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Showing posts from December, 2025

रेहान - अवीवा का 'कोडक मोमेंट' : गांधी परिवार के प्यार का पंचनामा!

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  रेहान - अवीवा का 'कोडक मोमेंट'  : गांधी परिवार के प्यार का पंचनामा!                              ले o - अरुण कुणाल राजस्थान के रणथंभौर से आ रही रेहान वाड्रा और अवीवा बेग की सगाई की ख़बर ने दिल्ली की सियासी फिज़ा में हलचल पैदा कर दी है। दिलचस्प यह है कि गांधी परिवार से जुड़े रेहान वाड्रा, राजनीति में सक्रिय न होने के बावजूद, अपने मामा राहुल गांधी से एक क़दम आगे निकलते दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी की प्रेम कहानी को लेकर वर्षों से अटकलें लगती रही हैं। कभी महाराष्ट्र चुनाव से पहले शादी की संभावनाएँ जताई गईं, तो कभी उनकी कथित कोलंबियाई गर्लफ्रेंड को लेकर चर्चाएँ हुईं लेकिन बात कभी अंजाम तक नहीं पहुँची। रेहान–अवीवा के मामले में एक सकारात्मक बात यह रही कि इसे हिंदू–मुस्लिम रंग देने की कोई संगठित कोशिश नहीं हुई। संभव है कि फिलहाल कहीं चुनाव न हों, इसलिए नफ़रती आवाज़ें खामोश रहीं हो। जो भी वजह हो, इस चुप्पी को अच्छा ही कहा जाएगा! क्योंकि किसी के प्रेम को ‘लव जिहाद’ का लेबल देना न केवल ग़लत है, बल्कि समाज को ब...

अब रेगिस्तान दूर नहीं : 'एक पेड़ माँ के नाम’ और अरावली का मौन विनाश!

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अब रेगिस्तान दूर नहीं : ' एक पेड़ माँ के नाम’ और अरावली का मौन विनाश!        *100 मीटर नहीं, 100 पीढ़ियों का सवाल है अरावली*                                            ले o - अरुण कुणाल देश में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जब भी सरकार की मंशा पर सवाल उठते हैं, तब ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे भावनात्मक नारे सामने रख दिए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्यावरण केवल प्रतीकों और अभियानों से बचाया जा सकता है? यदि ऐसा होता, तो आज भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला अरावली अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई नहीं लड़ रही होती। अरावली पर्वतमाला लगभग 692 किलोमीटर तक गुजरात के पालनपुर से लेकर दिल्ली-एनसीआर तक फैली हुई है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार यह पर्वत श्रृंखला लगभग तीन अरब वर्ष पुरानी है और विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वतमालाओं में गिनी जाती है। इसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान से होकर गुजरता है, जहाँ यह न केवल भौगोलिक पहचान है बल्कि जीवन रेखा भी है। राजस्थान की अधि...

नोबॉडीज़ गर्ल : ‘भारत-पाक वॉर’ रुकवाने वाले ने ‘एप्सटीन फाइल्स’ भी रुकवा दी!

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नोबॉडीज़ गर्ल : ‘भारत-पाक वॉर’ रुकवाने वाले ने ‘एप्सटीन फाइल्स’ रुकवा दी!             *सत्ता और लोलिता का अपराध-पथ*                  ले o - अरुण कुणाल जो ‘भारत -पाक वॉर' रुकवाने का श्रेय ले रहा है, उसी ने ‘एप्सटीन फाइल्स’ पर भी ब्रेक लगा दिया। कुछ लोग वॉर से ज्यादा एप्सटीन फाइल्स रुकवाने पर राहत महसूस कर रहे होंगे और वे लोग ट्रम्प के लिए नोबेल पुरस्कार की सिफारिश जरूर करेंगे! ट्रम्प सरकार का तथाकथित 'ऑपरेशन कवर-अप' दरअसल ‘एप्सटीन कांड’ पर पर्दा डालने की एक नाकाम कोशिश भर है। इससे कहीं बेहतर होता कि वर्जीनिया गिफ्रे पर आधारित पुस्तक ‘नोबॉडीज़ गर्ल’ को दुनिया भर में निर्बाध रूप से जारी कर दिया जाता। यह किताब जेफरी एप्सटीन के सेक्स-सिंडिकेट की वह भयावह सच्चाई सामने लाती है, जिसे सत्ता और ताकत के गठजोड़ ने वर्षों तक अंधेरे में छिपाए रखा। ‘नोबॉडीज़ गर्ल’ में दर्ज दास्तानें सिर्फ सनसनीखेज नहीं, बल्कि उस वैश्विक नेटवर्क का काला सच हैं, जिसमें सत्ता, पैसा और अपराध एक-दूसरे के संरक्षक बने हुए थे। यह किताब बताती है कि एप्स...

