाहरण हैं, जहाँ सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट फैसलों के बावजूद कार्यपालिका ने अध्यादेश के ज़रिए स्थिति को पलटने की कोशिश की थी। अगर सरकार यूजीसी एक्ट पर अध्यादेश नहीं लाई, तो सवाल यह नहीं है कि कर सकती थी या नहीं? सवाल यह है कि उसने ऐसा ...

यूजीसी बिल 2026 बना गले की फांस : जो बनना था ढाल, उसे तलवार बना कर क्या पाया?

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यूजीसी बिल 2026 बना गले की फांस :  जो बनना था ढाल, उसे तलवार बना कर क्या पाया?                            लेखक: अरुण कुणाल यूजीसी बिल काग़ज़ों पर जितना गुलाबी दिखाई देता है, ज़मीनी हक़ीक़त में उतना सरल नहीं है। इस विधेयक के संभावित दुरुपयोग के परिणामों पर न तो पर्याप्त विमर्श हुआ है और न ही कोई ठोस सुरक्षा-प्रबंध नज़र आते हैं। देश के कॉलेज और विश्वविद्यालय पहले ही छात्र राजनीति के अखाड़े बने हुए हैं, जहाँ वैचारिक मतभेद अक्सर व्यक्तिगत और राजनीतिक द्वेष में बदल जाते हैं। ऐसे माहौल में यह आशंका स्वाभाविक है कि कोई भी छात्र संगठन या गुट इस कानून का इस्तेमाल अपने विरोधी छात्र या शिक्षक को फँसाने के औज़ार के रूप में कर सकता है। संसद के बजट सत्र के बीच लाया गया 'यूजीसी बिल-2026' सरकार के लिए सिर्फ़ एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सड़क से संसद तक फैलता हुआ एक संवेदनशील सामाजिक प्रश्न बन चुका है। आमतौर पर नए कानून किसी एक वर्ग या क्षेत्र को प्रभावित करते हैं, लेकिन यह बिल देश के हर उस छात्र, शिक्षक और कर्मचारी से जुड़ा ह...

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहला बजट: रक्षा बजट को लेकर डिफेंस सेक्टर का जोश हाई!

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ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहला बजट: रक्षा बजट को लेकर डिफेंस सेक्टर का जोश हाई!                            लेखक: अरुण कुणाल आगामी आम बजट को लेकर आर्थिक विशेषज्ञों और शुरुआती रिपोर्टों का अनुमान है कि सरकार इस बार रक्षा और बुनियादी ढांचे पर सबसे अधिक ध्यान केंद्रित करेगी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहला बजट होगा, ऐसे में रक्षा मंत्रालय के बजट में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। हालांकि इस बढ़ोतरी का लाभ तीनों सेनाओं को मिलेगा, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी वायु सेना के साथ चीनी एयर डिफेंस सिस्टम की जुगलबंदी को देखते हुए भारतीय वायु सेना (IAF) के प्रति ज्यादा जोश दिखाने की जरुरत है। वरना “हमारी सीमा में न कोई घुसा था, न घुसा है” और “पापा ने वॉर रुकवा दी” जैसे जुमलों की जुगलबंदी से काम चलाना पड़ेगा! ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय जेट विमानों के नुकसान को लेकर भले ही परस्पर विरोधी दावे सामने आए हों, लेकिन किसी भी प्रकार के नुकसान से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और भारतीय...

घटता शिक्षा बजट, बढ़ती चिंताए : बजट...शिक्षा के लिए तू तो हानिकारक है!

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घटता शिक्षा बजट, बढ़ती चिंताए : बजट...शिक्षा के लिए तू तो हानिकारक है!                             (बजट स्पेशल)                              लेखक: अरुण कुणाल भारत जैसे युवा आबादी वाले देश में शिक्षा केवल एक सामाजिक ज़रूरत नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की बुनियाद है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस देश में राइट टू एजुकेशन जैसे संवैधानिक अधिकार मौजूद हैं, जहाँ “पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालों” जैसी कविताएँ और “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे नारे गढ़े जाते हैं, उसी देश में शिक्षा बजट हर साल प्राथमिकताओं की सूची में सबसे पीछे धकेल दिया जाता है। क्यूएस सस्टेनेबिलिटी रैंकिंग 2026 में इस बार भारत का प्रदर्शन चिंता बढ़ाने वाला है। विश्व के टॉप 200 यूनिवर्सिटी में भारत का कोई विश्वविद्यालय नहीं, IIT दिल्ली भी बाहर हो गया है! आईआईटी दिल्ली जो पिछले साल की रैंकिंग में 171 वें स्थान पर था, इस साल उसकी रैंकिंग 205 है! आईआईटी जैसे भारतीय संस्थान का ग्लोबल रैंकिंग ...

कोलकाता से रांची तक ‘ED राज’ का संकट : फेडरल स्ट्रक्चर पर लग सकता है प्रश्नचिह्न?

