Posts

दिशा सालियान केस 6 साल बाद सीबीआई के हवाले : क्या सुशांत सिंह राजपूत की सुलझेगी मौत की गुत्थी?

Image
दिशा सालियान केस 6 साल बाद सीबीआई के हवाले : क्या सुशांत सिंह राजपूत की सुलझेगी मौत की गुत्थी?                       लेखक — अरुण कुणाल दिशा सालियान की मौत को छह साल बीत चुके हैं, लेकिन अब एक बार फिर यह मामला सुर्खियों में है। दिशा की मौत 8 जून 2020 को मुंबई के मलाड स्थित एक इमारत की 14वीं मंजिल से गिरने के बाद हुई थी। इसके ठीक छह दिन बाद, 14 जून को अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत मुंबई के बांद्रा स्थित उनके अपार्टमेंट में हुई। दोनों घटनाओं के बीच महज छह दिनों का अंतर था। दोनों मामलों को आत्महत्या से जोड़कर देखा गया और जांच के बाद मामले लगभग शांत हो गए। अब दिशा सालियान मामले में मुंबई हाई कोर्ट के आदेश के बाद छह साल पुरानी कहानी फिर से खुलती दिखाई दे रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दिशा सालियान की मौत की नए सिरे से जांच के साथ सुशांत सिंह राजपूत की मौत की गुत्थी भी दोबारा जांच के दायरे में आएगी? दिशा के पिता सतीश सालियान लंबे समय से अपनी बेटी की मौत की नए सिरे से जांच की मांग करते रहे हैं। उनका आरोप है कि दिशा के साथ ...

जीडीपी के अच्छे दिन :आंकड़ों की बाजीगरी या अडानी -अंबानी की ग्रोथ ही देश की ग्रोथ है?

Image
  जीडीपी के अच्छे दिन :आंकड़ों की बाजीगरी या अडानी -अंबानी की ग्रोथ ही देश की ग्रोथ है?                         लेखक – अरुण कुणाल भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर्ज की है। सरकार के लिए यह निश्चित रूप से जश्न मनाने का मौका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे असाधारण उपलब्धि बताते हुए कहा है कि वैश्विक अनिश्चितताओं, तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई चेन की चुनौतियों के बावजूद भारत ने यह रफ्तार हासिल की है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि GDP 7.8 प्रतिशत बढ़ी या नहीं। सवाल यह है कि इस 7.8 प्रतिशत की वृद्धि का फायदा आम भारतीय की जिंदगी में कितना पहुंचा? जीडीपी देश की अर्थव्यवस्था का तापमान बताती है, लेकिन आम आदमी की आर्थिक हालत जानने के लिए सिर्फ थर्मामीटर देखना काफी नहीं है। इसलिए सवाल अडानी-अंबानी के बढ़ने पर आपत्ति का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत की आर्थिक विकास यात्रा में अडानी-अंबानी के साथ वह करोड़ों भारतीय भी आगे बढ़ रहे हैं, जिनके नाम किसी कॉरपो...

अमेरिका में मोहन भागवत का ‘मोहब्बत की दुकान’: लव जिहाद से यू-टर्न, विदेशी दबाव या नया प्रयोग?

Image
अमेरिका में मोहन भागवत का ‘मोहब्बत की दुकान’: लव जिहाद से यू-टर्न, विदेशी दबाव या नया प्रयोग?                         लेखक – अरुण कुणाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का अमेरिका दौरा इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है। मुस्लिम विरोध की खाद से जिस संस्था को सौ साल तक सींचा गया, उसके प्रमुख मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में कहना कि, “सच्चा हिंदुत्व भारत से मुसलमानों को बाहर नहीं करता। जो हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है, वह हिंदू नहीं रह जाता।” आरएसएस के शताब्दी वर्ष में संघ प्रमुख का बयान भले ही बाहरी दिखावा हो, लेकिन इसके मायने बहुत हैं! मोहन भागवत का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय आया है जब RSS अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है और संगठन अपनी विचारधारा को वैश्विक स्तर पर सामने रखने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ संघ की पुरानी विचारधारा की अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति है, या फिर बदलते राजनीतिक और सामाजिक माहौल के बीच संघ अपनी भाषा में भी बदलाव कर रहा है? स...