एपस्टीन फाइल्स का ‘शनि-वार’: भारत और ट्रम्प को राहत, सारा फोकस बिल क्लिंटन पर शिफ्ट

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  एपस्टीन फाइल्स का ‘शनि-वार’: भारत और ट्रम्प को राहत, सारा फोकस बिल क्लिंटन पर शिफ्ट!                        ले o - अरुण कुणाल अमेरिका में यौन अपराध के दोषी जेफ़री एपस्टीन से जुड़े लंबे समय से गोपनीय रखे गए सरकारी दस्तावेज़ों की सार्वजनिक रिलीज़ 19 दिसंबर 2025 से शुरू हो चुकी है। अमेरिकी न्याय विभाग ने कांग्रेस द्वारा पारित ‘एपस्टीन फ़ाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट’ के तहत हज़ारों पन्नों के दस्तावेज़ और सैकड़ों तस्वीरें जारी की हैं। इनमें एपस्टीन से जुड़ी जांच रिपोर्टें, फ्लाइट लॉग्स, फोटोग्राफ़्स और अन्य आधिकारिक रिकॉर्ड शामिल हैं। हालांकि, यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप प्रशासन का न्याय विभाग, जिसके पास दस्तावेज़ों की रिलीज़ पर पूर्ण नियंत्रण है, कितनी सामग्री वास्तव में सार्वजनिक करेगा और दस्तावेज़ों के चयन की प्रक्रिया किन मानकों पर आधारित है। पारदर्शिता के दावे के बावजूद, दस्तावेज़ों की आंशिक और चयनात्मक रिलीज़ कई सवाल खड़े कर रही है। पीड़ितों की गोपनीयता की सुरक्षा का हवाला देते हुए जारी दस्तावेज़ों में व्यापक स्तर पर स...

आज से जेफ़री एपस्टीन का साढ़े-साती शुरू: अमेरिका से भारत तक राजनीति के पंडितों का जाप!

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  आज से जेफ़री एपस्टीन का साढ़े-साती शुरू: अमेरिका से भारत तक राजनीति के पंडितों का जाप!   ले o - अरुण कुणाल अमेरिका के लिए आज रात और भारत के लिए कल सुबह—जेफ़री एपस्टीन का साढ़े-साती शुरू हो रहा है। यह कोई ज्योतिषीय मुहावरा भर नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में छिपे उस अंधेरे का संकेत है, जिसे दशकों तक ताक़त, पैसे और प्रभाव के पर्दों से ढका गया। दिवंगत लेकिन दोषी ठहराए जा चुके यौन अपराधी जेफ़री एपस्टीन से जुड़ी अनक्लासिफ़ाइड फाइलें सार्वजनिक होने जा रही हैं और उससे ठीक पहले दर्जनों नई तस्वीरों का सामने आना इस तूफान की आहट है। एपस्टीन फ़ाइल्स के काउंटडाउन ने सत्ता, सिनेमा और सेलेब्रिटी गलियारों में ऐसा सन्नाटा पैदा किया है कि दिल की धड़कन नाड़ी से नहीं, मीडिया के ब्रेकिंग न्यूज़ से मापी जा रही है। नेता हों या अभिनेता, बड़े कारोबारी हों या क्रिकेट के ‘रोल मॉडल’—सबकी बेचैनी एक जैसी है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि कोई PR एजेंसी के दरवाज़े खटखटा रहा है, तो कोई कानूनी टीम को देर रात तक जगाए बैठा है। कल सुबह का अख़बार बताएगा किसकी धड़कन हेडलाइन बनी और किसकी फ़ाइल अभी “सूत्रों के हवाले”...