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कोलकाता से रांची तक ‘ED राज’ का संकट : फेडरल स्ट्रक्चर पर लग सकता है प्रश्नचिह्न?                              ले o - अरुण कुणाल भारतीय संविधान ने देश को एक संघीय लोकतंत्र (फेडरल डेमोक्रेसी) के रूप में परिकल्पित किया है, जहाँ केंद्र और राज्य दोनों की शक्तियाँ स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से केंद्रीय एजेंसियों, विशेषकर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की सक्रियता बढ़ी है, उसने इस संघीय ढांचे पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। कोलकाता से लेकर रांची तक की घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि देश एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहाँ संवैधानिक संतुलन की जगह एजेंसी आधारित शासन की छाया गहराती जा रही है। ईडी बनाम आई-पैक मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप तकनीकी रूप से भले ही कानूनी अधिकार के दायरे में आता हो, लेकिन टाइमिंग ने राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। जब मामला कोलकाता हाईकोर्ट में लंबित था, तब सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुँचना इस आशंका को जन्म देता है कि केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियाँ फोरम शॉपिंग के र...

नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी: ग्रीनलैंड से ईरान तक ट्रम्प का अल्टीमेटम, भारत "तीन में या तेरह में".... ?

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नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी: ग्रीनलैंड से ईरान तक ट्रम्प का अल्टीमेटम !            भारत "तीन में या तेरह में".... ?                             लेखक: अरुण कुणाल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान में सीधे दखल देने की चेतावनी को बार-बार दोहराना, खुद को वेनेजुएला का 'एक्टिंग प्रेसिडेंट' घोषित करना और ग्रीनलैंड को लेकर 20 दिन का अल्टीमेटम देना, कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर 20 दिन बाद क्या होगा? क्या वेनेज़ुएला से शुरू हुई सैन्य आक्रामकता ईरान, क्यूबा और कोलंबिया तक फैलते हुए तीसरे विश्व युद्ध की चिंगारी बन सकती है? यही वजह है कि तीसरे वर्ल्ड वॉर को लेकर 16वीं सदी का फ़्रान्स भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों पर एक बार फिर वैश्विक बहस तेज़ हो गई है।  जब - जब दुनिया युद्ध, महामारी या वैश्विक संकट से गुजरती है, तो नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियां चर्चा के केंद्र में आ जाती हैं। नास्त्रेदमस के अलावा 9/11 और कोविड-19 जैसी घटनाओं की चेतावनी देने वाली बुल्गारियाई ज्योतिष बाबा व...

ट्रंप का न्यू वर्ल्ड ऑर्डर : तीसरे विश्व युद्ध की आहट और भारत की दुविधा

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ट्रंप का न्यू वर्ल्ड ऑर्डर : तीसरे विश्व युद्ध की आहट और भारत की दुविधा!                             ले o- अरुण कुणाल न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के नाम पर डोनाल्ड ट्रम्प जिस T20 क्रिकेट के शॉर्ट फ़ॉर्मेट की राजनीति खेल रहे हैं, उसकी हर गेंद दुनिया की अर्थव्यवस्था और वैश्विक शांति को चोट पहुँचा रही है। आशंका यह है कि यह तेज़-तर्रार मैच कहीं तीसरे विश्व युद्ध के लंबे और विनाशकारी क्रिकेट का टेस्ट मैच फ़ॉर्मेट में तब्दील न हो जाए। यदि ऐसा हुआ, तो आज का भारत स्वयं को इस ‘वर्ल्ड वॉर’ रूपी टेस्ट मैच से अलग नहीं रख पाएगा! क्योंकि नरेंद्र मोदी का न्यू इंडिया जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति को पीछे छोड़ चुका है! रूस–यूक्रेन और इज़राइल–फिलिस्तीन युद्ध से उपजा अंतरराष्ट्रीय तनाव अभी पूरी तरह थमा भी नहीं था कि अमेरिका का सीरिया पर एयर स्‍ट्राइक, वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई और अटलांटिक महासागर में रूसी तेल टैंकर को जब्त कर आग में पेट्रोल डालने का काम किया है। इस बीच 'ग्रीनलैंड और ईरान' में किसी बड़े घटनाक्रम की अटकलें भी तेज़ हैं! भारत...

'वंदे ट्रम्प ट्रेन’ को हरी झंडी का इंतजार: भारत–अमेरिका ट्रेड डील त्रिशंकु की तरह अधर में लटका!

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‘वंदे ट्रम्प ट्रेन’ को हरी झंडी का इंतजार: भारत–अमेरिका ट्रेड डील त्रिशंकु की तरह अधर में लटका!                             लेखक: अरुण कुणाल भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील इन दिनों त्रिशंकु की तरह अधर में लटकी हुई है - न पूरी तरह टूटी, न ही आगे बढ़ती हुई। इस डील के अटकने की वजह कूटनीतिक दस्तावेज़ों से ज़्यादा अब बयानबाज़ी, अहं और राजनीतिक प्रतीकों में खोजी जा रही है। ताज़ा विवाद तब खड़ा हुआ, जब अमेरिका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तय समय-सीमा में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन नहीं किया, जिससे यह डील पटरी से उतर गई। अमेरिकी पक्ष की भाषा और लहजा इस पूरे घटनाक्रम को एक कारोबारी सौदे से ज़्यादा ‘डील मेकिंग शो’ में बदल देता है। लुटनिक का यह कहना कि “ट्रेन तीन हफ्ते पहले छूट चुकी थी”, दरअसल अमेरिकी राजनीति की उस मानसिकता को उजागर करता है, जिसमें कूटनीति को भी रियल एस्टेट सौदे की तरह देखा जाता है या तो अभी हाँ कहो, वरना अवसर खत्म। ल...

मीडिया का न्यू इयर्स रेज़ोल्यूशन: मोदी–शाह को छूना नहीं, बाकी किसी को छोड़ना नहीं!

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