मेसी का सपना टूटा, स्पेन ने रचा इतिहास; लामिन यामाल बने विश्व फुटबॉल के नए पोस्टर बॉय!

Image
  मेसी का सपना टूटा, स्पेन ने रचा इतिहास; लामिन यामाल बने विश्व फुटबॉल के नए पोस्टर बॉय!                            लेखक - अरुण कुणाल  फीफा विश्व कप 2026 कई मायनों में इतिहास के सबसे भव्य, विस्तृत और रोमांचक संस्करणों में से एक साबित हुआ। 48 टीमों ने इस महाकुंभ में हिस्सा लिया और पहली बार ही इसका आयोजन तीन देशों (अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा) ने संयुक्त रूप से किया। नार्वे और इंग्लैंड की टीमों के चौंकाने वाले प्रदर्शन, रोमांचक नॉकआउट मुकाबलों, नेमार और क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे दिग्गजों की भावुक विदाई और अर्जेंटीना–स्पेन के ऐतिहासिक फाइनल ने इस विश्व कप को लंबे समय तक यादगार बना दिया। भारत में फीफा विश्व कप की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अर्जेंटीना और स्पेन के बीच खेले गए फाइनल मुकाबले को देखने के लिए दिल्ली के कई रेस्टोरेंट, स्पोर्ट्स बार और कैफे सुबह चार बजे तक खुले रहे। देर रात से लेकर भोर तक फुटबॉल प्रेमियों का उत्साह देखते ही बनता था। भारत में लियोनेल मेसी के प्रशंसकों की बड़ी सं...

सोनम वांगचूक और राहुल गांधी: एक फूल दो माली! कॉकरोच का हाथी से टक्कर, 20 जुलाई को आंदोलन का हो सकता है निर्णायक मोड़!

Image
सोनम वांगचूक और राहुल गांधी: एक फूल दो माली! कॉकरोच का हाथी से टक्कर, 20 जुलाई को आंदोलन का हो सकता है निर्णायक मोड़!                               लेखक: अरुण कुणाल "हाथी से टकराना" मुहावरा सुनते ही मुझे जैन टीवी के दिनों की एक पुरानी याद ताज़ा हो जाती है। उस दौर में जैन टीवी के प्रमोटर डॉ. जे.के. जैन और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान सचिव एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा के बीच टकराव की चर्चा मीडिया जगत में खूब होती थी। इस संघर्ष का असर संस्थान की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ा। हालत इतनी खराब हो गई थी कि कर्मचारियों को समय पर वेतन तक नहीं मिल पाता था। एक समय जैन टीवी पत्रकारिता की सबसे बड़ी पाठशालाओं में गिना जाता था। आज देश के कई बड़े पत्रकार वहीं से निकले हैं। उन दिनों सुशांत सिन्हा, रमेश भट्ट और मैं संस्थान के "युवा तुर्क" माने जाते थे। प्रबंधन के खिलाफ वरिष्ठों के आंदोलन में हमें भी आगे कर दिया गया था। अंततः डॉ. जे.के. जैन के साथ एक निर्णायक बैठक हुई। उसी बैठक में उन्होंने कहा था—"मर...

लोकतंत्र के ढहते स्तंभों के बीच सत्याग्रह की बदलती गूंज: अन्ना हज़ारे से सोनम वांगचुक तक गांधीवादी सत्याग्रह की प्रासंगिकता!