राहुल–अडानी की गुप्त मीटिंग: संयोग, संकेत या सियासी बदलाव की नई पटकथा?

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  राहुल–अडानी की गुप्त मीटिंग: संयोग, संकेत या सियासी बदलाव की नई पटकथा?                    ले o - अरुण कुणाल आजकल ‘हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाबी खो जाए’ की तर्ज़ पर राहुल गांधी और गौतम अडानी की मुलाक़ात की पटकथा किसने लिखी—इस पर ज़्यादा चर्चा है। सियासी गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या इस कहानी के असली निर्देशक शरद पवार हैं, जिनकी रणनीति 'एपस्टीन फाइल्स' से भी ज़्यादा रहस्यमय मानी जा रही है। बात इतनी सी होती तो और बात थी, 'राहुल -अडानी मीट' और एपस्टीन फ़ाइल्स की डेडलाइन के बीच NDA ने अपने सभी सांसदों के लिए व्हिप जारी कर दिया है। सवाल यही है कि चर्चा किस पर और चुप्पी किस पर होगी ? शरद पवार के जन्मदिन पर आयोजित एक डिनर पार्टी इन दिनों राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। वजह न तो पार्टी का मेन्यू है और न ही मेहमानों की संख्या, बल्कि एक ही कमरे में मौजूद दो ऐसे नाम हैं जिनके बीच पिछले एक दशक से टकराव की राजनीति चलती रही है—राहुल गांधी और गौतम अडानी! हालांकि दोनों की मुलाक़ात की कोई तस्वीर सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन राजनीत...

एपस्टीन फाइल्स और भारत: आरोप और अफ़वाहों के बीच 19 दिसंबर को सियासी सुनामी के संकेत!

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एपस्टीन फाइल्स और भारत : आरोप और अफ़वाहों के बीच 19 दिसंबर को सियासी सुनामी के संकेत!                ले o- अरुण कुणाल जेफरी एपस्टीन मामला मूलतः अमेरिका का एक आपराधिक प्रकरण था, लेकिन समय के साथ यह वैश्विक सत्ता, रसूख़ और नैतिकता की परीक्षा बन गया। यह जो 19 दिसंबर, 2025 की डेटलाइन सुर्खियों में है, उसका कारण यह है कि अमेरिका में एक नया कानून (Epstein Files Transparency Act) पास हुआ है, और उसके तहत जेफरी एपस्टीन से जुड़ी सरकारी फाइलों को सर्वजनिक किया जाएगा! 19 दिसंबर को एपस्टीन केस से जुड़ी फाइलों के सार्वजनिक होने की चर्चा ने भारत में भी राजनीतिक और मीडिया हलकों में हलचल पैदा कर दी है। सवाल उठ रहे हैं! जब भारत का नाम किसी आधिकारिक आरोप में नहीं है, तो फिर यहाँ बेचैनी क्यों? एपस्टीन फाइल्स का दायरा अब महज़ दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं रह गया है। बताया जा रहा है कि लगभग 300 जीबी डेटा में शामिल करीब 80 हज़ार तस्वीरें सार्वजनिक होने वाली हैं। यह खुलासा अपने संभावित प्रभाव में पनामा पेपर्स और भारत में सामने आई बिड़ला–सहारा डायरी जैसी घटनाओं की याद दिलाता ...

नितिन नबीन की ताजपोसी: क्या नीतीश कुमार के सामने खींच दी गई है राजनीतिक लक्ष्मण रेखा?

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  नितिन नबीन की ताजपोसी: क्या नीतीश कुमार के सामने खींच दी गई है राजनीतिक लक्ष्मण रेखा?                      ले o- अरुण कुणाल जब दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस की ‘वोट-चोरी’ के ख़िलाफ़ आयोजित महा-रैली को राहुल गांधी संबोधित कर रहे थे, ठीक उसी समय 'नितिन नबीन कार्ड' खेल कर भाजपा ने मीडिया की हेडलाइन अपने पक्ष में मोड़ ली। सुबह तक न्यूज़रूम में सुपर एडिटर हिरेन जोशी की कमी खलती दिखी, लेकिन शाम होते-होते हेडलाइन और नैरेटिव दोनों व्यवस्थित हो चुके थे। भारतीय जनता पार्टी में नितिन नबीन की कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में ताजपोसी को महज़ एक संगठनात्मक बदलाव समझना राजनीतिक भूल होगी। यह नियुक्ति दरअसल बिहार से लेकर दिल्ली तक सत्ता-संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। मोदी–शाह की जोड़ी ने जेपी नड्डा की जगह नितिन नबीन को आगे बढ़ाकर एक साथ कई राजनीतिक समीकरण साधने का प्रयास किया है। सबसे पहला और स्पष्ट संदेश यही है कि अब निर्णयों का केंद्र ‘मगध’ नहीं, बल्कि ‘इंद्रप्रस्थ’ होगा। नीतीश कुमार पहले ही गृहमं...

लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे जाई …!

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             लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे जाई …!                     लेo - अरुण कुणाल संसद में इलेक्ट्रोरल रिफ़ॉर्म पर विपक्ष सवाल उठाता रहा और सत्ता पक्ष चुनाव आयोग का प्रवक्ता बनकर वही पुरानी लाइन दोहराता रहा— “चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चांदनी चौक में चांदी की चम्मच से चटनी चटाई” । सत्ता पक्ष की तरफ से टंग-ट्विस्टर की इतनी एक्सरसाइज़ के बाद भी टंग तो फिसली  और टंग इतनी फिसली की मुंह से गाली तक निकल गया! इन सब के बावजूद  ‘ कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?’ इसका रहस्य किसी को नहीं पता चला! शायद उसके लिए संसद के अगले सत्र का इंतजार करना पड़ेगा। अगर SIR पर बहस की मांग को बदलकर चुनाव-सुधार के नाम पर ड्रामा ही करना था, तो फिर पिछला पूरा सत्र बर्बाद क्यों किया गया? क्या सिर्फ़ इसलिए कि इस सत्र में 'वंदे मातरम्' पर बहस हो सके?  या फिर इतने साल बाद पहली बार मोदी सत्ता विपक्ष के सामने झुकी —या यूँ कहें, घुटने टेकने का नाटक किया? क्योंकि वेस्ट बंगाल में चुनाव है? संसद के शीतकालीन सत्र में ...

धर्मेंद्र देओल : द मैन, द मिथ, द लीजेंड ऑफ़ बॉलीवुड

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  धर्मेंद्र देओल : द मैन, द मिथ, द लीजेंड ऑफ़ बॉलीवुड                                ले o- अरुण कुणाल  धर्मेन्द्र जी के साथ भारतीय सिनेमा का एक स्वर्णिम अध्याय जैसे धीमे से किताब में समा गया। सोशल मीडिया पर उन्हें लेकर असंख्य स्मृतियाँ तैरती दिखीं, तो आज उनके जन्मदिन के बहाने मेरे मन में भी वही पुरानी उजली रोशनी लौट आई! वे संवाद, वह सादगी, वह अपनापन…धर्मेंद्र सिर्फ़ अभिनेता नहीं थे, एक युग थे। आज उन्हें याद करना, मानो अपने ही किसी बीते पल को छू लेना हो। देओल परिवार को मैंने बहुत करीब से देखा है। लगभग तीन साल तक उनके साथ काम किया और उस दौरान मैं सनी देओल के ज़्यादा करीब रहा। यह वह समय था जब देओल फैमिली लगभग फिल्मों से बाहर मान ली गई थी। होम प्रोडक्शन के अलावा किसी निर्माता-निर्देशक का फोन नहीं आता था। धरम जी इक्का-दुक्का फिल्मों में कैरेक्टर रोल करते थे,पर सनी और बॉबी—दोनों के पास काम का गहरा सूनापन था। इसी दौर में उन्होंने फिल्म ‘अपने’ और ‘यमला पागल दीवाना’ बनाई और हिट भी हुईं, लेकिन सफलता के बावजू...