Image
  लोकतंत्र के ढहते स्तंभों के बीच सत्याग्रह की बदलती गूंज: अन्ना हज़ारे से सोनम वांगचुक तक गांधीवादी सत्याग्रह की प्रासंगिकता!                            लेखक - अरुण कुणाल  सोनम वांगचुक को अधिकांश लोग "3 इडियट्स" फिल्म के प्रेरणा स्रोत के रूप में जानते हैं, लेकिन उनका वास्तविक परिचय लद्दाख के पर्यावरण, संस्कृति और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में है। इस संघर्ष के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आज वे लद्दाख से दिल्ली आकर युवाओं के राष्ट्रीय आंदोलन का न केवल अन्ना हज़ारे की तरह प्रमुख चेहरा हैं, बल्कि गांधीवादी सत्याग्रह की एक चलती-फिरती प्रयोगशाला भी बन चुके हैं। भारतीय लोकतंत्र में अनशन केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति का प्रतीक रहा है। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और उपवास को सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का ऐसा हथियार बनाया, जिसमें हिंसा नहीं, बल्कि आत्मबल और जनमत की ताकत होती है। स्वतंत्र भारत में यदि किसी अनशन ने राष्ट्रीय राजनीति को सबसे अधिक प्रभ...

बूंद-बूंद टपकती इमरजेंसी : मीनाक्षी नटराजन और ममता बनर्जी के साथ खेला, डिलिमिटेशन बिल का नंबर गेम कनेक्शन?

Image
बूंद-बूंद टपकती इमरजेंसी : मीनाक्षी नटराजन और ममता बनर्जी के साथ खेला, डिलिमिटेशन बिल का नंबर गेम कनेक्शन?                             लेखक : अरुण कुणाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं पर जनता का विश्वास रहा है। लेकिन जब चुनाव, उम्मीदवारों की पात्रता, विपक्षी दलों की राजनीतिक स्वतंत्रता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर लगातार विवाद सामने आने लगें, तब सवाल केवल किसी एक चुनाव या एक नेता का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की विश्वसनीयता का बन जाता है। हाल के घटनाक्रमों ने यही चिंता पैदा की है कि कहीं देश में औपचारिक रूप से नहीं, लेकिन "बूंद-बूंद टपकती इमरजेंसी" जैसी स्थिति तो नहीं बन रही। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर उठे सवालों के जवाब अभी पूरी तरह सामने भी नहीं आए थे कि कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को लेकर पैदा हुआ विवाद नई बहस छेड़ गया। यदि किसी उम्मीदवार का नामांकन तकनीकी या कानूनी आधार पर खारिज होता है और अदालत में मामला लंबित रहते हुए ...

मानसून के साथ दिल्ली में ‘कॉकरोच’ की दस्तक: 6 जून को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की अग्निपरीक्षा!

Image
मानसून के साथ दिल्ली में ‘कॉकरोच’ की दस्तक:  6 जून को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की अग्निपरीक्षा!                              लेखक - अरुण कुणाल  दिल्ली की राजनीति में 6 जून का दिन दिलचस्प और संभावित रूप से महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। एक तरफ सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी कॉकरोच जनता पार्टी जंतर-मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू करने की घोषणा कर रही है, तो दूसरी तरफ दो दिन बाद विपक्षी दलों की एक महत्वपूर्ण बैठक भी प्रस्तावित है, जिसमें 'खेला होबे' की राजनीति के लिए चर्चित ममता बनर्जी स्वयं भाग लेने दिल्ली आ रही हैं। इन दोनों घटनाओं का होना राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए कई सवाल खड़े करता है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में यह स्पष्ट रूप से देखा गया है कि सोशल मीडिया अब केवल विचार व्यक्त करने का मंच नहीं रह गया है, बल्कि वह राजनीतिक लामबंदी और जनमत निर्माण का एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। ऐसे समय में कॉकरोच जनता पार्टी का अचानक चर्चा में आना और उसक...

दो पाटन के बीच भारत का Gen-Z : क्या सोशल मीडिया बनेगा रामलीला मैदान?