संचार साथी ऐप : नाम में ‘साथी’, काम में निगरानी!

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संचार साथी ऐप : नाम में ‘साथी’, काम में चौकीदारी!         ले o- अरुण कुणाल दिल्ली तो कब से मुंह से सांस लेने की अभ्यस्त हो चुकी है! अब पूरे देश को भी मुंह से ही सांस लेने पर मजबूर करने के लिए सरकार ‘संचार साथी ऐप’ लेकर आ रही है! इस ऐप के नाम में ‘साथी’ है पर काम निगरानी का है! सरकार की नज़र में आपका फोन, आपका ऐप, आपकी चैट, आपकी लोकेशन सब ‘राष्ट्रीय संसाधन’ हैं। पहले निगरानी की कहानी फुसफुसाहट में चलती थी,अब उसे कानून की मोहर के साथ खुलकर वैधता प्रदान कर दी गई है। केंद्र सरकार ने स्मार्टफोन कंपनियों को आदेश दिया है कि वे अपने सभी नए स्मार्टफोन्स में सरकारी साइबर सेफ्टी ऐप को पहले से इंस्टॉल करके बेचें। इस आदेश में एपल, सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी जैसी कंपनियों को 90 दिन की समय-सीमा दी गई है।पुराने फोनों में यह ऐप सॉफ्टवेयर अपडेट (OTA) के माध्यम से जबरन इंस्टॉल किया जाएगा।  दिलचस्प बात यह है कि यह आदेश अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, इसे चुनिंदा मोबाइल कंपनियों को निजी तौर पर भेजा गया है। इसके बावजूद मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के साथ -साथ लगभग सभी स्मार्टफो...

संसद का शीतकाल : 15 दिन का सत्र, 50 दिन की जवाबदेही और महाभियोग की आहट!

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संसद का शीतकाल :15 दिन का सत्र, 50 दिन की जवाबदेही और महाभियोग की आहट!            ले o- अरुण कुणाल संसद का शीतकालीन सत्र सिर्फ़ 19 दिन का रखा गया है, जो अब तक का सबसे छोटा शीतकालीन सत्र माना जा रहा है! ऐसे में सवाल यह है कि क्या हमारा लोकतंत्र अब सिर्फ़ चुनावों के दम पर चलेगा? न प्रेस कॉन्फ़्रेंस, न संसद में जवाबदेही — लगता है 'गुजरात मॉडल' अब राष्ट्रीय मॉडल की तरह पूरी तरह लागू कर दिया गया है! संसद का नया सत्र ऐसे वक्त में शुरू हुआ है, जब सुप्रीम कोर्ट में SIR पर बहस के बीच बिहार में चुनाव कराए जा चुके हैं और पश्चिम बंगाल समेत देश के 12 राज्यों में SIR की प्रक्रिया जारी है। इसी बीच वोट-चोरी और SIR के विरोध में कांग्रेस रामलीला मैदान में बड़ा धरना-प्रदर्शन करने की तैयारी में है। साफ है कि इस बार कांग्रेस संसद से लेकर सड़क तक लड़ाई लड़ने के मूड में दिखाई दे रही है। संसद का शीतकालीन सत्र 19 दिसंबर तक चलेगा और इस दौरान सदन की केवल 15 बैठकें होंगी। इसी वजह से इसे सामान्य सत्रों की तुलना में काफी छोटा माना जा रहा है। विपक्ष सत्र को छोटा रखने के लिए मोदी सरकार पर...