Image
  दो पाटन के बीच भारत का Gen-Z :  क्या सोशल मीडिया बनेगा रामलीला मैदान?                                ले. अरुण कुणाल पश्चिम एशिया में अशांति और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच राहुल गांधी का यह कहना कि मोदी सत्ता एक साल की मेहमान है और कॉकरोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर धूम मचाने के बाद सरकार भले ही कहे कि सब ठीक चल रहा है पर जिस तरह से राहुल गांधी और युवाओं को सरकार टारगेट कर रही है, उसे देखकर आने वाले समय में किसी बड़े आंदोलन से इंकार नहीं किया जा सकता है। जबकि दूसरी तरफ सरकार लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सब कुछ नियंत्रण में है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से राहुल गांधी, विपक्षी आवाज़ों और खासकर युवाओं को लेकर सरकार की आक्रामकता दिखाई दे रही है, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश किसी बड़े राजनीतिक या जनआंदोलन की ओर बढ़ रहा है। इतिहास गवाह है कि जब आर्थिक दबाव, बेरोजगारी, महंगाई और राजनीतिक असंतोष एक साथ मिलते हैं, तब सत्ता की स्थिरता के दावे अचानक कमजोर पड़ने लगते ह...

गैंग्स ऑफ वासेपुर का सोप ओपेरा: किसके संरक्षण में चल रही है प्रिंस खान की पैरलल सरकार?

Image
                         गैंग्स ऑफ वासेपुर रिटर्न्स गैंग्स ऑफ वासेपुर का सोप ओपेरा: किसके संरक्षण में चल रही है प्रिंस खान की पैरलल सरकार? लेखक - अरुण कुणाल जब बात धनबाद के डॉन प्रिंस खान की हो, तो उसके मामा फहीम खान का फ़िल्मी किरदार निभाने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ धनबाद को लेकर हुई बातचीत का यहां ज़िक्र करना लाज़िमी हो जाता है। फ़िल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के रिलीज़ होने के ठीक बाद मेरी उनसे पहली मुलाक़ात हुई थी। ये उन दिनों की बात है, जब एक फ़िल्म की वजह से वासेपुर काफ़ी चर्चा में था। उसके बाद नवाजुद्दीन से मेरी मुलाक़ात उनकी भाभी के केस को लेकर हुई, जिसकी दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस मैंने कराई थी। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के मैनेजर ने मुझे PR के लिए पैसे देने की बात कही थी, लेकिन वह उनका निजी मामला था, इसलिए मैंने कोई फीस नहीं ली। आज भी शायद वे मुझे इस बात से ज़्यादा इसलिए जानते हैं कि मैं उस शहर धनबाद से हूं, जिस पर बनी उनकी फ़िल्म ने पूरे देश में उसे एक अलग पहचान दी थी! नवाजुद्दीन सिद्दीकी और बिपाशा बसु की फिल्म 'आत्मा...

पिनराई विजयन : द लास्ट कॉमरेड ऑफ़ लेफ्ट मुक्त भारत!

Image
  पिनराई विजयन :  द लास्ट कॉमरेड ऑफ़ लेफ्ट मुक्त भारत!                              लेखक – अरुण कुणाल भारतीय राजनीति के लंबे और उतार-चढ़ाव भरे इतिहास में वामपंथ एक समय वैचारिक दृढ़ता, संगठनात्मक अनुशासन और जन-आंदोलनों की शक्ति का पर्याय हुआ करता था। लेकिन समय के साथ बदलते राजनीतिक समीकरणों, सामाजिक आकांक्षाओं और नेतृत्वगत निर्णयों ने इस धारा को सीमित कर दिया। आज जब हम केरल की राजनीति को देखते हैं, तो पिनराई विजयन एक ऐसे नेता के रूप में उभरते हैं, जो न केवल अपने राज्य में वामपंथ की अंतिम मज़बूत कड़ी हैं, बल्कि एक युग के समाप्त होने के प्रतीक भी बनते जा रहे हैं। केरल को लंबे समय तक वामपंथ का गढ़ माना जाता रहा है। यहां की राजनीतिक चेतना, शिक्षा का स्तर और सामाजिक विकास ने वामपंथी विचारधारा को गहराई से जड़ें जमाने का अवसर दिया। लेकिन हाल के वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति में जो बदलाव आया है, उसका प्रभाव केरल पर भी धीरे-धीरे दिखने लगा है। यदि यह कहा जाए कि केरल वामपंथ का आख़िरी किला है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं हो...